मुश्किल है 'संदिग्ध आतंकवादियों' की निगरानी?

Image caption कहा जा रहा है कि बॉस्टन धमाके के संदिग्धों के बारे में पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों को पहले सी ही पता था

अमरीका में बॉस्टन मैराथन के दौरान हुए बम विस्फोट और लंदन के वुलिच में एक सैनिक की हत्या के बाद ये तथ्य उभर कर सामने आ रहे हैं कि संदिग्धों के बारे में सुरक्षा एजेंसियों को पहले जानकारी थी.

इसी वजह से सुरक्षा एजेंसियों की आलोचना भी हो रही है.

अब सवाल उठता है कि क्या सुरक्षा एजेंसियों के लिए ये संभव है कि वो हर एक संदिग्ध पर निगाह रख सके.

22 मई को वुलिच में सैनिक की हत्या के बाद माइकल एडेबोलाजो और माइकल एडेबोवाले के नाम अब तो हर किसी को पता हैं. लेकिन जांच के बाद ये पता चला है कि इन दोनों के बारे में ब्रिटेन की गुप्तचर एजेंसी, एमआई-5 पहले से ही जानती थी.

अब ब्रिटिश संसद की गुप्तचर और सुरक्षा समिति इस बारे में गुप्तचर एजेंसी की कार्रवाई की जांच कर रही है.

दूसरी ओर बॉस्टन धमाके के संदिग्ध तमरलान सारनाएफ़ से 2011 में अमरीकी जाँच एजेंसी एफबीआई ने पूछताछ की थी.

उस समय ये दावा किया गया था कि सारनाएफ ने कट्टरपंथी इस्लाम अपना लिया था.. उनकी हरकतों के बारे में भी अमरीकी गुप्तचर एजेंसी को पता था.

संसाधन की कमी

Image caption वुलिच हत्याकांड के आरोपियों के बारे में भी पुलिस को जानकारी थी

लेकिन क्या ये संभव है कि हर उस शख्स पर निगाह रखी जाए जो सुरंक्षा एजेंसियों के शक के दायरे में आता है.

एमआई-5 की पूर्व प्रमुख डेम स्टेला के मुताबिक "नहीं." इसे समझने के लिए अंकों का हिसाब किताब समझना होगा.

हालांकि पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता लेकिन ब्रिटेन में 2000 लोग ऐसे हैं जिनके नाम आतंकवाद निगरानी सूची में हैं.

अगर इनमें से एक भी आदमी पर लगातार चौबीसों घंटे निगाह रखनी है तो कम से कम छह लोगों की एक टीम चाहिए. चूंकि वो लोग चौबीसों घंटे काम नहीं कर सकते इसलिए ऐसे ही छह-छह लोगों की तीन टीम चाहिए होगी.

स्टेला कहती हैं कि ये लोग जाकर संदिग्ध के घर के सामने तो बैठ नहीं सकते. इसके लिए एक और आदमी की जरूरत होगी जो संदिग्ध पर निगाह रखेगा. जैसे ही संदिग्ध घर के बाहर निकलेगा वो दूसरी टीमों को इस बारे में जानकारी देगा.

दिन रात काम

इसके बाद कंट्रोल रूम का काम शुरु होता है. यहां पर सुरक्षा एजेंसियों को मोबाइल ऑपरेटर से सूचनाएं मिलती हैं. फिर उन सूचनाओं के आधार पर निर्देश जारी किए जाते हैं.

इन सबके अलावा एक डेस्क ऑफिसर भी चाहिए होगा जो इस केस की छानबीन करेगा. स्टेला के मुताबिक, “सातों दिन 24 घंटे काम करने के लिए बहुत सारे लोगों की जरूरत होगी. ”

अगर इसी हिसाब से 2000 लोगों पर निगाह रखनी है तो इसके लिए 50 हज़ार लोगों की जरूरत होगी जो दिन रात यही काम करेंगे.

