नाज़ियों की तलाश में पोस्टर अभियान

नाज़ियों की तलाश में लगा पोस्टर

जर्मनी में एक पोस्टर अभियान शुरू किया गया है. इसका मक़सद बचे हुए नाज़ी युद्ध अपराधियों का पता लगाकर उन्हें न्याय के कठघरे में लाना है.

बर्लिन, हैम्बर्ग और कोलोन ऑशवित्ज़ के नाज़ी डेथ कैंप के प्रवेश द्वार को दिखाने वाले क़रीब दो हज़ार पोस्टर लगाए गए हैं. इनमें लोगों से सूचनाओं के साथ सामने आने की अपील की गई है.

अमरीका स्थित साइमन विजेन्थाल केंद्र ने इस तरह की उपयोगी सूचनाओं के लिए ईनाम की घोषणा की है.

इसमें अनुमान लगाया गया है कि जर्मनी में अब भी क़रीब 60 ऐसे लोग जिंदा हैं जिनपर मुक़दमा चलाया जा सकता है.

युद्ध अपराध

इसमें से कुछ लोग ऐसे हैं जिन पर नाज़ी डेथ कैंपों में गार्ड या लोगों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार डेथ स्क्वाड के सदस्य के रूप में काम करने का संदेह है, ख़ासकर युद्ध की शुरूआत में.

नाज़ियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खोजबीन करने वाले और येरूशलम शाखा के निदेशक एफ्रेम ज्यूरॉफ़ कहते हैं, ''दुर्भाग्य से इन अपराधों के लिए ज़िम्मेदार बहुत कम लोगों को ही सज़ा हो पाई.''

वे कहते हैं, ''इतना समय बीत जाने का मतलब यह नहीं है कि अपराध की गंभीरता कम हो गई है..''

केंद्र ने इस अभियान को 'ऑपरेशन लास्ट चांस-दो प्रोजक्ट' का नाम दिया है. इसके तहत उसने जर्मनी में आपराधिक मुक़दमा चलाने लायक सूचनाएं देने के बदले 25 हजार यूरो के ईनाम की घोषणा की है.

यहूदियों के मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाला यह सबसे बड़ा केंद्र है. सूचना देने के लिए इस केंद्र ने एक हॉटलाइन की स्थापना की है.

इन पोस्टरों में ऑशवित्ज़ की ओर जाने वाली रेलवे लाइन की ब्लैक ह्वाइट तस्वीर लगी है. इसमें जर्मन भाषा में लिखा है,''देर तो हुई है.

लेकिन बहुत अधिक नहीं. नाज़ी युद्ध अपराधियों ने लाखों निर्दोष लोगों की हत्या कर दी थी. इन अपराधियों में से अभी भी कुछ जेल के बाहर हैं और ज़िदा हैं. उन्हें अदालत में ले जाने में हमारी मदद करें.''

डेथ कैंप

ऑशवित्ज़ जर्मनी के कब्जे वाले पोलैंड में सबसे बड़ा नाज़ी डेथ कैंप था, जहाँ 11 लाख से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था. इनमें अधिकांश यहूदी थे.

Image caption ऑशवित्ज़ डेथ कैंप में 11 लाख से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था

यह पोस्टर अभियान यूक्रेन में पैदा हुए जॉन डेमजानजुक को सुनाई गई सज़ा के दो साल बाद शुरू हुआ है. डेमजानजुक सोबीबोर डेथ कैंप में गार्ड थे.

उनकी मार्च 2012 में 91 साल की आयु में मौत हो गई थी. डेथ कैंप में किए गए उनके अपराध की वजह से उन्हें पाँच साल की सज़ा सुनाई गई थी.

केंद्र का कहना है कि डेमजानजुक को सुनाई गई सज़ा ने एक मिसाल कायम की, जिसने जर्मनी के अभियोजकों को सैंकड़ों बंद पड़ी जाँचों को फिर से शुरू करने और डेथ कैंपों के पूर्व गार्डों पर मुक़दमा चलाने की इजाजत दी, यहाँ तक कि इस बात का कोई सबूत भी नहीं था कि प्रतिवादियों ने ख़ुद कोई हत्या की है या नहीं.

बीबीसी संवाददाता स्टीफ़ेन इवांस का कहना है कि जर्मनी के लोगों की दो राय है, कुछ का मानना है युद्ध अपराधियों का कब्र तक पीछा किया जाना चाहिए, वहीं युवा अक्सर कहते हैं कि आज के जर्मनी में अपराध के लिए कोई जगह नहीं है.

इस साल मई में ऑशवित्ज़ के 93 साल के गार्ड को दक्षिण जर्मनी में गिरफ़्तार किया गया था. उन पर अक्तूबर 1941 से 1945 के बीच निर्दोष लोगों की सामूहिक हत्या और उत्पीड़न में भाग लेने का आरोप था. इनमें मुख्यरूप से यहूदी थे.

साइमन विजेन्थाल केंद्र ने सर्वाधिक वांछित नाज़ियों की सूची में हैंस लिप्चिस को चौथे नंबर पर रखा है.

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