ईरान: पश्चिम के साथ नाजुक रिश्तों की डगर पर रूहानी

  • 10 अगस्त 2013
ईरान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति हसन रूहानी

ईरान में 14 जून को हुए राष्ट्रपति चुनाव में हसन रूहानी का जीतना कई लोगों के लिए अप्रत्याशित था. सुधारवादियों के समर्थन से जीते रूहानी ने आम ईरानियों के मन में उम्मीदों जगा दी हैं.

बीते वक्त में आम ईरानियों ने अपने मुल्क को अलग-थलग पड़ते हुए देखा है. उन्हें अमरीका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के असर भी भुगतना पड़ा है.

धमकी से नहीं सुलझेगा

ईरान की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ खाद्य मुद्रास्फीति 50 फीसदी से ऊपर है और तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों की वजह से ईरान की मुख्य आय के स्रोत में 65 फीसदी की गिरावट आई है.

लेकिन पहले दौर में ही रूहानी की जीत के बाद मीडिया और सरकारी अधिकारियों ने इस बात की उम्मीद जता दी कि वे परमाणु मुद्दे को पश्चिम के साथ सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे और इससे प्रतिबंधों से पैदा हुए बोझ को हल्का करने का रास्ता खुलेगा.

रूहानी ने खुद भी अपने प्रचार अभियान में किसी समझौते को लेकर उम्मीदें जगाई थीं और लोग इसका इंतजार भी कर रहे हैं.

प्रतिबंध हटाने की अपील

ईरान में चुनाव से हफ्ते भर पहले ही उन्होंने देश की समस्याओं को ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जोड़ा. उनकी बात देश भर में टेलीविजन पर देखी सुनी गई.

उन्होंने कहा, "एक ओर जहाँ अर्थव्यवस्था की बुनियादी चीजों को रफ्तार देने की जरूरत है, वहीं उसे गतिशील बनाया जाना भी जरूरी है."

'सुधार'

हालांकि राष्ट्रपति ने उस जुबान से बचने की कोशिश की जो अक्सर ईरानी निज़ाम के साथ जोड़ा जाता है. उनके भाषणों में 'विरोध', 'मुकाबला' या 'दुश्मन' जैसे शब्दों का कम ही इस्तेमाल देखा गया. इसकी जगह पर उन्होंने 'सुधार' की बात की है.

रूहानी की चुनौतियाँ

उन्होंने कहा है, "विदेश नीति में सुधार न तो आत्मसमर्पण है और न ही किसी तरह की दुश्मनी, यह न तो शिथिल होने जैसा है और न ही झगड़ा करना. सुधार बाकी दुनिया के साथ सक्रियता और सकारात्मक व्यवहार है."

महमूद अहमदीनेजाद के कट्टरपंथी रवैये के आठ साल बाद रूहानी के इस रुख का ताजा हवा के झोंके की तरह स्वागत किया गया है.

छह अगस्त को एक संवाददाता सम्मेलन में अपनी बात दोहराते हुए कहा, "परमाणु मुद्दे को सुलझाने के लिए ईरान पश्चिम के साथ गंभीर बातचीत को लेकर इच्छुक है. लेकिन बातचीत भरोसे और आपसी सौहार्द्र के साथ होनी चाहिए. इसके साथ ही ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम नहीं छोड़ेगा."

रूहानी की जीत का जश्न

पश्चिम के साथ निपटने के रूहानी के सुधारवादी रवैये का अमरीका और ब्रिटेन ने सतर्कता के साथ स्वागत किया है. लेकिन आरोप प्रत्योरोपों और अविश्वास के लंबे दौर के बाद राष्ट्रपति रूहानी को यह अच्छी तरह से पता है कि आने वाले हफ्तों और महीनों में व्यावहारिक कूटनीति की जरूरत पड़ेगी.

चुनौतियाँ

पश्चिम के साथ निपटने के मामले में 64 वर्षीय रूहानी अभी नए हैं. पूर्व सुधारवादी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी के कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर काम कर चुके रूहानी साल 2003 से 2005 के बीच ईरान के प्रमुख परमाणु वार्ताकार रहे हैं.

फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले रूहानी को पश्चिमी वार्ताकारों में गंभीरता से लिया जाता है.

रिश्तों में सुधार

उनकी सबसे बड़ी चुनौती भरोसा बनाना है. इसके लिए पहली जरूरत वार्ताकारों की एक टीम बनाने की है. इन वार्ताकारों को न केवल अमरीका और यूरोप से सामंजस्य बिठाना होगा बल्कि ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्ला सैयद अली खामनेई की बात भी सुननी होगी.

ईरान की सियासत में खामनेई ही वह शख्स हैं जिनकी राय निर्णायक मानी जाती है.

नए राष्ट्रपति ने अच्छी शुरुआत भी की है. विदेश मंत्रालय के लिए उन्होंने अमरीका में पढ़े लिखे मोहम्मद जायद ज़रीफ को चुना है. ज़रीफ अमरीका में ईरान के दूत रह चुके हैं और उन्हें पश्चिमी कूटनयिकों में खासा पसंद किया जाता है. पश्चिमी कूटनयिक ज़रीफ की बातचीत की काबिलियत को याद करते हैं.

ईरान का परमाणु कार्यक्रम

ईरान के मामले पर नज़र रखने वाले सईद बार्जिन कहते हैं, "अगर ज़रीफ के नामांकन को ईरान की संसद मजलिस की मंजूरी मिल गई तो पश्चिम के साथ बातचीत के मसले पर रूहानी का असर ज्यादा रहेगा."

ऐसे वक्त में जब दोनो पक्ष कूटनयिक खींचतान में उलझे हुए हैं, ऐसे लोग भी हैं जो मामले को सुलझते हुए नहीं देखना चाहते हैं. इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू पहले ही हसन रूहानी को "भेड़ के लिबास में भेड़िया" करार दे चुके हैं.

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