इसका मतलब ये हुआ कि ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी की जो वर्तमान संख्या है उससे दस गुना ज्यादा लोगों की जरूरत एमआई-5 को होगी.

सीधा गणित ये है कि इसमें खर्चा भी बहुत आएगा. हर एक संदिग्ध का चौबीसों घंटे पीछा नहीं किया जा सकता. हालांकि तकनीक एक विकल्प उपलब्ध कराती है लेकिन ये भी एक दूसरे तरह की समस्या पैदा कर देती है.

निर्दोष भी फंसते हैं

Image caption सीसीटीवी कैमरा और फोन कॉल्स की मदद से संदिग्धों तक पहुंचा जा सकता है

कल्पना कीजिए कि सुरक्षा एजेंसियों को हर तरह की सुविधाएं दे दी गई हैं और वो फोन कॉल के जरिए संदिग्धों पर निगाह रख रही हैं.

एक पल के लिए ये भी मान लेते हैं कि वो 99 प्रतिशत सच होने की गारंटी के साथ शुरुआत के तीन शब्दों को सुनकर 'आतंकवादी' बनने वाले व्यक्ति की खोज कर लेते हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में निर्दोष लोगों के भी फंसने की संभावना होती है.

अमरीका के पेन्सिलवानिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल में सांख्यिकी के प्रोफेसर हावर्ड वेनर कहते हैं,“मान लीजिए कि अमरीका में कुल 3000 आतंकवादी हैं जबकि यहां की आबादी है 30 करोड़. तो अगर आप हर एक आदमी की फोन कॉल सुन रहे हैं और आपका सॉफ्टवेयर 99 प्रतिशत सही है तो भी एक प्रतिशत आदमी वो पकड़े जाएंगे जो निर्दोष हैं."

वेनर कहते हैं कि असल में आतंकियों की पहचान करने वाला सॉफ्टवेयर 99 फीसदी सही भी नहीं होता.

एमआई-5 के लिए काम करने वाले निगेल इंकस्टर कहते हैं कि यह अनुमान लगाना वास्तव में कठिन है कि कौन चरमपंथी हो जाएगा. और कौन आगे जाकर हिंसा फैलाएगा.

वास्तव में संदिग्ध कौन?

तकनीक के सहारे संदिग्धों की खोज का मतलब ये है कि गुप्तचर एजेंसियां कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हुए सही सूचनाओं को अलग करें और उसी आदमी के खिलाफ कार्रवाई करें जो वास्तव में संदिग्ध हो.

सोशल मीडिया में किसी संदिग्ध की खोज के लिए एल्गोरिदम (गणित की एक प्रणाली) इस्तेमाल करते हैं. इसमें की वर्ड के आधार पर संदिग्धों की खोज करते है. यही तरीका हवाई यात्रा के रिकॉर्ड खंगालकर संदिग्धों की पहचान में भी लागू होता है.

डरहम विश्वविद्यालय की प्रोफेसर लुइस एमूरे का कहना है कि इस तरह की तकनीक भी सीमित रूप से फायेदमंद है. इस प्रक्रिया में पुराने आकंड़ों का इस्तेमाल किया जाता है.

निगेल इंकस्टर कहते हैं कि जरूरत से ज्यादा आंकडे़ होना भी एक समस्या है जिससे गुप्तचर एजेसियों को निपटना होता है.

डेम स्टेला कहती है कि ये जानी पहचानी समस्या है. वो कहती हैं कि ये पूर्वी जर्मनी की गुप्तचर एजेंसी तासी के साथ भी हुआ था. उनके पास सूचनाओं का भंडार था.

वो कहती हैं, “ ज्यादा सूचनाओं से भी सुरक्षा एजेंसियों का दम घुटने लगता है क्योंकि उनके लिए ये तय करना मुश्किल होता है कि उनके लिए क्या जरूरी हो सकता और क्या नहीं.”

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