हार्ड कॉपी से ई-बुक तक

ई किताब

डिजिटल पब्लिशिंग का बढ़ता प्रचलन फ़ोटोग्राफिक किताबों के प्रकाशकों से लिए चुनौती बनकर उभरा है.

कई फ़ोटोग्राफरों के लिए बुक फार्मेट अपने काम को पाठकों तक पहुंचाने का आदर्श तरीका है. इसमें पाठक को एक पूर्व निर्धारित क्रम में तस्वीरों को देखने का मौका मिलता है.

एक शानदार किताब का स्पर्श ही अद्भुत एहसास देता है और इसे लंबे समय तक संजोकर रखा जा सकता है.

लेकिन ई-बुक्स और बुक आधारित ऐप्स के आने से इसमें कई आयाम जुड़ गए हैं.

चुनौती

अमेजन के संस्थापक जैफ बेजोस के मुताबिक ई-बुक्स का कारोबार अरबों डॉलर तक पहुंच गया है. हालांकि अभी तक बाज़ार में टेक्स्ट बुक्स का ही दबदबा है लेकिन इससे फ़ोटोग्राफिक प्रकाशकों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है.

लंदन के प्रकाशक एमएपीपी के माइकल मैक ने कहा, “किताब की दुकानों को ऑनलाइन बिक्री के समक्ष अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है."

उन्होंने कहा, "ऑनलाइन बिक्री से आपको घर या दफ़्तर में ही किताब मिल जाती है, तो फिर क्यों कोई किसी दुकान में जाने की जहमत उठाएगा.”

उनका कहा है कि कीमत की भी इसमें अहम भूमिका है. उन्होंने कहा कि फ़ोटोग्राफिक किताबों को प्रकाशित करना महंगा पड़ता है और उनकी बिक्री भी सीमित होती है.

मैक ने कहा कि उनका काम समय से पहले ही पुराना पड़ गया है.

एमएपीपी जैसे प्रकाशकों ने वक्त की नजाकत को देखते हुए अब ई-बुक्स पर जोर देना शुरू कर दिया है.

योजना

मैक ने कहा कि एमएपीपी एक ऐसी योजना पर काम कर रहा है जो डिजिटल वर्क की एक लाइब्रेरी ऑफर करेगी. इसमें नई और संशोधित पांडुलिपियों और टेक्स्ट का सम्मिश्रण होगा.

उन्होंने कहा कि डिजाइन के मामले में ऐप्स की क्षमताएं असीमित हैं. लेकिन साथ ही इसकी कुछ बाध्यताएं भी हैं. यही वजह है कि एमएपीपी ई-बुक्स पर जोर दे रही है जिसमें कोई बाध्यता नहीं है.

मैक ने कहा, “हम ऐसे लोगों और संस्थाओं के साथ काम कर रहे हैं जिनके पास विषयवस्तु का बड़ा संग्रह है. इनमें जेम्स बांड के प्रोड्यूसर माइकल विल्सन और अन्य कई संग्रहालय और पुस्तकालय शामिल हैं.”

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