अंतरिक्ष में जीने का क्या है तरीका?

सुनीता विलियम्स
Image caption सुनीता विलियम्स नें अंतरिक्ष में 322 दिन बिताए हैं

अगर आप लंबी अवधि के अंतरिक्ष मिशन पर जाने की सोच रहे हैं तो ध्यान रखें कि आप अपने परिवार से दूर जा रहे हैं. यह एक बेहतर और अच्छा फ़ैसला है, जो भविष्य में मानवता के लिए मददगार साबित होगा.

अंतरिक्ष यात्रा के लिए सबसे पहले ख़ुद के बारे में सोचें और इसकी पूरी तैयारी करें. मैं इसे अपने जीवन के सिरों को पकड़ने जैसा मानती हूं क्योंकि आप नहीं जानते कि आगे क्या होने वाला है. आपको तय करना होगा कि धरती छोड़ने से पहले आपने जीवन के सारे मसले सुलझा लिए हैं.

पहली अंतरिक्ष यात्रा

मेरा पहला मिशन साढ़े छह महीने का था. अंतरिक्ष से वापसी के बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल था. मुझे अंतरिक्ष यान में बैठने के बाद मौसम ख़राब होने के कारण कई बार वापस लौटना पड़ा.

ऐसे में आप बार-बार लोगों से विदा लेते हैं. घर जाने के लिए उत्साहित होते हैं, लेकिन आपको लंबा इंतज़ार करना पड़ सकता है. यह मेरे लिए भावनात्मक रूप से काफ़ी कठिन पल थे क्योंकि यह मेरी पहली अंतरिक्ष यात्रा थी.

भारत के समोसे

Image caption सुनीता विलियम्स को अंतरिक्ष में बाल संवारना अच्छा लगा

अंतरिक्ष में जितना संभव हो सामान्य रहना ज़रूरी है. मैं अंतरिक्ष केंद्र में रोज़ाना अपने बालों में कंघी करती थी. मुझे नहीं पता बालों में कंघी से मेरे बाल कितने सुंदर लगते थे पर ये वो काम हैं जो आपको सामान्य रखते हैं.

हम अपने साथ ऐसी चीज़ें ले जाते हैं, जो घर की याद दिलाती हों. मुझे अपने पालतू कुत्ते जैक रसेल टैरियर की तस्वीर साथ ले जाने से घर की यादों के साथ जुड़े रहने में मदद मिली.

अंतरिक्ष में जाते समय मनपसंद खाने-पीने की चीज़ें साथ ले जाना बहुत महत्वपूर्ण है. मेरे लिए मार्शमैलो क्रीम भेजी गई थी. खाने की दूसरी कई चीज़ों ने मेरे मन में घर की यादें ताज़ा रखीं. मेरी मां के परिवार की तरफ़ से सूखी हुई क्रैनबैरीज़, लॉब्सटर, स्लोवेनियन सॉसेज और पिता के परिवार की तरफ़ से मुझे भारतीय समोसेभेजे गए थे.

हम अंतरिक्ष में रोज़मर्रा का रुटीन बनाए रखने की कोशिश करते हैं. शोध बताते हैं कि दिनचर्या में आधे घंटे का बदलाव भी 24 घंटे के सामान्य चक्र को विपरीत ढंग से प्रभावित करता है.

अंतरिक्ष में स्लीप स्टेशन होते हैं. जहां दरवाज़े बंद करने के बाद अंधेरा और गहरी शांति होती है. अगर कुछ दिक्कत होती है तो अलार्म की आवाज़ सुनाई पड़ती है. लेकिन वहां आमतौर पर काफी शांति होती है.

मिशन के साथी

टॉयलेट के पास हमेशा नाइट बल्ब जलता हुआ छोड़ दिया जाता है, ताकि लोगों को जागने पर पता चल सके कि वो कहां जा रहे हैं? अंतरिक्ष में कुछ लोगों को थोड़ी कम नींद आती है. वहां हमेशा बेचैनी का अनुभव होता है क्योंकि आप अलग वातावरण में रह रहे होते हैं.

आपको तकनीकी रूप से पता होना चाहिए कि आपको काफी कम जगह में लोगों के साथ रहना है. धरती पर नए माहौल के साथ समायोजन के लिए कई तरह की ट्रेनिंग उपलब्ध हैं. फ़्लोरिडा की के पास मैं दस दिन तक पानी के भीतर रही. इससे अंतरिक्ष मिशन के दौरान एक बक्सेनुमा चीज़ में बंद रहने का अच्छा खासा अनुभव हो जाता है.

इसके साथ-साथ हमें खुद की जागरूकता के ऊपर भी काम करना पड़ता है कि कैसे आप नेतृत्व करते हैं और परिस्थिति के अनुसार दूसरे के निर्देशों का पालन करते हैं.

लोगों के साथ मिल-जुलकर रहना बहुत ज़रूरी होता है, ख़ासकर तब जब आपकी संस्कृति और विचारों में साथियों से बहुत ज़्यादा अंतर हो.

