श्रीलंका: बढ़ रहा है बच्चों का शोषण, नए कानून की मांग

एनसीपीए की वर्कशॉप

श्रीलंका के एक बड़े क़ानूनी अधिकारी ने बच्चों के शोषण के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए न्यायिक तंत्र का मज़बूत बनाने की मांग की है.

अटार्नी जनरल दफ़्तर की ओर से पिछले साल जारी आंकड़ों के मुताबिक़ 2007 में बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराधों के 3548 मामले सामने आए थे, 2011 में इनकी संख्या बढ़कर 4480 हो गई.

डिप्टी सालिसिटर जनरल सारथ जयामाने ने बीबीसी से कहा कि देश में अपराध क़ानून 30 साल से भी अधिक पहले लागू किए गए थे. लेकिन अब इनकी समीक्षा की जरूरत है.

उन्होंने कहा कि एक विधेयक का मसविदा अभी विचाराधीन है. उम्मीद है कि यह जल्द से जल्द यह क़ानून बनकर लागू हो जाएगा.

नया क़ानून

उन्होंने कहा कि अगर आप ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे राष्ट्रमंडल देशों को देखेंगे तो पाएंगे कि उन्होंने पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के लिए नए क़ानून लागू किए हैं.

उन्होंने कहा,''कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें हमें निश्चित रूप से सुधार करने की ज़रूरत है.''

निमाल सामंथा ऐसे इंसान हैं जिन्हें शोषण की इस पीड़ा की कुछ जानकारी है.

सामंथा की माँ का किशोरावस्था में ही शारीरिक शोषण किया गया था. बचपन में ही उन्हें एक डच दंपति ने गोद ले लिया.

समाज और परिस्थितियों ने उनकी माँ को उस व्यक्ति के साथ रहने के लिए मज़बूर किया जिसने उनका शोषण किया था. इससे उनका शोषण जारी रहा. उस व्यक्ति पर न तो कभी कोई आरोप लगा और न कोई मुक़दमा चला, क्योंकि परिवार अपनी इज्जत बचाए रखना चाहता था.

वो कहते हैं,''मैं इससे नाराज तो था. लेकिन बदला लेने में अपनी ऊर्जा ख़त्म करने की जगह मैंने अपना ध्यान उन हज़ारों लड़कियों पर लगाया जिनकी दुर्दाशा को नजरअंदाज कर दिया गया था.''

माँ को श्रद्धांजलि

वो कहते हैं कि यह उनकी माँ को श्रद्धांजलि थी, जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा.

Image caption निमाल सामंथा ने 2005 में नोना फ़ाउंडेशन का गठन किया

उन्होंने 2005 में नीदरलैंड में गोद लिए गए युवा श्रीलंकाइयों के साथ मिलकर 'नोना फ़ाउंडेशन' की स्थापना की.

इस संस्था ने श्रीलंका में शोषण के शिकार एक हज़ार से अधिक बच्चों और किशोरों की सहायता की.

उन्होंने कहा,''पिछले आठ सालों में मैं शारीरिक शोषण की शिकार सैकड़ों युवतियों से मिला.''

वो बताते हैं,''मैंने सुना कि कैसे समुदाय एक साथ आते हैं, पीड़ितों की रक्षा के लिए नहीं बल्कि परिवार की इज्जत के नाम पर पीड़ितों को चुप कराने या उनकी शोषक से शादी कराने के लिए.''

श्रीलंका में शोषण के मामलों की संख्या में बढ़ोतरी पर एक मत नहीं है.

बच्चों के कल्याण के लिए काम करने वाली सरकारी संस्था नेशनल चाइल्ड प्रोटेक्शन अथॉरटी (एनसीपीए) का कहना है कि शोषण के मामले अधिक नहीं बढ़े हैं.

मीडिया की नज़र

एनसीपीए की चेयरपर्सन अनोमा दिशानाएके का मानना है कि इस वृद्धि की वजह यह है कि मीडिया ने 2009 में तमिल अलगाववादियों और श्रीलंका की सेना के बीच संघर्ष ख़त्म होने के बाद इस मुद्दे पर अधिक ध्यान देना शुरू किया है.

दिशानायके ने बताया कि इस समस्या की सही तस्वीर का पता लगाने के लिए एनसीपीए ने बच्चों के शोषण के मामलों का डाटाबेस तैयार कर रहा है.

लेकिन जयामाने ने बीबीसी से कहा कि श्रीलंका की बड़ी अदालतों में जो मामले सुने जाते हैं, उनमें से 45 फ़ीसद मामले बच्चों के शोषण से संबंधित होते हैं.

वो कहते हैं,''इससे पता चलता है कि बच्चों के शोषण के मामले बढ़ रहे हैं.''

वो कहते हैं, ''हो सकता है कि इसके पीछे कुछ और भी कारण हों. लेकिन सामान्य रूप से मैं कह सकता हूं कि पिछले 10-15 सालों में बच्चों के शोषण के मामलों में बृद्धि हुई है.''

वरिष्ठ अधिकारी इस बात पर सहमत हैं कि न्यायिक तंत्र जिस तरह से पीड़ितों से निपटता है उसमें बदलाव की जरूरत है.

जयामाने कहते हैं,''ख़ासतौर पर जब बच्चों की बात आती है तो मुझे लगता है कि बच्चों के शोषण के मामले में पीड़ितों की रक्षा करने की जरूरत है.''

पीड़ितों के साथ व्यवहार का एक उदाहरण यह है कि उन्हें जेल की गाड़ियों में वर्दीधारी जेल अधिकारियों के साथ ले जाया जाता है.

दिशानायके कहती हैं,''यह पूरी तरह गलत है. हम इस पर काम कर रहे हैं. हम सभी प्रांतों में पीडि़तों के लिए अपने वाहन इस्तेमाल करने पर ज़ोर देंगे.''

क़ानूनी पहल

Image caption एनसीपीए बच्चों के शोषण का एक डाटाबेस तैयार कर रहा है

बच्चों के शोषण के मामलों में कमी लाने के लिए ज़रूरी है कि बच्चों के अनुकूल सुनवाई के लिए बनी अदालतों की संख्या बढ़ाई जाए और ख़ासतौर पर बच्चों के लिए अदालतें बनाई जाएं.

दिशानायके बताती हैं,''अटार्नी जनरल विभाग और न्याय मंत्रालय के साथ मिलकर हम इस तरह के मामलों की तेज़ सुनवाई के एक पायलट प्रोजक्ट पर काम कर रहे हैं. इसे अब एक साल हो गए हैं. इसलिए मुझे लगता है कि वे इसे आगे ले जाएंगे.''

वहीं कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसके लिए केवल क़ानूनी तंत्र में बदलाव की ही जरूरत नहीं है बल्कि परिवार के इज्जत के नाम पर पीड़ित को अपराधी मानने के समाज के नजरिए को भी बदलने के जरूरत है.

निमाल सामंथा कहते हैं,''आप पीड़ित और शोषक को एक साथ रहने के लिए कैसे कह सकते हैं. इससे आपकी पूरी जिंदगी तबाह हो जाएगा. इसमें मानवीय गरिमा कहा है.''

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