मर्द बनने की तरफ़ उठते जानलेवा कदम!

  • 23 जुलाई 2013
खतना, अफ्रीका

दक्षिण अफ़्रीका में खतने की वजह से अब तक 79 किशोरों की मौत हो चुकी है. इन मौतों के बाद उन पारंपरिक सर्जनों पर शिकंजा कसने की मांग उठ रही है जो ये सर्जरी करते हैं.

ख़तना कराने की मांग बढ़ने की वजह से गांव-देहातों में अवैध केंद्रों की बाढ़ आ गई है. कुछ किशोर अपने साथियों के दबाव के चलते घर से भाग जाते हैं या खुद अपना ख़तना कर लेते हैं.

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले छह साल में ख़तना कराने वाले ऐसे क़रीब 300 लोगों की मौत हो चुकी है. खतने की प्रक्रिया में अब तक 190 लोग नपुंसक हो चुके हैं और अधकचरे ऑपरेशनों के चलते क़रीब पांच हज़ार लोग अस्पतालों में भर्ती हैं.

हर साल ज़ोसा और देबेले क़बीलों के किशोर पहाड़ी के उस पार उन पहाड़ों में पहुंचते हैं जहाँ उन्हें सिखाया जाता है कि वो कैसे एक ज़िम्मेदार पुरुष बन सकते हैं. यह एक तरह से मर्द बनने की तरफ़ उठते उनके शुरुआती कदम होते हैं.

ख़तना कराने की परंपरा दक्षिण अफ़्रीका के देहाती इलाक़ों में बेहद पवित्र मानी जाती है. ईस्टर्न केप में बिज़ाना के पहाड़ों के बीच इबोमा नाम की कुछ कामचलाऊ झोपड़ियां मौजूद हैं. इनमें कुछ लड़कों को दीक्षित किया जाता है और खतना इसी दीक्षा का एक हिस्सा है.

पारंपरिक सर्जन

घबराए हुए ये सभी लड़के कंबल ओढ़ लेते हैं और इन्हें पूरे महीने चलने वाली दीक्षा के दौरान जूते पहनने की भी इजाज़त नहीं होती. महिलाओं को इन झोपड़ियों के अंदर जाने की मनाही है और बाहरी लोगों को दूर रहने का निर्देश दे दिया जाता है.

जहाँ होता है सामूहिक खतना

किशोरों की देखभाल करने वालों को 'अमाखानकाथा' कहा जाता है जबकि पारंपरिक सर्जन को 'इंगसिबी'. ये लोग अपने गीत और नृत्य के ज़रिए नए लड़कों को अपनी परंपरा बरक़रार रखने और उसका सम्मान करने का संदेश देते हैं.

देश के इस हिस्से में कोई तब तक पुरुष नहीं माना जाता जब तक कि वह पहाड़ों में जाकर ख़तना नहीं करा लेता लेकिन वहाँ के अस्पतालों में खतने की इस प्रक्रिया के जानलेवा पहलुओं को भी देखा जा सकता है.

नेल्सन मंडेला अकेडमिक हॉस्पिटल में 36 नौजवान ख़तने के दौरान लगी गंभीर चोटों का इलाज करा रहे हैं. इनमें ज़्यादातर को अवैध तौर पर दीक्षा देने वाले स्कूलों से छुड़ाया गया है जहाँ वो मौत के क़रीब पहुंच चुके थे. कुछ तो अपने गुप्तांग तक खो चुके हैं.

यहाँ इलाज करा रहा एक युवक कहता है, "मेरा सपना रहा है कि मैं पति और तीन बच्चों का पिता बनूं. मगर अब ये कभी नहीं हो पाएगा. मैं अपना पुरुषत्व खो चुका हूं. कैसी ज़िंदगी होगी ये? क्या इसके बाद भी ज़िंदगी जीना मुमकिन है?"

खुदकुशी

टूटी हुई बोतलें, जूतों के फीते और जले हुए सामान वो चीज़ें हैं, जिनका इस्तेमाल पारंपरिक सर्जन ख़तना करने के दौरान करते हैं. इसके चलते किशोरों के गुप्तांगों को इतना नुकसान हो जाता है कि उसकी कभी भरपाई नहीं हो सकती.

