क्या ये तालिबान की वापसी की आहट है?

  • 29 अप्रैल 2013
Image caption अफ़गानिस्तान में तालिबानी लड़ाकों के हिंसा के शिकार बने फ़ैयाज

अफ़गानिस्तान के हेरात प्रांत में पिछले कुछ दिनों में जबरन लोगों के अंग काटने के दो मामले सामने आए हैं. इन मामलों ने बारह साल पहले के तालिबानी शासन की याद दिला दी है.

महज एक महीने पहले फ़ैयाज मोहम्मद और उनके पड़ोसी जरीन अफ़गानिस्तान के दो आम युवा थे.

दोनों एक स्थानीय ट्रांसपोर्ट कंपनी में ड्राइवर के तौर पर काम करते थे और अपने परिवार के साथ ख़ुशहाल जिंदगी जी रहे थे.

लेकिन अब ये दोनों हेरात प्रांत के अस्पताल में भर्ती हैं और अंग विच्छेदन के बाद के अपने भविष्य को लेकर आशंकित भी हैं.

मध्य मार्च में 25 साल के फ़ैयाज अपने साथी जरीन के साथ अपने गांव राबात सांगी में आराम कर रहे थे, उस वक्त उनका ट्रक सामानों से भरा जा रहा था.

'वो कयामत की सुबह'

उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि कयामत उन पर बरपने वाली थी.

सुबह के तीन बजे तालिबान लड़ाकों ने हमला किया और इन दोनों को बंधक बना लिया.

तालिबानी लड़ाके इन दोनों को एक सौ मील से भी ज़्यादा की दूरी पर स्थित तुर्कमेनिस्तान की सीमा से लगे शहर तोरगुंडी ले गए.

फ़ैयाज ने बीबीसी को बताया, “उन लोगों ने हमें 27 दिनों तक बंधक रखा. 28वें दिन सुबह दस बजे उन्होंने हमारे हाथ और पैर काट डाले.”

हेरात के एक स्थानीय अस्पताल के सामान्य से बिस्तर पर पड़े फ़ैयाज उस भयानक अनुभव को याद कर रहे हैं. उनके दाएं हाथ और बाएं पांव में काफी बैंडज लगा हुआ है.

वे बताते हैं, “उन लोगों ने मुझे बेहोश करने के लिए की सुई भी लगाई, लेकिन वह नकली था और उसका कोई असर नहीं हुआ.”

तालिबानी लड़ाकों ने उनके हाथ और पांव किस चीज से काटे, इसके बारे में फ़ैयाज कहते हैं कि उन्हें कुछ नहीं मालूम.

काट डाले हाथ-पांव

फ़ैयाज कहते हैं, “मुझे बस इतना याद है कि मैंने एक शख्स को उजले दस्ताने पहने देखा था. मुझे नहीं मालूम है कि वह डॉक्टर था या नहीं. शायद वह डॉक्टर नहीं रहा होगा क्योंकि उसने मेरा हाथ काटने में बहुत वक्त लगाया और मुझे काफी दर्द होता रहा.”

फ़ैयाज बताते हैं कि उनके आंखों पर काली पट्टी बांध दी गई थी और कई लोग उनकी शरीर और छाती को पकड़े हुए थे ताकि वे हिल डुल नहीं सकें.

हालांकि तालिबान ने इन दोनों को ऐसी सजा क्यों दी है, इसको लेकर अलग-अलग बातें कही जा रही हैं.

कुछ रिपोर्टों के मुताबिक इन दोनों पर चोरी का आरोप था, जबकि दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक इन दोनों को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि ये लोग जिस ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते हैं, वह पश्चिमी सेना के लिए काम कर रही थी.

फ़ैयाज कहते हैं कि जरीन और उन्होंने कभी कुछ ग़लत नहीं किया जिसके लिए उन्हें सजा मिले. फ़ैयाज के मुताबिक वहां कोई ट्रायल भी नहीं हुआ.

वे बताते हैं, “वहां कोई मुल्ला नहीं था, ना कोई जज था, कोई नहीं था. वहां बस तालिबानी थे. वे सब आपस में हंस रहे थे और मजाक कर रहे थे. वे हमारी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे.”

