सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में पाकिस्तान

पाकिस्तान
Image caption शिया समुदाय के खिलाफ चरमपंथी हमले हो रहे हैं

मस्जिद के बाहर तेज़ आवाज़ सुनकर इबादत करने वालों की धड़कनें बढ़ जाती हैं. पेशावर की धूल भरी सड़कों से दूर छोटी सी शिया मस्जिद में कतार में धार्मिक सभा में शामिल लोग इकट्ठे हुए हैं.

लेकिन मुख्य हॉल की दीवारें धमाके और काले धब्बों से रंगी हुई हैं, जहां पर इमाम लोगों के सामने खड़े हैं. मस्जिद की सुंदर नीली टाइल्स टूट गई हैं.

इसी जगह पर दो सप्ताह पहले एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को धमाके से उडा़ दिया था. सैयद हुसैन हुसैनी बताते हैं, "जब मैं भीतर घुसा तो टूटे हुए पैर, शरीर के विभिन्न अंग और सिर पूरी मस्जिद में बिखरे पड़े थे."

इसी आत्मघाती हमले में उनके भतीजे की भी मौत हो गई थी.

छत और दीवारों पर, यहां तक कि विपरीत दिशा में स्थित भवन पर सैकड़ों छर्रों के निशान देखे जा सकते हैं, जो युवा आत्मघाती हमलावर के कमरबंद में मौजूद थे.

चरमपंथी हिंसा का डर

इस धार्मिक सभा में लोग डर को किनारे रखकर आए थे लेकिन मस्जिद के गेट पर एक व्यक्ति के पिस्तौल के साथ पकड़े जाने के बाद वहां मौजूद लोगों में तनाव तेज़ी से बढ़ गया.

मस्जिद की सुरक्षा में लगे गार्डों द्वारा पिस्तौल निकालने की कोशिशों के बीच तेज़ बहस होने लगी.

लेकिन जैसा डर का माहौल बना था. मामला उससे काफी अलग था. वह बहुसंख्यक सुन्नी समुदाय का सांप्रदायिक हमलावर नहीं था. वह एक शिया है, जिसने अपने पिता और चाचा को दो सप्ताह पहले हुए बम धमाकों में खो दिया था.

वह दूसरे सांप्रदायिक हमले के डर से पिस्तौल लेकर आया था. कुछ साल पहले अपनी पिस्तौल से एक आत्मघाती हमलावर को उसने मार गिराया था.

हमलों को रोकने में विफल

सैयद हुसैन हुसैनी के लिए मस्जिदों पर होने वाले हमले और सिलसिलेवार हत्याएं नवाज़ शरीफ़ के पिछले महीने प्रधानमंत्री बनने के बाद की घटनाएं हैं. इसने फिर से यह साबित कर दिया है कि किसी की भी सरकार बने, पाकिस्तान की शिया आबादी बाकी अल्पसंख्यकों की तरह से सुरक्षित नहीं रहेगी.

जिहादी लड़ाके मजबूत होते जा रहे हैं. पूरे पाकिस्तान में कराची, क्वेटा और पेशावर में बम धमाके, टारगेट किलिंग और आत्मघाती हमले हो रहे हैं सरकार पहले दिन से आज तक ऐसे हमलों को रोकने में विफल रही है. लोग अपने भरोसे हैं.

ईदी इमरजेंसी सेवा के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून के बीच में बम धमाकों से खैबर पख्तून ख्वाह प्रांत और अफगानिस्तान की सीमा से सटे आदिवासी इलाकों में 247 लोग मारे गए.

बढ़ती हिंसा और घायलों की संख्या के मद्देनजर मुख्य क्षेत्रीय अस्पताल में नया दुर्घटना और आपातकालीन विभाग बनाया गया है, जिसमें छह ऑपरेशन थिएटर हैं. इसके एक साल बाद खुलने की संभावना है.

पेशावर में लेडी रीडिंग अस्पताल के प्रमुख प्रोफेसर अरशदज जावेद बताते हैं कि यह कॉम्पलेक्स काफी बड़ा है और खुद में अस्पताल जैसा है. वे कहते हैं, "अगर मैं इसे दुनिया का सबसे बड़ा विभाग कहूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी."

सरकार का नियंत्रण नहीं

Image caption कराची में 10 जुलाई को आत्मघाती हमले हुए

अस्पताल के भीतर बम धमाको के पीड़ित मोहम्मद शाहीन गंभीर घावों से उबर रहे हैं, जो लगभग एक महीने पहले मरदान के समीप हुए थे.

वे एक अंत्येष्टि में शामिल होने गए थे और स्थानीय नेता के समीप खड़े थे. जिनकी घटनास्थल पर 27 अन्य लोगों के साथ मौत हो गई थी.

शाहीन का मानना है कि चरमपंथी समूह द्वारा फैलाई जा रही हिंसा सरकार के नियंत्रण से बाहर है.

वे इससे बचना चाहते थे और सावधानी बरत रहे थे लेकिन वे सफल नहीं हो सके, अब केवल खुदा ही कुछ कर सकता है.

