श्रीलंका: ख़ून में रंगी, वह काली जुलाई

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Image caption 23 जुलाई वो दिन है जिस दिन से श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ़ दंगों की शुरुआत हुई. इस महीने को ब्लैक जुलाई के नाम से याद किया जाता है.

तीस साल पहले, उत्तरी श्रीलंका में चरमपंथी हमले कर रहे तमिल अलगाववादियों ने 13 सैनिकों की हत्या कर दी थी. ये सैनिक एक दिन पहले ही ड्यूटी पर आए थे.

इसके बाद कई दिन तक देश भर में सिंहलियों की भीड़ ने बदले की कार्रवाई की. एक अनुमान के मुताबिक़ 400 से लेकर 3,000 तमिलों की हत्या कर दी गई.

इससे 26 साल तक चलने वाले गृहयुद्ध की शुरुआत हुई जिसने लाखों तमिलों को निर्वासित होने पर मजबूर कर दिया.

बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हैविलैंड उस महीने को याद कर रहे हैं, जिसे 'काली जुलाई' के नाम से जाना जाता है.

सिंहली पड़ोसी

प्रिया बालाचंद्रन (नाम बदल दिया गया है) कोलंबो में अपने घर में बैठीं तीस साल पहले का वह दिन याद करती हैं, “पहली टोली में करीब 80 युवक थे जो हाथों में लोहे की रॉड जैसे हथियार लिए हुए थे. शराब पिए हुए ये युवक उन्मादी दिख रहे थे. उन्होंने तोड़फोड़ मचाई और फिर अगला दौर शुरू हुआ लूट का.”

वह बताती हैं कि वह अपने घर में अपनी माँ, बेटे और एक सिंहली पड़ोसी के साथ खाना खा रही थीं. तभी उन्होंने देखा कि सड़क के पार दुकानों में आग लगाने के बाद भीड़ उनकी तरफ़ बढ़ रही है.

उनके पड़ोसी ने उन्हें तुरंत अपने घर चलने को कहा और वे 300 मीटर दूर उनके घर की ओर भागे.

वह कहती हैं, “हमें इस बात का अहसास नहीं था कि हम आख़िरी बार अपने घर से बाहर निकल रहे हैं.”

अपने दोस्त के घर से वह अपने घर को लुटते हुए देख रही थीं. भीड़ को अच्छी तरह पता था कि कौन सा घर सिंहली का है और कौन सा तमिल का.

“करीब एक घंटे तक लूटपाट के बाद हमें वहां से काला धुआं उठता दिखा. मेरे और मेरे परिवार के लिए यह बेहद सदमे वाली स्थिति थी. देर शाम वह एक बार फिर आए और जो बचा-खुचा था उसे भी जला दिया.”

यह पूछने पर कि क्या नष्ट किया गया? प्रिया ने कहा, “सब कुछ, वहाँ कुछ नहीं बचा था. वह अब हमारे घर जैसा नहीं रह गया था. वह सिर्फ़ जला हुआ, काला था. बस, मुझे इतना ही याद है.”

वह कहती हैं कि अन्य कई लोगों की तरह उनके भी परिवार को सिंहली पड़ोसियों ने बचाया था.

हत्या और पलायन

दूसरे सिंहली हत्याएं कर रहे थे, तमिलों को बेघर करने की कोशिश कर रहे थे, और सिंहली बोलने की मांग कर रहे थे.

उस समय के युवा सिंहली कलाकार चंद्रगुप्त थेनुवारा बताते हैं कि उनकी बस रोक दी गई थी, “मैं बस में पीछे से आती आवाज़ें सुन पा रहा था. वह एक आदमी को बस से बाहर ले जा रहे थे. उन्होंने उसकी पहचान तमिल के रूप में की थी. मुझे नहीं पता कि उसका क्या हुआ? हमारी बस आगे बढ़ गई थी.”

बाद में वह शहर से गुज़रे जिसमें ज़्यादातर चीज़ों को आग लगा दी गई थी.

लोगों को उनकी गाड़ियों में ही ज़िंदा जला दिया गया, नंगा कर दिया गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया.

कोलंबो और राज्यों के कस्बों में सैनिक या तो खड़े थे या फिर हमलावरों को पेट्रोल दे रहे थे.

श्रीलंका की सबसे बड़ी जेल में दो सामूहिक क़त्लेआम में सिंहली कैदियों ने 53 तमिल कैदियों की हत्या कर दी.