खतने के दौरान लड़कों को आने वाली चोटों का इलाज कर रहे डॉक्टर बुईसेलो मादीबा कहते हैं, "अगर हालात बेहद ख़राब हुए तो लड़के अपना पुरुषत्व गंवा बैठते हैं और फिर वो काम करने लगते हैं जो समुदाय को मंज़ूर नहीं. या इनमें से कई ख़ुदकुशी कर लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि जीने की अब कोई वजह नहीं रह गई है."

खतना को कानूनी इजाजत

कुछ किशोरों ने भागने की कोशिश भी की. 17 साल के एक लड़के को इस अपराध की वजह से पेड़ से बांध दिया गया था. जब उसने पानी मांगा, तो उसे पीटा भी गया.

उस लड़के ने आपबीती सुनाते हुए कहा, "मैंने उनसे कहा था कि मैं प्यासा हूं. कई बार बेहोश हो चुका था और काफ़ी कमज़ोर भी था. मगर उन्होंने मुझे चम्मचों में भरकर कीचड़ दे दिया और जब मैंने इसका विरोध किया तो उन्होंने मुझ पर हमला बोल दिया. बेहद भयानक था ये. मैं रीति-रिवाज़ों तो मानता हूं लेकिन हर चीज़ में यक़ीन करने को तैयार नहीं."

सर्जिकल औज़ार

थाथा की पहा़ड़ियों में एक बार फिर चलते हैं. हमारे सामने लंबे पाजामे और लंबी बांह वाली शर्ट पहले कई लड़के हैं, जिन्होंने कंधों पर कंबल डाल रखे हैं. इन्हें अभी-अभी दीक्षा मिली है. नंगे पैर ये किशोर ज़ोसा संस्कृति की तारीफ़ में गीत गा रहे हैं. इसके बाद उन्हें स्थानीय प्रमुख के सामने पेश होना है.

खतने पर विवाद

स्थानीय सर्जन सियाबोंगा राली के मुताबिक़ उन्हें स्वास्थ्य विभाग ने बाक़ायदा ट्रेनिंग दी है और उन्होंने इस सीज़न में अब तक सौ से ज़्यादा लड़कों का ख़तना किया है. मगर किसी को कोई तकलीफ़ नहीं हुई.

सियाबोंगा राली बताते हैं, "हर लड़के के लिए अलग सर्जिकल औज़ार का इस्तेमाल होता है. आजकल कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं. मैं किशोरों की देखभाल करता हूं, इसलिए मैं कोई ख़तरा मोल नहीं लेना चाहता. जो क़ानून तोड़ रहे हैं वो हमारी परंपरा तोड़ रहे हैं और उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए."

पुरानी प्रथाएँ

एक परिवार के दो बेटे अपने दोस्तों के साथ दीक्षा लेने के लिए घर से भाग गए थे. उनमें अब एक की मौत हो चुकी है. दोनों ने घरवालों को कुछ नहीं बताया था और वो अप्रशिक्षित सर्जनों के हत्थे चढ़ गए.

खतने का फायदा!

लड़कों की मां नोबुंतू म्पांडे फूट फूट कर रोते हए बताती हैं कि दोनों लड़के इसलिए घर से भागे थे क्योंकि उन पर अपने साथियों का दबाव था.

नोबुंतू म्पांडे कहती हैं, "इस हादसे ने मेरे परिवार को तोड़ दिया है. मुझे पता नहीं कि तब मैं क्या करूंगी जब मेरा छोटा बेटा दीक्षा के लिए जाएगा. मैं एक और बच्चे को नहीं खोना चाहती."

कई समुदाय पुरानी प्रथाओं की जकड़न में हैं हालांकि अब पूरे दक्षिण अफ़्रीका में मांग उठ रही है कि परंपरा के नाम पर किसी की मौत नहीं होनी चाहिए.

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