पाकिस्तान में 'आतंकवाद-निरोधक नीति नहीं'

पाकिस्तान धमाके (फ़ाइल)
Image caption पाकिस्तान में पिछले चंद सालों में 1350 से ज़्यादा चरमपंथी हमले हुए हैं.

चौधरी नईम के भाई इंस्पेक्टर अब्दुल रउफ़ को गुज़रे तक़रीबन चार साल हो चुके हैं लेकिन दहशतगर्दी का शिकार होनेवाले हज़ारों परिवारों की तरह इनका ज़ख़्म अभी भी ताज़ा है.

भाई को याद करते हुए चौधरी नईम कहते हैं कि वो भाई कम दोस्त ज़्यादा थे, कामकाज के बाद साथ बैठ जाते थे, दुनियां ज़माना, आसपास जो कुछ घटित होता था उसपर बैठकर चर्चा करते थे.

हालांकि उन्हें भाई की मौत का ग़म है लेकिन उन्हें इस बात पर 'फ़ख्र भी है कि उनका भाई शहीद हो गया.'

हमला

अब्दुल रउफ़ लाहौर में रेस्क्यू वन और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के दफ़्तर पर हुए हमले में मारे गए थे.

बारूद से भरी गाड़ी को भवन से टकराकर किया गया आत्मघाती चरमपंथी हमला इतना शक्तिशाली था कि इसमें 26 लोगों की मौत हो गई और कम से कम 200 लोग घायल हो गए.

पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान में इस तरह के हमले लगातार होते रहे हैं.

पाकिस्तान इंस्टीच्यूट फ़ॉर पीस के मुताबिक़ पिछले चंद सालों के दौरान ही पाकिस्तान में लगभग 1350 चरमपंथी हमले किए गए हैं.

पाकिस्तान की संसद ने पिछले साल चरमपंथ पर मौजूदा क़ानून में संशोधन को मंज़ूरी दी. इसके तहत क़ानून को और मज़बूत बनाया गया है.

कुछ साल पहले उग्रवाद से निबटने के लिए एक स्वायत्त संस्था - 'नेशनल काउंटर टेररिज़्म ऑथरिटी' के गठन की भी बात हुई.

लेकिन संस्था का मामला बहुत आगे न बढ़ पाया और, हमले जारी रहे.

'झगड़ा कंट्रोल का'

संगठन के कामयाब न होने की वजह के बारे में सिनेट के क़ानूनी मामलों की समिति के चेयरमैन मुशाहिद हुसैन कहते हैं कि ये पिछली हुकूमत की सबसे बड़ी नाकामी थी.

Image caption ओसामा बिन लादेन की ऐब्बटाबाद में मौजूदगी से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय निंदा झेलनी पड़ी.

वो कहते हैं, "नेक्टा की घोषणा साल 2009 में की गई. उसके कार्यालय के लिए जगह भी तय हो गई, यूरोपीय संघ ने वायदा किया कि वो इसके लिए रक़म भी मदद के तौर पर देगा. लेकिन फिर इस बात को लेकर मामला अटक गया कि संगठन किसकी देखरेख में काम करेगा."

मुशाहिद हुसैन के मुताबिक़ बहस इस बात को लेकर थी कि संगठन का कंट्रोल प्रधानमंत्री कार्यालय के पास रहेगा, या गृह मंत्रालय के पास, या इसे स्वायत्त रखा जाए?

इसे जानकार मुल्क में उग्रवाद से निबट पाने की पॉलिसी की ग़ैर मौजूदगी के तौर पर देखते हैं.

उनका कहना है कि साफ़ नीति की कमी का असर मुल्क की सुरक्षा ऐजेंसियों के काम काज पर पड़ रहा है.

'अलग-अलग तस्वीरें'

विशेषज्ञ माहिर शौकत जावेद कहते हैं, "अगर आप आईएसआई, एफआईए, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय से कहें कि वो मुल्क में आतंकवाद की एक मुकम्मल तस्वीर पेश करे, तो सभी की रिपोर्टें एक दूसरे से जुदा होंगी."

उनका कहना है कि पाकिस्तान को एक ऐसे संगठन की ज़रूरत है जो इस मामले पर एक वृहत रिपोर्ट पेश कर सके.

सुरक्षा मामलों के जानकार हसन अस्करी रिज़वी का मानना है कि चरमपंथ के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की लड़ाई की सबसे बड़ी कमी ये है कि सुरक्षा एजेंसियां अभी तक ये पहचान ही नहीं कर पाई हैं कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन.

हसन अस्करी रिज़वी कहते हैं, "चाहे आम लोग हों, हुकूमत, या फ़ौज, मुझे शक है, बल्कि मैं यक़ीन से कह सकता हूं कि इस मामले पर सबकी सोच एक सी नहीं है. कुछ अब भी किसी संगठन को लेकर कहते हैं कि वो हमारे दोस्त हैं और उनके साथ बातचीत हो सकती है. तो अगर दोस्त हैं तो फिर आतंकवाद निरोधक नीति किसके ख़िलाफ़ बना रहे हैं?"

लेकिन अगर आप आम लोगों से बात करें तो पाएंगे कि यूं तो जनता को नई हुकूमत से बहुत सारी उम्मीदे हैं लेकिन जान की हिफ़ाज़त उस फ़हरिस्त में सबसे उपर है.

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