क्या होता है जब दिमाग की बत्ती जलती है

विचार
Image caption इस बात पर कम ही विचार किया जाता है कि इस विचार के पीछे क्या वजहें होती हैं.

कभी सोचा है आपने कि आखिर ऐसा क्या होता है कि हमारे दिमाग में कोई विचार कौंधता है और हम उस पर सोचने लगते हैं. उस विचार से जुड़ते हैं और फिर किसी नतीजे पर पहुंचने की कोशिश करने लगते हैं.

सवाल और भी हैं. मसलन क्या नई चीजों के बारे में सोचना एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है या इसे विकसित किया जा सकता है.

विज्ञान अब इस बात की तह में जा सकता है कि किसी विचार के हमारे दिमाग में कौंधने से ठीक पहले क्या चल रहा होता है.

बीबीसी ने इस सिलसिले में मनुष्य के दिमाग की तंत्रिका तंत्र के कई जानकारों से बात की.

जानकारों के मुताबिक नई चीजें सोचने की दिमाग की काबिलियत में इजाफा करने के पांच तरीके हैं.

चीजें अलग तरीके से करना

अमरीकी मनोवैज्ञनिक जेपी गुइलफोर्ड ने एक बेहद ही पारंपरिक किस्म के प्रयोग के जरिए ये साबित करने की कोशिश की कि सामान्य वस्तुओं के वैकल्पिक इस्तेमाल करने की प्रक्रिया पर नजर रखकर हम किसी व्यक्ति की सोच को समझ सकते हैं.

उदाहरण के लिए हम इमारतों के निर्माण में काम आने वाली ईंट को लेते हैं कि उसके और क्या वैकल्पिक उपयोग हो सकते हैं जैसे बॉडी बिल्डिंग के दौरान वजन उठाने के काम में.

किसी समस्या के समाधान को नए नजरिए से देखने की कोशिश या रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ ऐसे बदलाव करना ताकि उस परेशानी को दूर करने में कोई राहत मिल सके.

हॉलैंड के रेडबाउंड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक सिमोन रिटर ने अपने छात्रों के साथ एक नए तरह का प्रयोग किया.

ऐसे ही एक प्रयोग में एक छात्र को हैलमेट और एक खास तरह का चश्मा पहनने के लिए दिया गया जिससे कि वह वर्चुअल दुनिया से रुबरू हो सके.

उस अनजानी दुनिया में कुछ लमहें गुजारने के बाद छात्र की नई चीज सोचने की काबिलियत को बेहतर तरीके से परखा जा सका.

डॉक्टर रिटर ने छात्रों को ब्रेड, मक्खन और चॉकलेट की मदद से पारंपरिक डच सैंडविच तैयार करने को भी कहा. उनकी शर्त यह थी कि इसे बनाने का तरीका अलग हो.

ध्यान भटकाने वाली चीजों से बचना

Image caption ईंट के वैकल्पिक इस्तेमाल के पीछे भी एक विचार होता है.

कई बार बाहर के शोर से खुद को बचाने पर समस्याओं का समाधान आसान हो जाता है. मशहूर ब्रिटिश लेखक रोआल्ड दैल अपने बगीचे में किसी आने की इजाजत देने से बचते थे.

क्योंकी वह अपने लेखन का काम उसी बगीचे में करते थे.

अमरीकी लेखक जोनाथन फ्रैंनजैन अपना उपन्यास ‘द करेक्शन्स’ लिखते वक्त ईयरप्लग का इस्तेमाल किया करते थे.

मनोवैज्ञिनकों का मानना है कि हमारे मन में जब कोई विचार कौंधता है तो यह घटना दिमाग के सामने वाले हिस्से के आस-पास होती है.

ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन क्यूनियस कहते हैं कि जब यह प्रक्रिया हो रही होती है तो दिमाग में अल्फा तरंगों का प्रसार बढ़ जाता है.

किसी उबाऊ चीज पर काम करना

इस सिलसिले में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जोनाथन स्कूलर ने तीन लोगों को अलग-अलग काम सौंपा.

एक से कहा गया कि कुछ मत करो, दूसरे से कहा गया कि कोई कठिन काम करो.

और तीसरे से कहा गया कि रंगों के आधार पर घनाकार टुकड़ों को छांटो जिसमें बहुत ज्यादा ध्यान लगाने की जरूरत नहीं थी.

काम के दौरान यह पाया गया कि अवचेतन में इन घनों के टुकड़ों की छंटाई के काम में फिर से उनका संयोजन हो गया.

सुधार करने से खतरा उठान से डरें नहीं

Image caption अमूमन हम सैंडविच बनाते वक्त परंपरागत तरीकों का ही इस्तेमाल करते है.

जॉन्स हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन्स के वैज्ञानिक चार्ल्स लिंब कहते हैं कि लोग अमूमन सृजनशील होते हैं और अक्सर उन्हें इसका अहसास तक नहीं होता है.

चार्ल्स कहते हैं कि अगर लोग रोजमर्रा के अपने बर्ताव के बारे में सोचेंगे तो पाएंगे कि हम हर लमहें की पहले योजना बनाकर काम नहीं करते हैं.

संगीतकार और कार्टूनिस्ट जैसे लोग बदलाव और सुधार को लेकर सकारात्मक रहते हैं.

मुझे भटकने दो

कहते हैं कि चार्ल्स डार्विन अपने मशहूर सिद्धांत का प्रतिपादन करते वक्त अर्थशास्त्री थॉमस माल्थस की जनसंख्या पर लिखा किताब पढ़ रहे थे.

और 'यूरेका' शब्द का पहली इस्तेमाल करते हुए आर्कडीमिज नहा रहे थे.

यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मेक्सिको के डॉक्टर रेक्स जंग ने पाया कि सृजनशील प्रक्रिया के दौरान दिमाग के अगले हिस्से में बदलाव होता है.

ऐसा मुमकिन है कि जब भी दिमाग की बत्ती जलती हो तो विचार हमारे अवचेतन में पहले से कहीं मौजूद होता है और उस वक्त हमें इसकी खबर तक नहीं होती.

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