मिस्र में जो हुआ, वह तख्तापलट था?

मिस्र में सत्ता परिवर्तन, तख्तापलट

मिस्र में हुए सत्ता परिवर्तन को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं. क्या वो वाकई तख्तापलट ही था. इसे लेकर अमरीका की भी अपनी दुविधाएँ हैं.

इस सवाल पर अमरीकी राष्ट्रपति भवन व्हॉइट हाउस के प्रेस सचिव जे कार्नी असहज स्थिति में दिखते हैं.

अगर वो मिस्र की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सेना के दखल को ' तख्तापलट' करार देते हैं तो इसका साफ यह मतलब निकाला जाएगा कि मिस्र को बड़े पैमाने पर दी जा रही अमरीकी मदद में कटौती करनी पड़ेगी.

कम से कम अमरीका के कानूनी प्रावधान तो यही कहते हैं.

"इस कानून के मुताबिक अगर किसी भी देश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के प्रमुख को पद से सैनिक दखलंदाजी के जरिए हटाया जाता है तो उस देश को किसी भी तरह की मदद मुहैया नहीं कराई जाएगी."

अमरीकी हित

और यह कुछ डॉलरों की बात भी नहीं है. राष्ट्रपति ओबामा की योजना अगले साल मिस्र को डेढ़ अरब अमरीकी डॉलर या लगभग 90 अरब रुपए देने की है.

यह भी कहा जा रहा है कि इस मदद में कटौती करने से अमरीकी हथियार निर्माता कंपनियों के हितों को नुकसान होगा.

इसलिए व्हॉइट हाउस के प्रवक्ता कार्नी मोहम्मद मुर्सी को अपदस्थ करने की बात करने के बदले यह कह रहे हैं कि आर्थिक सहायता में कटौती करना अमरीका के हित में नहीं होगा.

उन्होंने कहा, "यह एक जटिल और मुश्किल परिस्थिति है जिसके बहुत ही गंभीर परिणाम होंगे."

आर्थिक मदद के मुद्दे पर समीक्षा हो रही है और सहायता अब भी रोकी जा सकती है. हालांकि राष्ट्रपति ओबामा ने इस बारे में खुद कोई राय नहीं दी है.

अमरीकी प्रभाव

लेकिन सीनेटर जॉन मैकैन ने अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को लेकर अपनी आशंकाओं के बावजूद कहा है कि मिस्र को दी जा रही आर्थिक सहायता नहीं रोकी जानी चाहिए.

Image caption मिस्र को दे जानी वाली अमरीकी मदद की समीक्षा की जा रही है.

उन्होंने कहा, "मिस्र को दी जा रही अमरीकी मदद बेहद महत्वपूर्ण है और मैं इसे रोकना नहीं चाहता लेकिन मेरा यह भी मानना है कि ऐसा करने के लिए यही सही समय है."

शायद ऐसा हो कि राष्ट्रपति ओबामा अपने विकल्पों को तोल रहे हों कि क्या करने से मिस्र की सेना पर अमरीकी प्रभाव सबसे अधिक होगा.

लेकिन यह साफ नहीं है कि मिस्र का निज़ाम इसे सुन पा रहा है. अमरीका लगातार यह माँग कर रहा है कि मिस्र में हिंसा पर रोक लगाई जाए.

राजधानी काहिरा में सोमवार को जो कुछ भी हुआ वह अमरीकी कानूनों पर खरा नहीं उतरता है. वहां पुलिस की गोलीबारी में दर्जनों प्रदर्शनकारी मारे गए.

मुश्किल यह है कि इन हालात में अमरीका बेहद ही लाचार दिख रहा है आखिर मिस्र से उसके आर्थिक हित जुड़े हुए हैं.

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