यक़ीनन इसमें सरकार की मिलीभगत थी- श्रीलंका के एक मानवाधिकार समूह का कहना है कि कट्टरपंथी मंत्रियों की शह पर अपराधी यह काम कर रहे थे.

Image caption विग्नेस्वरन का कहना है कि सबसे पहले बुद्धिजीवियों का पलायन शुरू हुआ

इन घटनाओं के बाद 27 जुलाई, 1983 को दिए अपने पहले भाषण में तत्कालीन राष्ट्रपति जे आर जयवर्धने ने अल्पसंख्यकों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं जताई बल्कि सिंहलियों की मुश्किलों की ही बात की.

इसके बाद और हत्याएं हुईं. 31 जुलाई, 1983 को जब तक हिंसा थोड़ी कम हुई तब तक हज़ारों तमिल उत्तर और पूर्व के राज्यों या विदेश की ओर पलायन कर चुके थे.

काली जुलाई ने तमिल चरमपंथियों को बढ़ावा दिया और देश को एक पूरी जंग में झोंक दिया. वह जंग जो 26 साल तक चली और जिसने एक लाख लोगों की जान ले ली.

सबक

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और हाल ही में सबसे बड़ी तमिल पार्टी के नेता बने सी डब्ल्यू विग्नेस्वरन कहते हैं कि लाखों तमिलों के विदेश भाग जाने से ज़बरदस्त प्रतिभा पलायन हुआ.

वह कहते हैं, “कई सारे बुद्धिजीवी, वकील, डॉक्टर, वास्तुकार, इंजीनियर सब श्रीलंका छोड़कर चले गए. उन्हें लगा कि इस सबसे निकलने का यही रास्ता है.”

“वह लोग आज भी 1983 के विध्वंस, हत्याओं, नुकसान को नहीं भूल सकते जिसकी वजह से उन्हें श्रीलंका छोड़कर विदेश जाना पड़ा था.”

अलग तमिल राष्ट्र का विचार- जो तब और अब भी ग़ैरक़ानूनी है- इसलिए भी ज़्यादा मजबूत हुआ क्योंकि तमिल उन द्वीपों की ओर पलायन कर गए जहां वे बहुतायत में थे.

विग्नेस्वरन कहते हैं कि 1983 के बाद से बहुत से तमिल दक्षिणी श्रीलंका में रहने में सहज महसूस नहीं करते, राजधानी के सिवाय.

युद्ध में जीत के बाद सरकार कहती है कि अब कोई “अल्पसंख्यक” नहीं है और सभी एक समान हैं.

Image caption कलाकार थेनुवारा का कहना है कि श्रीलंका ने पूर्व में किए अन्यायों का ठीक से सामना नहीं किया

लेकिन सिंहली राष्ट्रवादी भावनाएं और बयानबाज़ियां बढ़ रही हैं. इससे सिर्फ़ तमिलों ही नहीं अन्य अल्पसंख्यकों, मुसलमानों में भी घबराहट है. बौद्ध सिंहली राष्ट्रवादी, जिनमें भिक्षु भी शामिल हैं, मस्जिदों पर हमला करते रहे हैं और मुस्लिमों को उनकी जीवनशैली की वजह से निशाना बनाते रहे हैं.

साल 2009 में एलटीटीई के कुचले जाने के बाद और बड़ी तादाद में तमिल नागरिकों के मारे जाने के बाद युद्ध ख़त्म हो गया लेकिन अब कट्टरपंथी मंत्री तमिल इलाकों के हस्तांतरण की बात कर रहे हैं हालांकि संविधान इनमें वृद्धि की बात करता है.

साल 2004 में पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने काली जुलाई की नाज़ीवाद से तुलना करते हुए इसके लिए तमिलों से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगी थी.

उन्होंने एक आयोग का गठन किया था जिसके अनुसार 1,000 लोग मारे गए थे और सात लाख लोग निर्वासित हुए.

कुमारतुंगा ने माना था कि कई ऐसे मामले भी हो सकते हैं जिनकी जानकारी न हो. उनकी कोशिशों के बावजूद जुलाई की हत्याओं के लिए किसी को सज़ा नहीं मिली है.

कलाकार चंद्रगुप्त थेनुवारा कहते हैं कि देश ने अपने अपराधों का ठीक से सामना नहीं किया है.

कोलंबो में अपने नए घर में रह रहीं प्रिया बालाचंद्रन बताती हैं कि अब भी उनके कई अच्छे सिंहली दोस्त हैं.

वह कहती हैं, “उम्मीद है कि अब कुछ भी ग़लत नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि 30 साल की लड़ाई से सभी पक्षों ने सीख ली है.”

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