बचपन की बातों को क्यों भूल जाते हैं हम?

Image caption मस्तिष्क की कोशिकाओं के विकसित होने से यादाश्त प्रभावित होती है

हम-आप ज्यों-ज्यों बड़े होते हैं त्यों-त्यों अपने बचपन की बातों को भूलते जाते हैं. इसे महसूस तो किया ही होगा आपने. लेकिन आख़िर ऐसा होता क्यों है?

कनाडा के वैज्ञानिकों की मानें तो मस्तिष्क में बनने वाली कोशिकाओं और तंत्रिकाओं के चलते ही हम अपने बचपन की बातों को भूल जाते हैं.

नवजात अवस्था से ज्यों-ज्यों हम बढ़ते हैं त्यों-त्यों हमारे मस्तिष्क की तंत्रिकाएं-कोशिकाएं भी बढ़ती हैं, इससे हमारे सीखने की क्षमता तो बढ़ती है लेकिन हम पुरानी बातों को भूल जाते हैं.

यह शोध अध्ययन कनाडा के न्यूरोसाइंस एसोसिएशन के सामने रखा गया है.

कोशिकाओं से है रिश्ता

टोरंटो के हॉस्पिटल फ़ॉर सिक चिल्ड्रेन के डॉ. पॉल फ्रैंकलैंड और यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो की डॉ. शहीना जॉस्लीन ये पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि किस तरह मस्तिष्क की कोशिकाएं हमारी याददाश्त पर असर डालती हैं.

Image caption बचपन की बातें हमें लंबे समय तक याद नहीं रहतीं

ऐसे में उन्होंने अपना ये प्रयोग कम और ज़्यादा उम्र के चूहों पर किया.

इन दोनों वैज्ञानिकों ने ये देखा कि ज़्यादा उम्र के चूहों में स्मृति विकसित होने के बाद मस्तिष्क की कोशिकाओं के बढ़ने से उनमें भूलने की क्षमता बढ़ती है.

जबकि नवजात चूहों में वैज्ञानिकों ने देखा कि स्मृति विकसित होने के बाद मस्तिष्क कोशिकाओं के घटने से भूलने की क्षमता पर असर नहीं पड़ता.

इस शोध के मुताबिक़ मस्तिष्क कोशिकाओं में कमी से हमारी चीज़ों को याद करने की क्षमता बढ़ती है. इस शोध में ये भी पाया गया कि मस्तिष्क कोशिकाओं के बढ़ने से हमारी याद करने की क्षमता कमती है.

शोध बेहद महत्वपूर्ण

पहले हुए अध्ययनों में ये देखा गया है कि बच्चों में छोटे समय अंतराल की बातों को याद रखने की क्षमता होती है लेकिन ये यादें समय के साथ टिकतीं नहीं.

टोरंटो के हॉस्पिटल फ़ॉर सिक चिल्ड्रेन के न्यूरोसाइंस एंड मेंटल हेल्थ विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. फ्रैंकलैंड कहते हैं, ''बचपन की बातों के भूलने की वजह लंबे समय तक पहेली बनी रही.''

फ्रैंकलैंड कहते हैं, ''हम सोचते हैं कि हमारे अध्ययन से लोगों को ये समझने में मदद मिलेगी कि हम अपने बचपन की बातों को क्यों भूल जाते हैं. चार या पांच साल से पहले हमारे मस्तिष्क में तेजी से कोशिकाएं बनती हैं जिसके चलते उस दौर की बातें याद नहीं रहतीं.''

सिटी यूनिवर्सिटी, लंदन के काजिनिटिव न्यूरोसाइंस रिसर्च यूनिट की प्रोफ़ेसर डॉ. बेटिना फॉरेस्टर कहती हैं, ''ये काफ़ी दिलचस्प अध्ययन है और इसने तंत्रिका तंत्र और हमारी याददाश्त में सीधा संबंध जोड़ा है.''

हालांकि बेटिना फॉरेस्टर ये भी कहती हैं कि इस नए अध्ययन के सामने आने से इस पहलू पर पहले की मनोवैज्ञानिक और मानसिकता संबंधी सिद्धांतों पर सवालिया निशान लग गए हैं.

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