ईरान के नए राष्ट्रपति रूहानी की चुनौतियां

हसन रूहानी की जीत की ख़ुशी

हसन रूहानी जून में हुए चुनाव में भारी मतों से विजयी हुए थे. अपनी जीत के बाद रूहानी ने सुधार लाने और ईरान को अंतरराष्ट्रीय जगत से जोड़ने का वादा किया था.

उनकी जीत के बाद उनके हज़ारों समर्थकों ने सड़कों पर 'बाई-बाई अहमद' कहते हुए ख़ुशियां मनाईं थीं.

कई लोगों का मानना है कि दो बार राष्ट्रपति रहे अहमदीनेजाद ने ईरान को आर्थिक तबाही की तरफ़ ढकेल दिया था और बाहरी दुनिया से ईरान के रिश्ते को और ख़राब कर दिया था.

आधिकारिक तौर पर उनका कार्यकाल शनिवार से शुरू होगा लेकिन सार्वजनिक तौर पर रविवार को राष्ट्रपति पद संभालेंगे.

ऐसे में सवाल उठता है कि रूहानी ने अपनी जीत के बाद जो वादे किए थे क्या वे उन्हें पूरा कर पाएंगे?

पद संभालने के बाद रूहानी की सबसे प्रमुख चुनौतियों का एक जायज़ा.

राजनीतिक बंदी

Image caption मुसावी और कर्रूबी समेत सैंकड़ों राजनीतिक बंदी अभी भी जेलों में सड़ रहें हैं.

हालांकि बढ़ती मंहगाई और बेरोज़गारी ईरानियों के लिए बहुत बड़ी समस्या है लेकिन नए राष्ट्रपति के सामने लोगों की सबसे पहली मांग है राजनीतिक बंदियों की रिहाई.

ब्रिटेन के अख़बार गार्डियन के अनुसार इस समय ईरान में लगभग 800 राजनीतिक बंदी हैं.

प्रमुख विपक्षी नेता मीर हुसैन मुसावी और उनकी पत्नी, एक और नेता मेहदी कर्रूबी पिछले दो साल नज़रबंद हैं.

उनके अलावा कई पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता, ईसाई पादरी, सुन्नी धर्म गुरू, बहाई धर्म के मानने वाले राजनीतिक बंदियों में शामिल हैं.

ख़ामनेई से संबंध

Image caption रूहानी और ख़ामनेई के संबंध कैसे होंगे, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं.

बहुत से मामलों में राष्ट्रपति रूहानी क्या कर सकेंगे ये इस बात पर निर्भर करता है कि ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामनेई के साथ उनके संबंध कैसे होंगे.

ख़ामनेई इस्लामिक कट्टरपंथियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और कई अहम एंव सामरिक मामलों में उनकी राय अंतिम होती है.

रूहानी को कट्टरपंथियों के सहयोग की भी ज़रूरत होगी और कट्टरपंथियों को भी रूहानी की उतनी ही ज़रूरत है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और अर्थव्यवस्था की ख़राब हालत के कारण ईरान के भीतर कट्टरपंथियों की छवि को भारी नुक़सान पहुंचा है.

रूहानी की जीत ख़ामनेई की अतिवादी नीतियों के विरोध में दिया गया जनता का साफ़ संदेश है. इसके कारण ख़ामनेई की स्थिति भी कुछ हद तक कमज़ोर हुई है.

अर्थव्यवस्था

Image caption ईरान में बढ़ती क़ीमतें एक बड़ी समस्या है.

ईरान में आधिकारिक तौर पर मुद्रास्फ़ीति 36 फ़ीसदी है. हालांकि लोगों का मानना है कि महंगाई की दर सरकारी आंकड़ों से कहीं ज़्यादा है.

बेरोज़गारी 12 फ़ीसदी के क़रीब है और ये लगातार बढ़ती जा रही है.

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने हालात और ख़राब कर दिए हैं. तेल के निर्यात पर लगी पाबंदी के कारण ईरान की आमदनी लगभग 65 फ़ीसदी कम हो गई है.

ईरान के साथ व्यापार करने पर बैंकों पर लगे प्रतिबंध के कारण बाहरी दुनिया से ईरान के व्यापार को काफ़ी प्रभावित किया है और इस कारण ईरान के लिए विदेशों से अपने पैसे को घर लाना लगभग असंभव हो गया है.

इसका नतीजा ये हुआ है कि ईरान की मुद्रा में लगभग 80 फ़ीसदी की कमी आई है.

अर्थव्यवस्था की सुधार की दिशा में रूहानी कुछ क़दम तो उठा सकते हैं लेकिन अर्थव्यवस्था को अगर पटरी पर लाना है तो उन्हें किसी भी तरह ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटवाना होगा.

परमाणु कार्यक्रम

Image caption परमाणु मुद्दे पर बातचीत में ईरान को कोई राहत नहीं मिल पाई है.

64 साल के रूहानी परमाणु मुद्दे पर ईरान के प्रमख वार्ताकार रह चुके हैं. उनका कहना है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रख सकता है और साथ ही दूसरे देशों को इस बात का आश्वासन भी दे सकता है कि उनका कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है.

रूहानी कहते रहें हैं कि वो बाहरी दुनिया के साथ परस्पर विश्वास का माहौल क़ायम करना चाहते हैं. लेकिन ये जितना कहना आसान है उतना ही कठिन है उसे पूरा करना.

अगर वो इसका कोई रास्ता निकालने में सफल नहीं होते हैं तो ईरान पर युद्द का ख़तरा मड़राता रहेगा.

बाहरी दुनिया से संबंध

Image caption ब्रिटेने से राजनयिक रिश्ते बहाल कर रूहानी एक नई शुरूआत कर सकते हैं.

दूसरे अहम मुद्दों की तुलना में ये एक ऐसा विषय है जिसमें रूहानी को सबसे ज़्यादा सफलता मिलने की उम्मीद जताई जा रही है. परमाणुमुद्दे पर ईरान के प्रमुख वार्ताकार के रूप में काम करने के कारण उन्हें कूटनीति का अच्छा अनुभव है.

ब्रिटेन से वो ईरान के संबंध को दोबारा बहाल कर सकते हैं. 2011 में तेहरान स्थित ब्रितानी दूतावास पर हुए हमले के बाद ब्रिटेन ने अपने दूतावास को बंद कर दिया था.

उसके बाद ब्रिटेन ने लंदन स्थित ईरानी दूतावास को भी बंद करने के आदेश दिए थे.

रूहानी की जीत के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में अमरीका ने परमाणु मुद्दे और द्विपक्षीय संबंधों पर ईरान से सीधी बातचीत की दावत दी थी.

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