दूसरे मिशन पर मेरे साथ तीन लोग थे. मुझे उनके साथ क़रीब डेढ़ साल तक एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझने और जानने की ट्रेनिंग दी गई.

साथ के लोगों को समझना बहुत ज़रूरी है. जब हम अंतरिक्ष केंद्र से बाहर टहल रहे होते हैं तो साथियों को पता होता है कि हम कब थकते हैं और कब हमें थकान नहीं होती?

ख़बर और इंसान

कब हौसला बढ़ाने वाली बात कहनी चाहिए, कब मज़ाक करना चाहिए और कब गंभीर रहना चाहिए? मुश्किल परिस्थिति में सारे लोग एक-दूसरे को उससे बाहर निकलने में मदद करते हैं.

हम बहुत सहज ढंग से परिचित होते जाते हैं. हम टीम के सदस्यों पर भरोसा करते हैं कि वे मुश्किल में हमारे जीवन को बचाने के लिए आगे आएंगे.

अंतरिक्ष में उड़ान भरते समय धरती की बहुत सारी बातें मामूली लगती हैं.राजनीति जैसी चीज़ें दिमाग से निकल जाती हैं. मै ऐसा नहीं महसूस करती कि मैं यूनाइटेड स्टेट्स की रहने वाली हूं. मुझे लगता है कि मैं धरती की एक ख़ुशनसीब इंसान हूं.

ऐसे माहौल में मेरे लिए ख़बरों से ज़्यादा लोग महत्वपूर्ण होते हैं. जब मैं चक्रवात और आग लगने की किसी प्राकृतिक आपदा के बारे में सुनती हूं तो घर के लोगों की याद आती है. मैं सोचकर हैरान होती हूं कि लोग विपरीत परिस्थितियों का सामना कैसे कर रहे होंगे?

लेकिन जब मैं सुंदर और छोटी सी लगने वाली धरती की तरफ देखती हूं तो सोचती हूं कि लोग समुद्र के किनारे टहलने गए होंगे और नीचे धरती पर वे अपने जीवन का आनंद उठा रहे होंगे.

धरती पर ख़ुशी

Image caption सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में चहलकदमी करते हुए

अगर अंतरिक्ष में आपके दिन अच्छे नहीं बीत रहे हैं तो आप अंतरिक्ष केंद्र की खिड़की से धरती की तरफ देख सकते हैं. ऐसा करना आपके चेहरे पर मुस्कान ले आता है.

जब आपके पास संचार की सुविधा होती है तो आप अपने घर के लोगों से बात कर सकते हैं और उनकी प्यारी आवाज़ सुन सकते हैं.

मुझे लगता है कि मंगल ग्रह पर जाने वाला यान तुलनात्मक रूप से छोटा होगा. शायद वहां बहुत ज़्यादा वैज्ञानिक प्रयोग नहीं होने वाले हैं. यान की खिड़की से दिखने वाली धरती धीरे-धीरे और छोटी होती जाएगी.

बाधा के कारण संचार और बातचीत का अंतराल बढ़ता जाएगा. यह मानसिक तौर पर चुनौती भरा होगा लेकिन मेरा मानना है कि इसके बहुत फ़ायदे होंगे.

अगर अंतरिक्ष यात्री अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हैं तो उनको स्थिति का सामना करने का हौसला मिलता है. लेकिन मेरा मानना है कि ऐसा करना मनोवैज्ञानिक रूप से काफी कठिन होगा.

मंगल ग्रह पर जाने के पहले कई चिकित्सीय मुद्दे सुलझाने की ज़रूरत होगी. यहां विकिरण से सुरक्षा बहुत ज़रूरी होगा. हम चाहते हैं कि लोग वहां जाएं और सफल हों. रोबोट्स का वहां पर जाना बहुत बड़ी बात है.

मंगल ग्रह पर इंसान!

मंगल ग्रह पर अगर इंसान जाता है तो हम मंगल ग्रह पर अगले कदम के बारे में सोच सकते हैं. यात्रा के लिए तकनीक पर काफी काम करने की ज़रूरत है. जो भविष्य में सफल हो सकती है. इससे मंगल ग्रह की यात्रा के सपने को हक़ीक़त में बदला जा सकेगा.

लोगों को लगता है कि अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय से संचालित हो रहे हैं लेकिन वास्तविकता है कि इसको शुरू हुए केवल पचास-साठ साल हुए हैं. हम अंतरिक्ष कार्यक्रमों के रोचक पड़ाव पर पहुंच गए हैं.

एक समय था कि हम रॉकेट लॉन्च करते थे लेकिन आज मनुष्य अंतरिक्ष में नियमित रूप से चहलकदमी कर रहे हैं. अगर हमारे पास मंगल पर जाने का निश्चित लक्ष्य हो, तो वहां बहुत सारे लोग जाना चाहेंगे. क्या आप जाना चाहेंगे? मेरा जाना तो निश्चित है.

(बीबीसी के क्रिस्टीन जीवांस से सुनीता विलियम्स की बातचीत पर आधारित)

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