एयरफ़ोर्स पायलट जो मिशन पर बेटी को ले गई

  • 20 जून 2013

लतीफ़ा नबीज़ादा अफ़ग़ानिस्तान की वायु सेना में पायलट बनने वाली पहली महिला हैं लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें काफी लंबा संघर्ष करना पड़ा.

पहले तो उन्हें सामाजिक पूर्वाग्रहों को झेलना पड़ा. इसके बाद तालिबान की धमकी और फिर एक हिला देने वाला हादसा.

इन सबके बावजूद ज़िंदगी की जद्दोजहद करते हुए उनका भरोसा डगमगाया नहीं और अब अपनी बेटी को लेकर उनके सपने कहीं ज्यादा ऊंचे हैं.

बीबीसी के ख़ास कार्यक्रम आउटलुक में लतीफ़ा ने बताया, “मैं अपनी बहन से हमेशा तारे और अंतरिक्ष की बातें करती थी. हम हवाई जहाज़ की बातें भी करते थे. हम सोचते थे कि हवा में उसे उड़ाने का अनुभव कैसा होगा.”

जब बचपन से हवाई जहाज़ में दिलचस्पी हो तो फिर वही हुआ, जिससे लतीफ़ा के घर में कोहराम मच गया. स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों बहनों ने अपने घर में घोषणा कर दी कि हमें तो पेशेवर पायलट ही बनना है.

सच हुआ सपना

माता-पिता सकते में आ गए. तब अफ़गानिस्तान में इक्का-दुक्का महिलाएं ही काम के लिए बाहर निकलती थीं.

ऐसे में पायलट बनना तो किसी क्रांति से कम नहीं था लेकिन दोनों बहनों ने अपने माता-पिता को इसके लिए मना लिया.

पर ये तो मुश्किलों की शुरुआत भर थी. इसके बाद लतीफ़ा और ललियूमा को अफगान सैनिक स्कूल ने स्वास्थ्य आधार पर नामांकन देने से इनकार कर दिया.

हालांकि 1989 में एक चिकित्सक से मिले स्वास्थ्य प्रमाण पत्र के आधार सैनिक स्कूल को इन दोनों को नामांकन लेना पड़ा.

तब सैनिक स्कूल में महिलाओं के लिए यूनिफॉर्म नहीं होती थे, लिहाज़ा दोनों को अपने कपड़े खुद बनाने पड़े.

स्कूल में दूसरे छात्र उन्हें खूब परेशान करते थे लेकिन दोनों की हिम्मत के सामने सारी दुश्वारियाँ पीछे छूटती गई.

इसका नतीजा निकला कि दोनों अफ़ग़ानिस्तान के वायुसेना इतिहास की पहली महिला पायलट बन गईं.

तालिबानियों से लोहा

पहली बार प्रायोगिक परीक्षा के लिए लतीफ़ा को मज़ार-ए-शरीफ में विमान उड़ाने का मौका मिला. तो पहली बार विमान उड़ाने के दौरान लतीफ़ा के मन में ढेरों ख़्याल उमड़ रहे थे.

(करिश्माई महिला पॉयलट की गुमशुदगी की कहानी)

उन ख़्यालों के बारे में बताते हुए वे बताती हैं, “काफी शानदार लग रहा था और मैं सोच रही थी कि मेहनत रंग लाती है. मेरे टीचर ने मुझे लगातार कह रहे थे कि ध्यान रखो और नीचे देखो, सरकारी अधिकारी अपने हाथों में फूल लिए तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं.”

1996 में काबुल में तालिबान मज़बूत होने लगा. ऐसे मे लतीफ़ा और ललियूमा को मज़ार-ए-शरीफ़ जाना पड़ा.

उस समय के बारे में लतीफ़ा ने बताया, “जनरल दोस्तम उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के कमांडर थे. उन्होंने हमारी काफी मदद की. वे महिला अधिकारों के समर्थक थे. उनके समय में हम मिशन के लिए उड़ान भरा करते थे. तालिबानियों से लड़ते थे.”

तालिबानी साम्राज्य के दौरान अफ़ग़ानिस्तान की कई कामकाजी महिलाओं को पाकिस्तान भागना पड़ा था.

