ज़जीरों से बांधे जाते हैं मानसिक रोगी

गालूह फाउंडेशन
Image caption गालूह फाउंडेशन में मानसिक रोगियों के जंजीरों से जकड़कर रखा जाता है

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता के एक उपनगरीय इलाक़े में स्थित गालूह फाउंडेशन में मानसिक रोगियों को रखा जाता है. यहां 280 मानसिक रोगी हैं जिनमें से 10 प्रतिशत हर वक़्त ज़ंजीरों से बंधे रहते हैं और उनकी स्थिति जानवरों से भी बदतर है.

परिसर के बीच में एक बड़ा सा पिंजरा है जिस पर ताला लगा है. इसके भीतर 30 से 40 लोगों को जंजीरों से जकड़कर रखा गया है और उनके बदन पर कपड़े नहीं हैं. ये बेहद विचलित करने वाला मंजर है.

इन जंजीरें को लकड़ी से बनी भारी चारपाई से बांधा जाता है. मैंने देखा कि एक आदमी पुश अप कर रहा है जबकि उसके पैर जंजीरों से बंधे हैं. एक दूसरा आदमी दुनिया से बेख़बर जंजीर पर लगे ताले से खेल रहा है और ख़ुद से बातें किया जा रहा है.

फाउंडेशन में काम करने वाले जाजा सूद्रजात ने कहा कि मानसिक रोगियों को अस्थाई तौर पर ही जंजीरों में जकड़ा जाता है और जैसे ही उनका व्यवहार सामान्य होता है, उनकी बेड़ियां खोल दी जाती हैं. यानि सबकुछ उनके मूड़ पर निर्भर करता है.

मानसिक रोगियों को जंजीरों में जकड़ने की प्रथा को स्थानीय भाषा में पासुंग कहा जाता है. इंडोनेशिया सरकार ने 1979 पर इस पर प्रतिबंध लगा दिया था और इसके उन्मूलन के लिए 2011 में एक अभियान शुरू किया गया था.

सरकारी मदद

गालूह फाउंडेशन तक पहुंचना भी आसान काम नहीं है. ये धूल भरे रास्ते पर झुग्गी झोपड़ियों और एक अस्तबल के पीछे स्थित है.

वहां घुसते ही आपको अहसास होता है कि आप आधुनिक इंडोनेशिया से दूर किसी आदिम युग में पहुंच गए हैं. मलमूत्र की दुर्गंध से वहां एक पल भी रहना दूभर हो रहा था.

फाउंडेशन को हर साल सामाजिक कल्याण मंत्रालय से 10 हज़ार डॉलर की मदद मिलती है. हालांकि यहां काम करने वाले लोगों का कहना है कि ये मदद ऊंट के मुँह में जीरे के समान है.

इस फाउंडेशन की स्थापना 1994 में जेंडू मुलातिप ने की थी जिनका मानना था कि प्रार्थना, जड़ी बूटियों के इस्तेमाल और जंजीरों में जकड़ने से मानसिक रोगियों को ठीक किया जा सकता है.

मुलातिप की 2011 में मौत के बाद उनके पुत्र सुहांदा फाउंडेशन को चलाते हैं. उन्होंने कहा, “यहां जो मरीज हैं वे अलग-अलग तरह की बीमारियों के ग्रसित हैं. हम पत्तियों और नारियल पानी से बने मिश्रण से उनका इलाज करते हैं. डॉक्टर नींद की गोलियों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन ऐसा नहीं करते हैं.”

शिकायत

Image caption फाउंडेशन में आधुनिक दवाओं के बजाए जड़ी बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है

इंडोनेशिया का चिकित्सा जगत इस फाउंडेशन से इसलिए ख़फ़ा है क्योंकि वो इलाज के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल नहीं करता है.

सुहार्तो हीर्दजान अस्पताल में मनोचिकित्सक डॉ. अस्माराहादी का कहना है कि देश में मानसिक रोगियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी नहीं है लेकिन सामाजिक कुप्रथा इसके लिए ज़िम्मेदार है.

मानसिक रोगियों के परिजन इस बीमारी के अभिशाप या काला जादू मानते हैं और डॉक्टरों के पास जाने के बजाए ओझाओं और छोलाझाप डॉक्टरों की शरण में जाते हैं.

जब तक वो अस्पताल पहुंचते हैं तब तक मरीज की हालत बेहद खराब हो चुकी होती है.

दलील

बीबीसी ने इस बारे में इंडोनेशिया के स्वास्थ्य मंत्रालय से पूछा कि वो ऐसे संस्थान को क्यों मदद कर रहा है जो मरीजों को जंजीरों में जकड़कर रखता है.

मानसिक स्वास्थ्य विभाग के निदेशक दियाह सेतिया उतामी ने कहा कि इसके लिए उनका मंत्रालय नहीं बल्कि सामाजिक कल्याण मंत्रालय पैसा देता है.

उन्होंने कहा, “हमें इस स्थिति के लिए खेद है. हमने देश के इस कुप्रथा के उन्मूलन के लिए 2014 की समयसीमा रखी है. लेकिन जब हम ऐसे संस्थानों से बात करते हैं तो उनकी दलील होती है कि मरीजों को जंजीरों में जकड़ना ही सबसे अच्छा तरीका है.”

सरकार का कहना है कि वो इस कुप्रथा को जड़ से मिटाने के लिए कृतसंकल्प है लेकिन साथ ही उसने स्वीकार किया कि 2014 की समयसीमा में ये काम नहीं हो सकेगा.

ये मानसिक रूप से बीमार इंडोनेशिया के लोगों के लिए अच्छी ख़बर नहीं है.

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