दुनिया ख़रीद लेंगी चीनी कंपनियां?

बीते सप्ताह एक चीनी कारोबारी समूह ने अमरीका की एक बड़ी कंपनी का अधिग्रहण किया है.

अमरीकी मांस उत्पादक कंपनी स्मिथफ़ील्ड फूड का अधिग्रहण चीन की सुअर मांस उत्पादक कारोबारी समूह शुआनजुही ने किया.

इसके लिए चीनी कंपनी ने करीब 4.7 अरब डॉलर की कीमत चुकाई.

इससे महज पंद्रह दिन पहले चीन के बड़े कारोबारी समूह चाइना स्टेट ग्रिड ने कहा है कि वह अमरीका की कुछ कंपनियों में निवेश कर रही है.

इतना ही नहीं चीन अब फिल्म जगत में भी निवेश कर रहा है. अमरीका के सिनेमा चेन एएमसी थियेटर वांडा की मिल्कियत भी अब चीनी कंपनी के पास आ गई है.

मिल रही है सरकारी मदद

चीन के किसी भी कारोबारी समूह को विदेशी कंपनियों में निवेश करने से पहले सरकार से मंजूरी लेनी होती है क्योंकि देश से बाहर जाने वाली पूंजी पर सरकार का नियंत्रण होता है.

(भारत और चीन की आर्थिक ताकत)

लेकिन फूड, तकनीक और संसाधनों से जुड़े कारोबारी अधिग्रहण के लिए चीनी सरकार अंकुश नहीं लगाती. वहीं दूसरी ओर जब एक चीनी कारोबारी समूह ने दुनिया की मशहूर कार हमर को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई, तो उसे मंजूरी नहीं मिली.

दरअसल चीन की सरकार अपनी गोइंग ग्लोबल पॉलिसी के तहत दुनिया भर में निवेश को बढ़ावा दे रही है. यह नीति सन 2000 में लागू हुई थी.

इस नीति का उद्देश्य चीनी कारोबारी समूह को मल्टीनेशनल समूह में बदलना है ताकि वे चीनी की आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें.

दुनिया भर में चीनी कंपनियों की मौजूदगी से सरकार को भी व्यापक आर्थिक लाभ हो रहा है लिहाजा कई बार सरकार अधिग्रहण करने के लिए चीनी कंपनियों को विदेशी मुद्रा भंडार से मदद भी मुहैया कराती है.

'गोइंग ग्लोबल पॉलिसी'

Image caption इलेक्ट्रानिक्स उत्पाद बनाने वाली चीनी कंपनी लेनोवो ने 2005 में आईबीएम का अधिग्रहण किया था

चीनी कंपनियां मल्टीनेशनल बनने के लिए दूसरे देशों की भरोसेमंद और विश्वसनीय ब्रांडों को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रही हैं. इससे चीनी कंपनियों को उस ख़ास देश में अपने पांव मज़बूत करने में मदद मिल रही है.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण लेनोवो का है. कंप्यूटर और लैपटॉप बनाने वाली चीन की सबसे बड़ी कंपनी लेनोवो ने 2005 में आईबीएम को खरीदा था. उसके बाद अगले पांच सालों तक लेनोवो ने आईबीएम के ब्रांड नेम को भुनाया. इससे लेनोवो को ग्लोबल ब्रांड के तौर पर स्थापित होने में काफी मदद मिली.

हालांकि अधिग्रहण के मामलों में कुछ मुश्किलें भी सामने आती हैं. एक धारणा ये भी है कि जो कारोबारी समूह बिकवाली के कगार पर है, वे निश्चित तौर पर कामयाब समूह नहीं हैं.

इसकी काट भी लेनोवो ने निकाल ली थी. उन्होंने बाज़ार में बेहद सस्ते दरों पर उत्पाद पेश कर दिया. चीनी अधिग्रहण नीति में उत्पाद को सस्ता करने की नीति शामिल है. इसके अलावा उत्पाद को कहीं विस्तृत बाज़ार में उतारा जाता है.

विश्वसनीय ब्रांडों पर दांव

चीन के कारोबारी घरानों के प्रोमोटर दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ताओं के बाजार में उतरने के लिए हर तरकीब अपना रहे हैं.

खाद्य उत्पादों में ब्रांडों की अहमियत और गुणवत्ता सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है. शुआनजुही ब्रांड पर पिछले दिनों सवालिया निशान लगा था, जब उसके उत्पादों में क्लेनबुट्रल रसायन पाए जाने का मामला सामने आया था. इस रसायन की मदद से मांस को पतला किया जाता है.

यही वजह है कि कंपनी ने अपनी छवि चमकाने के लिए स्मिथफ़ील्ड के प्रति शेयरों की बोली 34 डॉलर की लगाई, जो नीलामी की शुरुआत में लगी बोली के तीन गुणे से भी ज़्यादा थी.

वैसे, सुअर का मांस चीनी लोगों के भोजन का मुख्य हिस्सा है. लेकिन अब भी इसके कारोबार में वृद्धि की संभावना है.

चीन के आर्थिक विकास की नीति में विदेशों में निवेश एक अहम पहलू बनता जा रहा है, ऐसे में माना जा रहा है कि शुआनजुही के अधिग्रहण से भी बड़े अधिग्रहण का मामला ज़ल्दी ही सामने आएगा.

ऐसे में एक बड़ा सवाल ये कि क्या चीनी कंपनियां एक दिन दुनिया भर की कंपनियों को खरीद लेंगी?

ऐसा नहीं लगता क्योंकि चीन अभी भी विदेशों में जितना निवेश कर रहा है, उससे कहीं ज़्यादा पूंजी उसके यहां निवेश की जा रही है.

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