मुशर्रफ़ मामले में पाकिस्तानी फौज की खामोशी के मायने

Image caption परवेज़ मुशर्रफ़ की वापसी के बाद चीज़े उनकी उम्मीदों के हिसाब से नहीं होती दिख रहीं.

पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ चल रहे मुकदमे ने पाकिस्तानी सेना को एक अनचाही स्थिति में डाल दिया है.

विभिन्न राजनीतिक दलों, पंडितों और आलोचकों की कई तरह की राय के बावजूद सेना इस मामले में शांत ही है. विश्लेषकों का कहना है कि सेना की कोशिश इस मामले में निष्पक्ष बने रहने और मुशर्रफ़ के बाद बनी अपनी छवि को बनाए रखने की है.

सेना का शुक्रिया

मीडिया और सैन्य विश्लेषकों ने सेना की निष्पक्ष बने रहने की नीति और मुशर्रफ़ के मामले में अलग रहने का स्वागत किया है.

उर्दू दैनिक इस्लाम में 21 अप्रैल को छपे एक लेख में सुहेल अहमद आज़मी कहते हैं, “पाकिस्तानी सेना की इस मामले में निष्पक्ष बने रहने की नीति ने उसकी गरिमा और सम्मान को बढ़ाया है.”

विश्लेषक वाजिद नईमुद्दीन कहते हैं, “यह सोचना मूर्खता होती कि सेना बेहद अलोकप्रिय पूर्व सेना प्रमुख के लिए ताकत का इस्तेमाल कर अब तक अर्जित साख खो देगी. वह भी तब जबकि वह कथित रूप से सेना की सलाह के खिलाफ़ वापस आए हैं.”

उर्दू अख़बारों में भी इसी तरह के विचार व्यक्ति किए जा रहे हैं.

उर्दू दैनिक उम्मत में 21 अप्रैल को कहा गया, “मुशर्रफ़ ने यह ग़लत अनुमान लगा लिया कि पूर्व सेना प्रमुख होने के नाते सेना उन्हें ज़रूर बचाएगी.”

अख़बार यह भी कहता है कि मुशर्रफ़ यह भूल गए थे कि जनरल कयानी के नेतृत्व वाली सेना “कभी भी राजनीतिक और न्यायिक मामलों ममें हस्तक्षेप नहीं करेगी.”

ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) शौकत कादिर मानते हैं कि एक संस्था के रूप में सेना मुशर्रफ़ पर कार्रवाई का विरोध नहीं करेगी. वह यह भी कहते हैं कि पूर्व सैन्य तानाशाह पर, “संविधान के उल्लंघन का मामला जरूर चलाया जाना चाहिए.”

एक और विश्लेषक लेफ़्टिनेंट जनरल हमीद गुल भी कहते हैं कि सेना को मुशर्रफ़ को “बचाने” के लिए आगे नहीं आना चाहिए.

प्रतिष्ठा को आघात

राजनीतिक टिप्पणीकार इस बार पर भी एकमत नज़र आते हैं कि मुशर्रफ़ के मामले ने पाकिस्तानी सेना और नागरिक सरकार के नाज़ुक संबंधों को लेकर सेना की धमकी से सेना को भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है.

पाकिस्तान के सरकारी टीवी चैनल पीटीवी पर 18 अप्रैल को एक टॉक-शो में वरिष्ठ विश्लेषक मुहम्मद ज़ियाउद्दीन कहते है कि इस स्थिति से “सेना को हो रही शर्मिंदगी से” वह “बहुत नाख़ुश” होगी.

पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ (पीएमएल-एन) के सदस्य ख्वाजा साद रफ़ीक ज़ियाउद्दीन की बात से सहमत नज़र आते हैं.

वह कहते हैं कि सेना मुशर्रफ़ के मामले में एक पक्षकार नहीं बनेगी क्योंकि मुशर्रफ़ ने “देश के साथ ही सेना की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाया है.”

रिटायर्ड आर्मी ऑफ़िसर एसोसिएशन के सदस्य ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) मियां मुहम्मद महमूद कहते हैं कि पूर्व सैनिकों में मुशर्रफ़ के लिए कोई सहानुभूति नहीं है. वह कहते हैं कि मुशर्रफ़, “उसी का फल भोग रहे हैं, जो उन्होंने 2007 में जो किया था.”

उर्दू दैनिक इस्लाम में 21 अप्रैल को छपे एक लेख में मुनव्वर राजपूत कहते हैं कि मुशर्रफ़ ने “पाकिस्तानी सेना की छवि और साख को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है.”

