‘सामाजिक छूत’ की बीमारी है ताली

ताली
Image caption शोधकर्ताओं के मुताबिक ताली बजाने की शुरूआत या अंत एक या दो लोग करते हैं.

आमतौर पर ये माना जाता है कि जिस व्यक्ति को सबसे ज्यादा तालियां मिलती हैं उसका प्रदर्शन या प्रस्तुति सबसे बेहतर होती है.

लेकिन एक शोध से पता चलता है कि तालियों की गड़गड़ाहट का प्रदर्शन या प्रस्तुति की उत्कृष्टता से कोई लेनादेना नहीं है. ये छूत की बीमारी की तरह है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैलती है.

वैज्ञानिकों ने शोध से ये निष्कर्ष निकाला है कि तालियों की गड़गड़ाहट इस बात पर निर्भर करती है कि भीड़ में दूसरे सदस्य कैसे व्यवहार करते हैं.

उनका कहना है कि कुछ लोग ताली बजाना शुरू करते हैं और फिर वहां मौजूद जनसमूह इसकी चपेट में आ जाता है. इसे रोकने के लिए भी एकाध लोग जिम्मेदार होते हैं.

स्वीडन के वैज्ञानिकों का ये अध्ययन जर्नल ऑफ़ द रॉयल सोसाइटी इंटरफेस में प्रकाशित हुआ है.

अध्ययन

शोध दल के प्रमुख डॉक्टर रिचर्ड मान उपसाला विश्वविद्यालय से हैं. उन्होंने कहा, “एक जैसे प्रदर्शन के लिए आपको कम या ज्यादा समय तक ताली मिल सकती है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि दर्शकों में कैसे लोग बैठे हैं.”

इस शोध के तहत अंडरग्रेजुएट छात्रों के अलग-अलग समूहों के एक वीडियो का अध्ययन किया गया जो एक प्रस्तुति को देख रहे हैं.

वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल एक या दो लोग ही ताली बजाने की शुरूआत करते हैं और फिर देखते ही देखते सभी लोग ताली बजाने लगते हैं.

ये एक फैलने वाली प्रक्रिया है. ताली की आवाज़ से दूसरे दर्शक या स्रोता भी इसमें शामिल हो जाते हैं.

डॉक्टर मान ने कहा, “आपके पड़ोस में बैठा व्यक्ति जब ताली बजाता है तो आप पर भी ऐसा करने के लिए सामाजिक दबाव पड़ता है.”

गड़गड़ाहट

किसी प्रदर्शन या प्रस्तुति को कितनी देर तक तालियां मिलती है इससे आप उस प्रदर्शन या प्रस्तुति की उत्कृष्टता का अंदाजा नहीं लगा सकते.

शोधकर्ताओं ने पाया कि तालियों की गड़गड़ाहट के समय में बहुत अंतर होता है.

डॉक्टर मान ने बीबीसी न्यूज़ से कहा, “एक मामले में एक दर्शक हर व्यक्ति के लिए दस बार ताली बजाता है जबकि दूसरे मामले में तीन बार.”

उन्होंने कहा, “आप पर ताली बजाने के लिए सामाजिक दबाव पड़ता है लेकिन एक बार आपने ताली बजानी शुरू कर दी तो फिर आप पर इसे नहीं रोकने के लिए भी बराबर सामाजिक दबाव रहता है जब तक कि कोई और पहल न करे.”

सामाजिक संक्रमण

वैज्ञानिकों का मानना है कि ताली बजाना भी ‘सामाजिक संक्रमण’ का ही एक रूप है जिससे पता चलता है कि कोई विचार या प्रक्रिया कैसे बनती-बिगड़ती है.

उनका कहना है कि इस शोध से सामाजिक व्यवहार के अन्य क्षेत्रों के रहस्य भी उजागर हो सकते हैं. जैसे कि कैसे कोई चलन बढ़ता या घटता है या फिर इंटरनेट पर कोई विचार कैसे जोर पकड़ता है.

डॉक्टर मान ने कहा, “यहां हमने इस बात की भी जांच की कि आप कमरे में मौजूद लोगों की कुल संख्या से प्रभावित होते हैं या फिर बगल में बैठे व्यक्ति से.”

उन्होंने कहा, “फ़ेसबुक और ट्विटर पर इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि आप किसी प्रक्रिया में कैसे शामिल होते हैं? बहुत सारे लोगों की राय देखकर या फिर अपने क़रीबी दोस्तों की राय पर.”

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