पाकिस्तान चुनाव: तालिबान नई राजनीतिक ताकत बना

Image caption नवाज शरीफ के सामने चुनौतियां भी कम नहीं

पाकिस्तान के आम चुनाव के नतीजों से साफ है कि सेक्युलर दलों को झटका लगा है.

देश में तीन सेक्युलर दल हैं. इन तीनों का ख्याल था कि रियासत के अंदर धर्म का बहुत ज्यादा दखल नहीं होना चाहिए.

इस चुनाव में ये तीनों दल जड़ से उखड़ गई हैं. मसलन पाकिस्तान पीपल्स पार्टी है जिसका पंजाब के अंदर, खैब़र पख्तूनख्वाह या फिर बलूचिस्तान के अंदर कोई वजूद नहीं बचा है.

ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह के अंदर अवाम नेशनल पार्टी का वजूद नहीं रहा. जो एकाध अपना वजूद बचा पाए हैं उनमें से कराची का दल एमक्यूएम है. लेकिन बुनियादी तौर पर सेक्युलर दलों तो खेल से बिलकुल निकल गए हैं.

तालिबान की ताकत

उनकी जगह जो दल आए हैं, उन सबकी दक्षिणपंथी सोच है और ये लोग मज़हब को रियासत का हिस्सा मानने में यकीन रखते हैं.

इस चुनाव के अंदर तालिबान मज़बूती से उभरा है. वैसे तो तालिबान चुनाव के अंदर सक्रियता तौर पर हिस्सा नहीं ले रहे था.

लेकिन इस चुनाव के अंदर जिसका सबसे ज़्यादा सियासी असर दिखा वो तालिबान का ही है.

उन्होंने एक खूनी कैंपेन इन सेक्युलर दलों के खिलाफ़ चलाया था.

( अलग-अलग मारो!)

हालांकि इन दलों की सरकार को अपने ख़राब कामकाज के चलते भी समर्थन नहीं मिला लेकिन जो कसर बाक़ी रह गई थी वह इस तलिबानी कैंपेन ने पूरी कर दी.

इस कैंपेन के चलते सेक्युलर ताकतें अपना चुनावी अभियान ठीक ढंग से चला नहीं पाईं.

Image caption प्रत्यक्ष तौर पर तो नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर तालिबान एक सियासी ताकत बनकर सामने आया है

प्रत्यक्ष तौर पर तो नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर तालिबान एक सियासी ताकत बनकर सामने आया है.

नवाज़ की मुश्किल

बहरहाल, इस चुनाव में नवाज़ शरीफ़ को समर्थन मिला है. उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं.

कहा जाता रहा है कि कट्टरपंथियों से उनके अच्छे रिश्ते रहे हैं. लेकिन सत्ता में लौटने के बाद वे भारत के साथ बेहतर रिश्तों की बात कर रहे हैं क्योंकि जब जनता की हिमायत मिल जाती है तो कुछ भी असंभव नहीं होता.

इसका एक अच्छा उदाहरण है, नवाज़ शरीफ़ की छुट्टी खत्म करने की बात कही थी. पाकिस्तान में वीकएंड शुक्रवार और इतवार हुआ करता था. लेकिन शरीफ़ ने कहा है कि ये ग़लत है और इससे हम दुनिया से कट जाते हैं लिहाजा इसे बदलना चाहिए.

तो लोगों ने कहा कि ये कैसे हो सकता है.लेकिन जब उन्होंने शनिवार और इतवार को पाकिस्तान का वीकएंड घोषित कर दिया तो किसी ने कोई आवाज नहीं उठाई.

( उन्हें तकलीफ है कि 'मैं मुल्ला क्यों नहीं')

उन्होंने ये फ़ैसला किया अटल बिहारी वाजपेयी साहब को पाकिस्तान बुलाएंगे और वहां उन दोनों की मुलाकात भी हुई तब मुल्क एक बड़ा तबका उनके साथ था.

बेहतर होंगे भारत से रिश्ते

लिहाजा अगर वे हिमायत करें कि भारत से रिश्ते बेहतर करने हैं तो भारत पाक रिश्ते बेहतर करने के लिए उनसे पहले कोई भी इतनी बेहतर स्थिति में नहीं दिखा है.

हालांकि ये बात सही है कि पिछली बार भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने के दौरान ही उन्हें सेना के विद्रोह का सामना करना पड़ा था. सेना ने सत्ता से बेदखल तो किया है, उन्हें देश भी छोड़ना पड़ा था.

Image caption नवाज शरीफ ने अटल बिहारी वाजपेयी को पाकिस्तान बुलाया था

लेकिन जब से मियां देशनिकाला खत्म करने के बाद लौटे हैं तब से उनकी राजनीति में एक बात एक स्पष्ट तौर पर नजर आई है. वे जिस भी बात को समझते हैं कि उन्हें वह करना चाहिए, वह उसे कर गुजरने के लिए तैयार दिख रहे हैं.

उन्हें इस वक्त ये भी पता है कि इस बार पाकिस्तान सेना की ताकत वह नहीं है जितनी उस वक्त थी जब उन्हें सत्ता से हटाया गया था.

ओसामा बिन लादेन के फ़ौजी शहर में पकड़े जाने और मारे जाने के बाद वहां की फ़ौज ऐसी स्थिति में नहीं है जो किसी चुनी हुई सरकार पर कोई भी दबाव डाल सके.

( पाक सेना : भारत नहीं दुश्मन नंबर 1)

पाकिस्तान के संघीय ढ़ांचे को वापस लाने उनके सामने बड़ी चुनौती होगी. पहले ही माना जाता था कि एक ऐसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी ही जिसकी हर सूबे के अंदर सीटें हों और वो ही इस संघीय ढ़ांचे को मज़बूत कर सकती हैं.

धांधली कोई मुद्दा नहीं

ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह के अंदर इमरान खान साहब की सरकार बन रही है, पंजाब के अंदर मियां नवाज शरीफ़ की सरकार बन रही है, सिंध के अंदर पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सरकार बन रही है. बलूचिस्तान के अंदर स्थिति अभी साफ़ नहीं हुई है.

इससे एक अच्छा रास्ता ये भी निकल सकता है. संसद के अंदर बैठे हुए दल पूरे पाकिस्तान की बात कर सकते है और इससे एक बेहतर तस्वीर भी निकल सकती है, हालांकि ये भी संदेह है कि अगर यहां से मामला बिगड़ेगा तो काफ़ी मुश्किल हालात हो सकती है.

इस चुनाव में धांधली की ख़बरें आ रही हैं. पाकिस्तान के अंदर चुनाव में हमेशा धांधली के इल्जाम लगते हैं. हर चुनाव के बाद इसके इल्जाम लगते है. किसी ना किसी हद तक गडबड़ होती भी है.

कराची के अंदर एमक्यूएम का जलवा है, जब वह देखती है कि किसी दूसरे दल को समर्थन मिल रहा है तो वे इधर- उधर करने की कोशिश करते हैं.

लेकिन इसका असर चुनाव पर क्या पड़ता है, उसे देखे जाने की जरूरत है.

हल्की फुल्की धांधली की ख़बरों से चुनावी नतीजे प्रभावित नहीं होते हैं और मेरे ख्याल से ये पाकिस्तान में कोई बड़ा मुद्दा नहीं बनेगा.

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