वह यह भी कहते हैं कि मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ “कोर्ट मार्शल की कार्रवाई” शुरू की जानी चाहिए.

वरिष्ठ विश्लेषक आएशा सिद्दिका के अनुसार सेना ने जनरल मुशर्रफ़ को वापस लौटने से रोकने की कोशिश की थी लेकिन उन्होंने “इस सलाह की अनदेखी कर दी.”

छवि बदलने की कोशिश

Image caption जनरल अशफ़ाक परवेज़ कयानी

विशेषज्ञों के अनुसार मुशर्रफ़ के उत्तराधिकारी जनरल इशफ़ाक परवेज़ कयानी के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना ने कई ऐसे फ़ैसले किए हैं जो सेना की निष्पक्ष और तटस्थ छवि बनाने में मदद करते हैं.

उत्तरी वजीरिस्तान में सैन्य अभियान के दबाव के बावजूद कयानी राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के साथ, यह कहते हुए, खड़े नज़र आए कि सेना और सरकार इसमें मिलकर फ़ैसला करेंगे.

हाल ही में सेना ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र, शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव करवाने में पूर्ण सहयोग का भरोसा दिलाया है.

अप्रैल में बलूचिस्तान की यात्रा के दौरान कयानी ने राज्य के नेताओं को कहा कि सेना “सभी के चुनाव में शामिल होने का“ स्वागत करेगी.

उन्होंने आम चुनावों में सभी राजनीतिक दलों के भाग लेने पर भी ज़ोर दिया.

कयानी कई दशकों में ऐसे पहले सेना प्रमुख बन गए हैं जिन्हें किसी नागरिक सरकार से सेवा विस्तार मिला है.

प्रधानमंत्री युसुफ़ रज़ा गिलानी ने 2010 में सेना प्रमुख के रूप में उनके कार्यकाल का तीन साल तक विस्तार करने की घोषणा की.

इससे सेना और सरकार के बीच सौहार्द का भी पता चला.

आएशा सिद्दिका मानती हैं कि सेना को मुशर्रफ़ को “बचाने” के लिए नहीं आना चाहिए, क्योंकि “अगर वह किसी रोमांच के चक्कर में पड़ेगी तो उसकी छवि फिर नष्ट हो सकती है.”

वह कहती हैं कि सेना अपनी “छवि को बचाने” की सफल कोशिश कर रही है और “मुशर्रफ़ की खातिर वह इससे पीछे नहीं हट सकती.”

मुशर्रफ़ को “अपमानित” करने की कोशिश

मुशर्रफ़ को कुछ पूर्व जनरल से सहारा भी मिला है. हालांकि वह यह मानते हैं कि पूर्व सेना प्रमुख के पास कोर्ट का सामना करने के अलावा कोई चारा नहीं है.

चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टॉफ़ जनरल (सेवानिवृत्त) असलम बेग कहते हैं, “मुशर्रफ़ को अपमानित करने के लिए योजनाबद्ध और समन्वय के साथ कोशिश की जा रही है.”

उनका मानना है कि “सेना एक सीमा से ज़्यादा इस सब को बर्दाश्त नहीं करेगी.”

पूर्व जनरल जमशेद अयाज़ कहते हैं कि मुशर्रफ़ को सेना अधिकारियों के बीच अब भी समर्थन हासिल है. वह मानते हैं कि वर्तमान सेना प्रमुख जनरल कयानी को “मुशर्रफ़ को ऐसे अपमान से बचाने के लिए भूमिका निभानी चाहिए.”

पूर्व-सैनिक संस्था के अध्यक्ष पूर्व जनरल फ़ैज़ अली चिश्ती कहते हैं कि वकीलों को मुशर्रफ़ से अपराधी की तरह बर्ताव करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए.

हालांकि वह यह भी कहते हैं कि मुशर्रफ़ “ने अगर कुछ गलत किया है तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया का सामना करना ही होगा.”

बहरहाल पाकिस्तान ऑब्ज़र्वर में 27 अप्रैल को छपे एक लेख में असरफ़ अंसारी कहते हैं, “अभी चल रही न्यायिक प्रक्रिया से यह संदेश जा सकता है कि मुशर्रफ़ का अपमान किया जा रहा है और दूसरी तरफ़ उन लोगों को शर्मिंदगी हो सकती है जिन्हें इससे सरोकार है.”

लेख के अनुसार यह भी संभावना है कि मुशर्रफ़ को उकसाने वाले भी “न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में लाए जाएं.”

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