सुनामी बाद बदली शिक्षा पद्धति

फुकुशिमा
Image caption जापान में 11 मार्च 2011 में भूकंप के बाद सुनामी आई थी.

जापन में भूकंप के बाद आई विनाशकारी सुनामी में बर्बाद हो चुकी शिक्षा प्रणाली को दोबारा कैसे शुरु किया जा सकता है?

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन में शिक्षा मामलों पर विशेष सलाहकार अंद्रियास श्लेशर फुकुशिमा में हुए परमाणु हादसे के दो साल बाद जापान में इसी संबंध में की जा रही कोशिशों के बारे में बता रहे हैं.

फुकुशिमा दायची परमाणु संयंत्र को बंद किया जा चुका है, वहां साफ सफाई का अभियान जारी है और हर सार्वजनिक इमारत पर रेडियोधर्मी रिसाव को मापने वाले उपकरण लगाए गए हैं. ये उपकरण बताते है कि वहां रेडियोधर्मी रिसाव का स्तर कम हुआ है.

लेकिन इन परमाणु खतरें को लेकर चिंता और अनिश्चतता ने इसे लेकर की जा रही कोशिशों और पहल को भी गतिहीन कर दिया है.

भूकंप

जापान में 11 मार्च 2011 को आए भूकंप के बाद उठी विनाशकारी सुनामी लहरों की चपेट में फुकुशिमा परमाणु ऊर्जा संयंत्र आ गया था. इस संयंत्र को भारी नुकसान हुआ था.

संयंत्र से हुए विकिरण रिसाव के चलते आस-पास के इलाके को खाली करवाना पड़ा था. इस घटना ने परमाणु ऊर्जा की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े किए थे.

वहीं जापान में इस बात को लेकर बहस जारी है कि इस प्रदुषित ढेर को कहां डाला जाए. यहां रह रहे लोग अपने घर के आगे इस कचरे के ढेर के साथ रहने को मजबूर हैं.

लेकिन पर्यावरण के खतरे से ज्यादा बड़ा डर नई यथास्थिति को मंजूर कर लेना है, ये ख़ासकर उन स्कूली बच्चों को लेकर है जिनकी भूंकप से पहले की यादें ओझल हो रही हैं.

शिक्षा प्रणाली

Image caption सुनामी की चपेट में फुकुशिमा परमाणु संयंत्र आ गया था .

लेकिन यह एक तरह से शिक्षा प्रणाली को दूसरे तरीके से दोबारा शुरु करने का मौका भी है.

इसने जापान की शिक्षा प्रणाली में जो मतभेद है - जैसे सरकारी और निजी शिक्षा क्षेत्र और पारंपरिक अकादमिक शिक्षा और 'हल्के फुल्के हुनर' के बीच जो दिवार खिंची हुई है उसे तोड़ने का भी एक मौका दिया है.

परमाणु संयंत्र के दायरे में आने वाला ओखमा जुनियर हाई स्कूल को एजू वाकमटसु शहर में स्थापित कर दिया गया है. स्थानीय स्कूल के अधिक्षक टकेओची का कहना है कि स्कूल के बच्चे अपने ही देश में अप्रवासी हो गए हैं.

जापान में एक समुह के लोगों के बीच सामाजिक जुड़ाव है लेकिन वे अपने समुदाय में किसी बाहरी को शामिल करने में कम ही सफल हुए हैं, चाहे वो पड़ोस में स्थित गांव ही क्यों न हो.

ओखमा हाई स्कूल की बात जाए तो यहां एक ऐसे तरह का माहौल बना हैं जो काफी आधुनिक है.

वहां कलात्मकता, समस्याओं के समाधान, स्थानीय लोगों के साथ जोड़ने पर जोर दिया जाता है. ये दृष्टिकोण जापान में पारंपरिक मॉडल से अलग है.

मॉडल

दुनिया के वास्तविक मु्द्दों से निपटने के लिए इसे अन्य स्कूलों ने भी अपनाया है.

उत्तर फुकुशिमा के डेट शहर में शिक्षक, छात्र और समुदाय के लोगों के साथ मिलकर स्थानीय किसानों की आजीविका से जु़ड़े ख़तरे जैसे अहम मसले पर काम कर रहे हैं.

प्रदुषण को लेकर जो अफवाहें फैली है उससे वहां हुई पैदावर की ब्रिकी पर असर पड़ रहा है.

कॉलेज में पढ़ रहे एक छात्र आई ने रोते हुए बताया कि कैसे उसके दादा दूसरे साल भी अपनी जिंदगी की कमाई, तेंदू फल की फसल को ज़मीन में गाड़ना पड़ा क्योंकि वे उसे बेचने में असफल रहें.

ये अफवाहें बाजार में कीमतों को कैसे प्रभावित करती हैं, इस बात को समझाने के लिए यानागवा जुनियर हाई स्कूल में एक शिक्षक ककुता छात्रों जापान के के कृषि संघ लेकर जाते हैं.

इन छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर इस समस्या का समाधान निकालने पर काम किया और इन लोगों ने फ्रूट जेली बेचने की योजना बनाई.

किसानों की मदद

Image caption टेप्को का कहना है कि उसे सालभर में लगभग दस अरब डॉलर का नुकसान हुआ है.

किसानों के लिए इस योजना का मकसद नया भविष्य हो सकता है और छात्रों के लिए इसका मतलब अकादमिक शिक्षा से हटकर व्यावहारिक ज्ञान और समुदाय के साथ जुड़ना हो सकता है.

जापान में शोध कराने वाली युनिवर्सिटी इन स्थानीय मुद्दों के समाधान निकालने के लिए वहां के स्कूलों के छात्रों और शिक्षकों से राय मशविरा नहीं लेती है.

लेकिन फुकुशिमा युनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर मियूरा ने अपने शोध को छोड़ अब इन स्कूलों को नए सिरे से तैयार करने का काम अपने हाथ में ले लिया है.

इस संबंध में उन्होंने शिक्षकों, नीतिकारों और स्थानीय प्रशासन को साथ जोड़ने की कोशिश की हैं. वे इन लोगों में समझ का दायरा बढ़ाने और किसी भी चीज़ समझने की शैली विकसित करने और उसे गहरी समझ तक विस्तार देने की दिशा में काम कर रहे हैं.

युनिर्सिटी के साथ साथ इस प्रयास में राष्ट्रीय शिक्षा मंत्रालय, स्थानीय प्रशासन, निरीक्षकों, स्कूलों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे की यूनेस्को और ओईसीडी भी साथ में आए हैं.

जापान में किसी भी क्षेत्र के आधारभूत ढ़ाचे के पुनर्निमाण की क्षमता है लेकिन अब उनमें ये जागरुकता भी आई है कि वो दुनिया भर की शैक्षणिक दक्षता को भी सीख सकते हैं.

फुकुशिमा के इस उदाहरण से ये सबक लेने की कोशिश भी हो रही है, क्या इस प्रयोग को जापान में कहीं और दोहराया जा सकता है.

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