ट्रक में बम प्लांट

फ़ैयाज ने ये बताया कि तालिबानी लड़ाकों ने उन्हें कंपनी की ट्रक में बम प्लांट करने को कहा था, ऐसा करने पर इन दोनों को छोड़ देने की बात कही जा रही थी, लेकिन इन दोनों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था.

अस्पताल के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि ये दोनों जख्मी हालात में मेन रोड पर पाए गए जहां से दूसरे ड्राइवर इन्हें अस्पताल लेकर आए.

Image caption अफ़गानिस्तान में लौटने लगा है तालिबानी युग

अस्पताल प्रबंधन के मुताबिक अंग काटे जाने के करीब तीन घंटे बाद फैयाज और जरीन को अस्पताल लाया जा सका. उन्हें तुरंत खून चढ़ाने की जरूरत थी.

इसके बाद इन दोनों की सर्जरी करनी पड़ी. अस्पताल के चिकित्सकों के मुताबिक इन दोनों के अंग काटने वाले को मेडिकल जानकारी होगी क्योंकि इन दोनों की कोई हड्डी नहीं टूटी है.

फ़ैयाज को अब अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है कि वो कैसे अपना काम कर पाएगा.

इस मामले ने एक बार तालिबानी शासन के दौरान दी जाने वाली खौफनाक सजाओं की याद दिला दी है. अफ़गानिस्तान में 1996 से 2001 तक तालिबान का शासन रहा.

मुनादी

शरिया कानून का हवाला देते हुए तालिबानी अधिकारी सार्वजनिक जगहों पर आम लोगों को फांसी और हाथ-पांव काटने जैसी सजा दिया करते थे.

काबुल और कंधार के खेल स्टेडियम इन सजाओं के केंद्र के तौर पर बदनाम हो चुके थे. इन सजाओं को देखने के लिए बड़ी संख्या में आम लोग भी जमा होते थे.

आम लोगों को जुटाने के लिए तालिबानी अधिकारी आस पड़ोस में इसकी मुनादी भी कराते थे.

तालिबानी शासन के दौरान अंग विच्छेदन का काम अमूमन डॉक्टर किया करते थे. हालांकि उनका चेहरा ढंका रहता था. ज़्यादातर मामलों में अंग काटने से पहले सजा मिलने वाले शख्स को बेहोश कर दिया जाता था.

तालिबानी शासन के दौरान चोरी की सजा हाथ काटना थी.

लौट रहा है तालिबानी युग

अब ऐसा लग रहा है कि तालिबानी शासन का वह दौर फिर से लौट रहा है.

अगस्त 2010 में अफगानी अधिकारियों ने एक वीडियो जारी किया था जिसमें दिखाया गया था कि एक जोड़े की पत्थर मारकर हत्या कर दी गई थी.

तालिबानियों ने इस जोड़े को शारीरिक संबंध स्थापित करने की जुर्म में ये सजा सुनाई थी.

इसी महीने में तालिबानी लड़ाकों ने एक गर्भवती महिला को फांसी पर चढ़ा दिया था. इस विधवा महिला पर अवैध संबंधों के चलते गर्भवती होने का आरोप था.

शरिया का समर्थन

पिछले साल परवाना प्रांत में एक महिला को तालिबानियों ने प्रेम संबंधों के शक के चलते गोली मार दी थी.

इन मामलों के अलावा अफ़गानिस्तान के कई इलाकों में तालिबानी अदालतों के मौजूदगी की ख़बरे आती रहती हैं.

अफ़गानिस्तान की भ्रष्ट न्याय व्यवस्था से तंग आकर भी आम लोग तालिबानी अदालतों के पास पहुंचते रहे हैं.

अफ़गानिस्तान के 300 से ज़्यादा धार्मिक गुरुओं ने तीन साल पहले राष्ट्रपति हामिद करजई से मुलाकात करके शरिया कानून को लागू करने की मांग की थी, जिसमें तालिबानी सजा का प्रावधान भी शामिल था.

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