अब अंतरिक्ष में भी महिलाओं के साथ 'भेदभाव'

  • 6 मई 2013
Image caption अंतरिक्ष में महिलाओं के चित्रण में लैंगिक भेदभाव की बू आती है

अंतरिक्ष में जाने वाले यान की टिकटों को जीतने के लिए कई देशों में हुई प्रतियोगिताओं में महिलाओं को भाग नहीं लेने दिया गया है.

मेरा मानना है कि अंतरिक्ष में भी महिलाओं के साथ भेद-भाव खत्म करने में लंबा समय लगेगा.

1960 में जब अंतरिक्ष जाने की होड़ लगी थी तब एक मैगज़ीन के कवर पर छपी तस्वीर में एक प्रख्यात अंतरिक्ष यात्री को कपड़े धोने वाले पाउडर की बोतल के साथ दिखाया गया.

कवर पर लिखा गया था, “भविष्य की महिलाएं चांद को एक साफ-सुथरी जगह बनाएंगी.”

चार दशकों बाद एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता हुई जिसमें अंतरिक्ष में जाने के लिए 22 अंतरिक्षयात्रियों को टिकटें दी जाएंगीं.

एक तस्वीर में एक अंतरिक्ष यात्री को हेल्मेट पहने दिखाया गया है जो टब में दो महिलाओं के साथ आराम फरमा रहा है.

दूसरी तस्वीर में उसकी ड्रैस बाथरूम के फर्श पर पड़ी है और साथ में एक लाल रंग की ड्रैस, एक ब्रा और काली रंग की ऊंची एड़ी वाली सैंडल पड़ी हैं.

आज भी भेदभाव

अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला वैलेन्टीना तेरेश्कोवा की उपलब्धि की इस साल 50वीं वर्षगांव है.

साथ ही अमरीकी अंतरिक्षयात्री सैली राइड की अंतरिक्ष यात्रा की भी 30वीं वर्षगांठ है.

अब तक 55 महिलाएं अंतरिक्ष की यात्रा कर चुकी हैं, लेकिन महिलाओं के प्रति लोगों का रुख अब तक नहीं बदला है.

इस साल जनवरी में अपोलो अंतरिक्षयात्री एडविन एल्ड्रिन ने एक नायाब प्रतियोगिता का आयोजन किया. अंतरिक्ष ले जाने का वायदा करने वाली इस प्रतियोगिता में महिलाएं और पुरुष, दोनों ही भाग ले सकते हैं.

लेकिन समस्या ये है कि प्रतियोगिता के स्लोगन में लिखा है – ‘एक आदमी जो हीरो बन कर लौटा’

ज़ाहिर है कि ये प्रतियोगिता पुरुषों को ही ध्यान में रख कर बनाई गई.

लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ जब वैलेन्टीना तेरेश्कोवा के ही देश, रुस ने मैक्सिको, यूक्रेन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया की तरह इस प्रतियोगिता में महिलाओं को भाग लेने से रोक दिया.

लंबी लड़ाई

Image caption सैली राइड अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला थीं

बस फिर क्या था. ट्विट्टर पर महिलाओं व पुरुष, दोनों वर्गों का गुस्सा बरसने लगा.

और इसी की उपज रहा सोशल नेटवर्क पर बना एक समूह ‘एस्ट्रोगर्लस’ जो उन महिलाओं के समर्थन के लिए बनाया गया है जिन्हें इस प्रतियोगिता में भाग लेने की इजाज़त दी गई है.

इस अभियान को चलाने के लिए एक फेसबुक पेज भी बनाया गया है.

रोजर इस अभियान का हिस्सा बनीं. उनका कहना है, “मुझे उन महिलाओं से प्रेरणा मिली जो इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही हैं. मुझे उन ब्लॉग पोस्ट से भी प्रेरणा मिली जो महिलाओं के प्रति हो रहे भेद-भाव की बात कर रहे हैं.”

विज्ञान के क्षेत्र से जुड़ी सैंकड़ों महिलाओं ने इस प्रतियोगिता की निंदा की है.

ब्रिटेन की केट आर्कलेस ग्रे ने पहली बार इस प्रतियोगिता से जुड़े लैंगिक भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाई.

उनका कहना है, “इस प्रतियोगिता के ज़रिए पुराने विचारों का प्रचार किया जा रहा है. आयोजनकर्ताओं के पास एक बहुत अच्छा मौका था जिसके ज़रिए वे इस मुहिम का प्रचार कर सकते थे. लेकिन इसके बजाय वो पुरानी विचारधाराओं का प्रचारक बन कर रह गया.”

इसके खिलाफ चलाई गई महिलाओं की मुहिम कुछ हद तक सफल रही है.

इस प्रतियोगिता की प्रायोजक कंपनी यूनिलिवर ने एक वक्तव्य जारी किया जिसमें कहा गया कि इस प्रतियोगिता में पुरुष और महिलाओं दोनों को भाग लेने दिया जाए.

इस वक्तव्य के बाद कुछ देशों ने इसका अमल भी किया. लेकिन क्या ये लड़ाई यहीं खत्म हो जाती है?

(सु नेल्सन ने अंतरिक्ष जाने की टिकट देने वाली इस प्रतियोगिता में भाग लिया था. इस लेख में कही गई बातें इनके निजी विचार हैं)

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