यमन में अल क़ायदा की मौजूदगी से डर क्यों?

यमन

छिपकर कानाफूसी सुनने वालों ने अल क़ायदा के दो आला नेताओं की भले जो साज़िश सुनी हो, उसने अमरीका की ख़ुफिया बिरादरी को इस तरह डरा दिया कि अमरीका को मध्य-पूर्व, एशिया और अफ़्रीका में 19 दूतावास बंद करने पड़े.

यमन की राजधानी सना में, जहां हमले का ख़तरा सबसे ज़्यादा माना जा रहा है, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी को भी अपने दूतावास बंद करने पड़े.

ब्रिटेन का दूतावास पूरी तरह खाली कर दिया गया है. मंगलवार को ब्रिटेन के दूतावास के सभी कर्मचारी यमन छोड़कर चले गए और अमरीकी वायुसेना ने अमरीकी कर्मचारियों को यमन से बाहर पहुंचा दिया.

यमन में अल क़ायदा की इस शाखा में ऐसा क्या है, जिससे वाशिंगटन में चेतावनी की घंटी बज जाती है?

Image caption अरब प्रायद्वीप का अल-क़ायदा अल जवाहिरी के प्रति वफादार है.

अरब प्रायद्वीप में अल क़ायदा (एक्यूएपी) यमन में अल क़ायदा की शाखा है, वह ओसामा बिन लादेन के संगठन का सबसे बड़ा हिस्सा नहीं है और न सबसे ज़्यादा सक्रिय है.

कुछ और जेहादी शाखाएं भी सक्रिय हैं, जो सीरिया और इराक़ में फैली हैं और क़रीब-क़रीब हर दिन साथी मुसलमानों से संघर्ष में उलझी होती हैं.

मगर वॉशिंगटन का मानना है कि अरब प्रायद्वीप का अल क़ायदा (एक्यूएपी) पश्चिमी जगत के लिए सबसे ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि इसके पास न सिर्फ तकनीकी दक्षता है, बल्कि इसकी पहुंच पूरी दुनिया तक है.

इसके अलावा यह संगठन अल क़ायदा के नेता आयमन अल जवाहिरी और पाकिस्तान में छिपे बाकी नेतृत्व के प्रति वफ़ादार भी है.

अगस्त 2009 में बम बनाने में माहिर सऊदी नागरिक इब्राहिम अल असीरी ने ऐसा विस्फोटक उपकरण बनाया था, जिसका पता लगाना बहुत मुश्किल था. इसे या तो पहनने वाले के शरीर में छिपाया जा सकता था या जांघों के पास लगाया जा सकता था.

इब्राहिम अल असीरी ने चरमपंथ विरोधी गतिविधियों के प्रभारी सऊदी राजकुमार को उड़ाने के लिए अपने भाई अब्दुल्ला को मानव बम बनाया और भेज दिया. वो क़रीब-क़रीब कामयाब हो ही गए थे.

ये जताते हुए कि वो आत्म समर्पण करना चाहते हैं, अब्दुल्ला अल असीरी ने सऊदी सुरक्षा एजेंसियों को गच्चा दिया और बम फूटने से पहले राजकुमार मोहम्मद बिन नायेफ़ के क़रीब पहुंचने में कामयाब हो गए.

धमाके से अब्दुल्ला अल असीरी का शरीर आधा उड़ गया पर बम की ताक़त कम होने से राजकुमार मोहम्मद बिन नायेफ़ बच गए, सिर्फ उनके हाथ में चोट आई.

इसके बाद अरब प्रायद्वीप के अल क़ायदा (एक्यूएपी) ने शेखी मारी कि वो फिर कोशिश करेगा और उसने वाकई फिर कोशिश की. दिसंबर 2009 में इब्राहिम अल असीरी ने नाइजीरिया के एक स्वयंसेवक उमर फारुक अब्दुल मुतल्लब पर लगाने के लिए एक और उपकरण बनाया.

उमर फारुक अब्दुल मुतल्लब अपने अंडरवियर में छिपे एक बम के साथ यूरोप से डेट्रॉइट की उड़ान भरने में कामयाब रहे. जो ख़ुफ़िया एजेंसियों और सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ी नाकामयाबी थी.

जब विमान डेट्रॉइट पहुंचने वाला था, उन्होंने धमाका करने की कोशिश की और उन्हें पहचान लिया गया. उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और जनसंहार का हथियार इस्तेमाल करने की कोशिश का दोषी पाया गया.

जब पश्चिमी ख़ुफ़िया एजेंसियों के प्रमुख इस नए बदलाव को आंकने के लिए इकट्ठा हुए, तो ब्रिटेन सरकार ने देश में ‘संभावित आतंकी ख़तरे’ का स्तर बढ़ाकर अब तक का सबसे ऊंचा स्तर ‘क्रिटिकल’ कर दिया.

ड्रोन हमले

साल 2010 में अरब प्रायद्वीप के अल क़ायदा ने फिर कोशिश की. प्रिंटर इंक टोनर कार्ट्रेज के कार्गो में छिपाकर बम की तस्करी की गई. निशाने पर अमरीका था और एक बम ब्रिटेन के ईस्ट मिडलैंड्स हवाई अड्डे तक भी पहुंच गया.

अरब प्रायद्वीप के अल क़ायदा में एक भेदिए की सूचना के बाद ये साज़िश आखिरी मिनट में नाकाम कर दी गई, लेकिन इस संगठन ने वादा किया है कि वह कोशिशें जारी रखेगा.

तभी से अरब प्रायद्वीप के अल क़ायदा के नेता लगातार अमरीकी ड्रोन के निशाने पर रहे हैं. कई आला सदस्य मारे गए हैं. इनमें उप प्रमुख सईद अल शिहरी और अंग्रेज़ी बोलने वाले प्रभावशाली नेता अनवर अल अवलाकी और समीर ख़ान शामिल हैं.

अमरीकी थिंक टैंक 'द न्यू अमरीका फाउंडेशन' के मुताबिक़ अमरीका के ड्रोन हमलों में बढ़ोत्तरी हुई है. 2011 में 18 हमले हुए थे और 2012 में 53 हो गए. मंगलवार को कथित तौर पर अल क़ायदा के चार सदस्यों को ले जा रही एक कार पर ड्रोन हमला हुआ.

यमन में अमरीका के ड्रोन को लेकर गुस्सा है क्योंकि कुछ मौक़ों पर इन्होंने गलत ठिकानों को निशाना बनाया और पूरे परिवार की मौत हो गई.

मानवाधिकार समूहों ने ड्रोन हमलों को न्याय प्रक्रिया से इतर की गई हत्या करार दिया है. स्थानीय समूह भी इन्हें राष्ट्रीय संप्रभुता के उल्लंघन के तौर पर देखते हैं.

मगर अमरीका और यमन के अधिकारी तर्क देते हैं कि शबवा, मरीब, अबयान प्रांत जैसे दूरदराज़ के इलाक़ों से मिली सूचनाओं के आधार पर आसमान से हमला करना ही हमलावरों को रोकने का एकमात्र तरीक़ा है.

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