बहन से छूट गया साथ

ब्रिगेडियर जनरल खातूल मोहम्मदाजी अफ़ग़ानिस्तान की सेना की पहली महिला पैराट्रूपर थीं. 1984 में वायुसेना से जुड़ने के बाद वे 600 से ज़्यादा छलांग लगा चुकी थीं लेकिन तालिबानी शासन के दिनों में उन्हें घर में बैठक सिलाई कढ़ाई का काम करना पड़ रहा था.

तालिबानी शासन के ख़त्म होने के बाद लतीफ़ा काबुल पहुंचीं. रात का वक्त होने के बाद भी लतीफ़ा सैन्य बेस पहुंच गईं.

इस बारे में उन्होंने बताया, “मैं रात में ही वहां पहुंच गई कि मुझे काम करना है.”

इसके बाद लतीफ़ा की ज़िंदगी आसान नहीं हुई. दोनों बहनों की शादी हुई और 2006 में दोनों बहनें कुछ सप्ताह के अंतराल पर गर्भवती हुईं.

इस दौरान भी दोनों बहनों ने हवाई जहाज़ उड़ाने का सिलसिला थमने नहीं दिया.

लेकिन इस दौरान लतीफ़ा को एक बड़ी पीड़ा झेलनी पड़ी. प्रसव के दौरान उनकी बहन ललियूमा की मौत हो गई.

हेलीकॉप्टर बेटी की कहानी

इस हादसे के बारे में लतीफ़ा बताती हैं, “डॉक्टरों ने मेरी बहन से पूछा था कि वे ख़ुद को बचाना चाहती हैं या फिर बेबी को. तो मेरी बहन ने कहा था कि बेबी को किसी तरह से बचाइए.”

इसके अगले दिन लतीफ़ा की बहन की मौत हो गई.

इस हादसे ने लतीफ़ा को झिंझोड़ कर रख दिया. आखिरकार दोनों बहनें एक साथ बड़ी हुई थीं, एक साथ पढ़ाई की, एक साथ वायुसेना के विमानों को उड़ाना शुरू किया था. कई ख़तरनाक मिशन को साथ में अंजाम तक पहुंचाया.

लेकिन जीवन के सफ़र में अब साथ छूट चुका था.

लतीफ़ा कहती हैं कि वायुसेना के कई अधिकारियों ने उन्हें संत्वना भरे शब्दों में कहा था कि वे अब कभी कमाल करने वाली बहनों की ऐसी जोड़ी को फिर कभी नहीं देख पाएंगे.

लतीफ़ा कहती हैं, “मैं आपको बता नहीं सकती कि उसके बिना एक दिन भी गुज़ारना कितना मुश्किल होता है.”

आसमान छूने का सपना

हालांकि इसके बाद लतीफ़ा ने अपनी बेटी मलालाई और बहन की बेटी मरियम को पाला, लेकिन कुछ ही महीने के भीतर वो अपने काम पर लौट आईं.

(पाकिस्तानी की महिला पॉयलट)

लेकिन ये इतना आसान भी नहीं था. क्योंकि घर पर बेटी और भतीजी की देखभाल करने वाला कोई नहीं था.

ऐसे में मललाई को वे अपने साथ हेलीकॉफ्टर में ले कर जाने लगीं. वे कहती हैं, “मेरी बेटी हेलीकॉप्टरों के साथ बड़ी हुई है, ऐसे में कई बार मैं सोचती हूं कि वो मेरी बेटी न होकर हेलीकॉप्टर की बेटी है.”

इस दौरान कई बार अफ़ग़ानी सेना के साथ काम कर रहे अमरीकी सैनिकों ने लतीफ़ा को अपने साथ बेटी को लाने के लिए टोका भी. लेकिन लतीफ़ा उन्हें मनाने में कामयाब रहीं कि इससे उनके उड़ान भरने पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

मलालाई अब स्कूल जाने लगी है. जब कोई उससे माता-पिता के बारे में पूछता है तो वो अपने पिता का नाम लेने की जगह कहती है कि मैं पायलट लतीफ़ा की बेटी हूँ. मलालाई की दिलचस्पी अंतरिक्ष में हैं.

लतीफ़ा अपनी बेटी को अफ़ग़ानिस्तान की पहली अंतरिक्ष यात्री बनाना चाहती हैं.

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