भारत-जापान के रिश्तों में चीनी पेंच

  • 28 मई 2013

मनमोहन सिंह और शिंजो आबे पहले भी मिल चुके हैं. शिंजो की आबेनॉमिक्स की जापान के आर्थिक सुधारों की दिशा में एक बड़ी ही महत्वपूर्ण नीति है.

इसके तीन मुद्दे हैं. एक है मौद्रिक नीति और दूसरा राजकोषीय नीति और तीसरा है विकास की रणनीति.

पहली नीति के तहत वे चाहते हैं कि लोग खर्च करें. मन को बदलें ताकि खर्च करने का मन करे. चाहे आपके पास पैसे हो या न हों.

लेकिन अगर खर्च होगा तो इकॉनॉमी बढ़िया होती जाएगी और लोग चीजें खरीदेंगे तो इससे तरक्की आएगी.

दूसरी चीज ये कि महिलाओं को नौकरियां देना चाहते हैं ताकि वे महत्वपूर्ण हो सकें.

असैनिक परमाणु तकनीक

Image caption शिंजो आबे को भारत समर्थक नेता माना जाता है.

मनमोहन सिंह के दो मुद्दे हैं. एक तो ये कि जापानी लोग भारत के बुनियादी ढांचे में निवेश करें.

और मेरा ख्याल है कि ये जरूर हासिल होगा क्योंकि इसको लेकर भारत और जापान के विचार मिलते जुलते हैं.

दरअसल समस्या खड़ी होती है भारत के असैनिक परमाणु प्रौद्योगिकी कार्यक्रम में जापान के निवेश को लेकर.

मनमोहन सिंह चाहते हैं कि जापानी कंपनियां इसमें निवेश करें. लेकिन इसमें थोड़ी मुश्किल आएगी.

चीन के संदर्भों में देखा जाए तो भारत जापान को लेकर थोड़ा सुस्त रहा है लेकिन अब हालात बदल रहे हैं.

जापान को लेकर भारत का रवैया बदला है.

उसकी कई वजह हैं. सबसे बड़ी वजह तो ये है कि चीन काफी तेजी से बढ़ रहा है और वह तेजी से चारो तरफ खुद को बढ़ाना चाहता है.

भारत का रवैया

जापान के साथ चीन के कई मुद्दे हैं. जमीन का मुद्दा है, समुद्र का मुद्दा है. इस वजह से जापान चीन में निवेश करने में थोड़ा हिचक रहा है.

यह इसके बावजूद है कि जापान का सबसे ज्यादा कारोबार चीन के साथ ही है. लेकिन ये बदलाव जो हो रहा है कि वह शिंजो आबे की वजह से हो रहा है.

Image caption भारत जापान के संबंधों में चीन भी एक महत्वपूर्ण देश है.

और दूसरी वजह यह है कि जापान को लगता है कि भारत में वह काफी कुछ हासिल कर सकता है.

शिंजो आबे को भारत समर्थक माना जाता है. अपने पहले कार्यकाल में वे भारत का दौरा कर चुके हैं.

मेरा ख्याल है कि भारत-चीन और चीन-जापान के रिश्तों में जो समस्या आ रही है, इस बात ने भारत और जापान को एक दूसरे के करीब लाया है.

भारत-जापान-चीन

मनमोहन सिंह की नीति की सबसे बड़ी बात है कि भारत जापान को अपना साझीदार समझता है और इस साझीदारी में चीन दुश्मन नहीं है.

यह रणनीति चलती रहेगी. जिस तरीके से प्रधानमंत्री आगे बढ़ रहे हैं उससे लगता है कि एक तरफ चीन और भारत का समझौता होगा और दूसरी तरफ भारत और जापान के बीच एक अच्छा संगठन बनेगा.

अगर ये हो सका तो दो पक्षों के लिए जीत वाली स्थिति कही जा सकती है. यह भारत और जापान के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है.

(बीबीसी संवाददाता रेहान फज़ल से बातचीत पर आधारित)

( बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार