मुस्लिम ब्रदरहुड: कहाँ गायब हो गए ब्रदर

मिस्र में विरोध प्रदर्शन

मिस्र में कुछ दिन पहले तक मुस्लिम ब्रदरहुड के वरिष्ठ नेता सरकारी टीवी, टॉक शो और रेडियो स्टेशनों पर छाए रहते थे. अब पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को वे ढूढ़ने पर भी नज़र नहीं आ रहे हैं.

सेना और पुलिस के अभियान के चलते मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता या तो हिरासत में हैं या फिर छिपते फिर रहे हैं.

हिरासत में लिए गए कुछ नेताओं पर आरोप है कि उन्होंने अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी के समर्थकों को उनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों की हत्या के लिए उकसाया था.

ब्रदरहुड के मुखपत्र 'जस्टिस एंड एमपावरमेंट' के संपादक मुस्तफा अल ख़ातिब का कहना है कि मौजूदा घटनाक्रम इस बेहद संगठित संगठन के लिए एक झटका है.

उन्होंने कहा, “गिरफ़्तारी वारंट लगातार जारी हो रहे हैं. मुबारक के ज़माने की दमनकारी नीतियां भयानक रूप से एक बार फिर शुरू हो गई हैं. मुस्लिम ब्रदरहुड का पहचान पत्र रखने वाले लोगों की धरपकड़ हो रही है.”

30 जून को राजधानी काहिरा और देश के अन्य शहरों में लाखों लोगों ने मुर्सी के इस्तीफ़े की मांग को लेकर जबर्दस्त प्रदर्शन किया. उनका आरोप था कि मुर्सी देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था और सामाजिक समस्याओं का समाधान निकालने में नाकाम रहे हैं.

प्रदर्शन

वे एक बार फिर उसी तहरीर चौक पर जमा हुए जो 2011 में राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के ख़िलाफ़ हुए व्यापक प्रदर्शनों का केन्द्र था.

इस व्यापक जन समर्थन के दम पर सेना ने लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए देश के पहले राष्ट्रपति मुर्सी को उनके पद से हटा दिया.

खातिब ने कहा कि वो भी किसी समय गिरफ़्तार हो सकते हैं लेकिन इस कार्रवाई से मुस्लिम ब्रदरहुड के अस्तित्व को कोई खतरा नहीं है.

उन्होंने कहा, “हम एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये केवल लोगों का एक जत्था नहीं है.”

मुस्लिम ब्रदरहुड की स्थापना 1928 में एक अध्यापक और इमाम हसन अल बन्ना ने की थी और ये देश का सबसे पुराना और सबसे बड़ा मुस्लिम संगठन है.

इसकी विचारधारा ‘दावा’ से प्रभावित है जो नैतिक मूल्यों और इस्लामी सिद्धांतों की बात करता है.

मुस्लिम ब्रदरहुड के लक्ष्यों में देश में इस्लामी क़ानून यानी शरिया का राज स्थापित कायम करना शामिल है. इसका सबसे चर्चित नारा है, “इस्लाम समाधान है.”

दमन

Image caption मुस्लिम ब्रदरहुड की स्थापना हसन अल बन्ना ने की थी

इस संगठन को 1950 के दशक से लगातार सैन्य शासकों के हाथों दमन का शिकार होना पड़ा. 2011 में हुई व्यापक जनक्रांति के बाद हुए संसदीय और राष्ट्रपति चुनावों में मुस्लिम ब्रदरहुड को जीत मिली.

कई साल तक इसके नेताओं को भूमिगत रहने के लिए मजबूर होना पड़ा था. एक बार फिर इसकी नौबत आ गई है.

ख़ातिब ने कहा, “अगर मिस्र के लोग सैन्य तख्तापलट और सेना की कार्रवाई का समर्थन करते हैं तो मुस्लिम ब्रदरहुड को भूमिगत होना पड़ सकता है क्योंकि उसके ख़िलाफ़ फिर से दमन चक्र शुरू हो सकता है.”

ख़ातिब उन हज़ारों लोगों में शामिल हैं जो पूर्वी काहिरा में एक मस्जिद के पास धरना दे रहे हैं. ये स्थान मुर्सी के समर्थकों का केन्द्र बनकर उभरा है.

मुर्सी के समर्थकों का कहना है कि वे तब तक धरने पर बैठे रहेंगे जब तक कि लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए देश के पहले राष्ट्रपति मु्र्सी को उनके पद पर बहाल नहीं किया जाता.

देश के शीर्ष सैन्य अधिकारियों का कहना है कि देश को गृहयुद्ध से बचाने के लिए सेना का हस्तक्षेप लाजमी हो गया था क्योंकि मु्र्सी की नीतियां देश को जोड़ने के बजाय तोड़ रही थीं.

अपदस्थ

सेना ने मुर्सी को अपदस्थ करने के बाद सत्ता तुरंत देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था के प्रमुख अदली मंसूर के हाथों में थमा दी. उन्हें चार जुलाई को देश के अंतरिम राष्ट्रपति की शपथ दिलाई गई.

Image caption मुर्सी समर्थक उन्हें फिर से बहाल किए जाने की मांग कर रहे हैं

मुर्सी के ख़िलाफ़ विरोध की अगुवाई करने वाले नेशनल साल्वेशन फ्रंट (एनएसएफ) ने सेना की कार्रवाई को जायज़ ठहराया है.

एनएसएफ के प्रवक्ता ख़ालिद दाउद ने कहा, “देश अभूतपूतपूर्व परिस्थितियों से गुजर रहा है और लोगों की गिरफ़्तारी क़ानून के तहत हुई है.”

उन्होंने कहा कि मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता हिंसा में विश्वास रखते हैं. राष्ट्रपति को हटाए जाने के बाद वे जिहाद और हिंसा की बात कर रहे हैं.

मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों और धर्मगुरुओं ने हाल के महीनों में जिस तरह की बयानबाजी की है उससे मिस्र के लोगों को ख़तरे की घंटी सुनाई दी थी. इसमें वो लोग भी शामिल हैं जिनके दम पर मुर्सी को कुर्सी मिली थी.

आगे की राह

इस्लाम आधारित राजनीति पर कई पुस्तकें लिख चुके होसामेल्दीन अल्सायेद ने कहा, “ये संगठन लोगों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है और सत्ता पाने की होड़ में उसने लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया है. चरमपंथियों के उभार पर उसने चुप्पी साधे रखी.”

उन्होंने कहा कि मुस्लिम ब्रदरहुड ने एक के बाद एक कई रणनीतिक ग़लतियां की हैं जिससे सेना के समर्थन से व्यापक जनक्रांति हुई और मुर्सी को एक साल में ही गद्दी छोड़नी पड़ी.

अल्सायेद ने कहा कि मुस्लिम ब्रदरहुड को अपना अस्तित्व बचाए रखना के लिए अपने भीतर क्रांतिकारी बदलाव करने होंगे.

उन्होंने कहा, “युवा पीढ़ी का मुस्लिम ब्रदरहुड के नेताओं में कोई विश्वास नहीं है क्योंकि वे नाकामी का पर्याय बन चुके हैं.”

अल्सायेद ने कहा, “युवाओं को आगे बढ़कर नीतियों को बदलने की जरूरत है. मौजूदा नेतृत्व में ये संगठन मौत के मुंह में जा रहा है.”

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