नवाज़ शरीफ़ के ऊपर भारी दबाव है कि वे स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए कैसे योजना बनाते हैं?

बहुत सारे प्रेक्षकों का विश्वास है कि वे ऑफिस में बिना किसी पुख़्ता इंतज़ाम के काम करते हैं, सुरक्षा की रणनीति विकसित करने की प्रक्रिया अब भी जारी है.

सरकार की प्राथमिकता

नवाज़ शरीफ़ अर्थव्यवस्था को पहली प्राथमिकता देने की बात पर डटे हुए हैं. सेवानिवृत्त जनरल तलत मसूद कहते हैं, “मैं बहुत निराश हूं, वे सुरक्षा और रक्षा विश्लेषक भी हैं. मुझे लगता है कि सरकार की पहली प्राथमिकता लोगों की सुरक्षा करना है.”

“मुझे उम्मीद है कि वे जागेंगे, मैं नहीं कहूँगा कि नींद से जागेंगे, और हालात से बेहतर तरीके से निपटने के लिए तैयारी करेंगे.”

बीबीसी की उर्दू सर्विस को मिले एक लीक डॉक्युमेंट के अनुसार हाल के वर्षों में जिहादी समूहों द्वारा होने वाले हमले “देश के सामने आज़ादी के बाद सबसे संकट वाली स्थिति प्रतीत होती है.”

देश में संकटकालीन स्थिति

नेशनल काउंटर टेररिज्म एण्ड एक्सट्रीमिज्म की पॉलिसी नाम के ड्रॉफ्ट में चेताया गया है कि जेहादी पाकिस्तान को पाषाण काल की ओर ले जाना चाहते हैं. इसे अल कायदा से जोड़ते हुए कहा गया है कि वे पाकिस्तान की आबादी को ग़ैर-इस्लामिक नेताओं के ख़िलाफ भड़काना चाहते हैं.

पाकिस्तान का सबसे बड़ा चरमपंथी समूह तालिबान के अड्डे अधिकांश मुख्य शहरों में हैं और वे मनमानी तरीके से हमले करने में सक्षम हैं.इस बात के भी संकेत हैं कि शिया समुदाय में होने वाले हमलों में लश्कर-ए-झांगवी अन्य चरमपंथी गुट जिम्मेदार हैं, जो तालिबान के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.

डॉक्युमेंट के लेखक देश के राजनीतिज्ञों कीस कड़ी आलोचना करते हैं. वे उनके ऊपर चरमपंथ को मिलते बढ़ावे पर रोक लगाने में असफल होने का आरोप लगाते हैं और ज्यादा समन्वित आतंकवाद विरोधी नीति बनाए जाने की आवश्यकता बताते हैं.

यह अभी स्पष्ट नहीं कि डॉक्युमेंटस वर्तमान की सरकार के संदर्भ में है या पहले की सरकार के बारे में बात करता है. अभी तक नवाज़ शरीफ़ ने सेना और खूफ़िया एजेंसियों के साथ बैठक बुलाई है. सभी पार्टियों की बैठक बुलाई है ताकि आगे के लिए सर्व सम्मति से कोई रास्ता निकाला जा सके.

बातचीत से समाधान

Image caption अस्पताल में घायलों की संख्या बढ़ रही है

कुछ प्रेक्षकों का मानना है कि “समझौते में खूफ़िया एजेंसियों को शमिल करना जरुरी है, लेकिन सभी पार्टियों का सम्मेलन बुलाना अपनी ज़िम्मेदारी टालने जैसा है.” लेकिन इकबाल ज़फऱ जैसे सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों किसी तरह के नीतिगत अभावसे इंकार करते हैं. वे कहते हैं कि “हम काफी लंबे समय से इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं.”

चरमपंथी हिंसा की मूल जड़ को देखने की जरुरत है और सबसे बेहतर तरीका होगा कि चरमपंथियों से बातचीत हो. किसी समाधान तक पहुंचने का केवल यही एक रास्ता है.आप हड़बड़ी और शीघ्रता से फैसले लेकर किसी समाधान और स्थाई शांति तक नहीं पहुंचा जा सकता है.

लेकिन इसमें सालों लग सकते हैं और यह भी साफ नहीं है कि अगर तालिबानी बातचीत से इनकार करते हैं या समझौता वार्ता टूट जाती है तो सरकार क्या करेगी?

पेशावर का व्यवसायी समुदाय उदास है, सुरक्षा की कमी के कारण पिछले एक दशक में गंभीर तरीके से प्रभावित हुआ है. प्रमुख क़ालीन व्यवसायी मज़हर उल हक़ कहते हैं, "मेरा व्यवसाय 70 फीसद कम हो गया है. उनको संदेह है कि नई सरकार के नेतृत्व में भविष्य में बहुत ज्यादा बदलाव आएगा. चरमपंथी चारों तरफ फैल गए हैं, मुझे नहीं पता कि सरकार उनको कैसे नियंत्रित करेगी."

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