छत छिनी, जज़्बा नहीं

  • 16 अगस्त 2013
ज़ातारी शरणार्थी शिविर

एक कार्गो कंटेनर का दरवाज़ा खुलता है और दिखाई देती हैं बेहद ख़ूबसूरत कढ़ाई की हुई लाल, गुलाबी और सफेद पोशाकें.

मैं आतिफ़ की शादी के कपड़े किराए पर देने की दुकान में आया था, ये दुकान इस बात की याद दिलाती है कि प्यार बेहद मुश्किल हालात में भी खिलता है.

आतिफ़ की ये दुकान जॉर्डन के ज़ातारी शरणार्थी शिविर में है. इस शरणार्थी शिविर में क़रीब एक लाख 20 हज़ार लोग हैं जो सीरिया के गृह युद्ध से बचकर भागे हैं.

आतिफ़ का कंटेनर उस सड़क पर है जिसे मदद के लिए पहुंचे स्वयंसेवी लोगों ने सैकड़ों दुकानों की वजह से चैम्प्स एलिसीस का नाम दिया है.

आतिफ़ इस शरणार्थी शिविर में एक साल से ज़्यादा वक़्त से हैं. वो ज़ातारी शिविर से क़रीब 30 किलोमीटर दूर दरा से भागकर यहां आए हैं.

Image caption आतेफ की शादियों के कपड़े किराये पर देने की दुकान ठीकठाक चल रही है

आतिफ़ का कहना है कि “उन्होंने इस दुकान को अबाया (महिलाओं के पहनने वाला नेक़ाब) की दुकान के तौर पर शुरू किया था.”

'शादियां नहीं रुकती'

आतिफ़ कहते हैं, “महिलाएं यहां आकर कहती थीं कि उनकी शादी है लेकिन उन्हें कपड़े नहीं मिल रहे इसलिए हमने किराए पर देने के लिए दो पोशाकें ख़रीदीं और ये चल निकली. यहां हर दिन दो शादियां होती हैं और इस शरणार्थी शिविर के बाहर से भी लोग यहां आते हैं क्योंकि यहां पोशाकें सस्ती मिलती हैं. मुनाफा ज़्यादा नहीं है लेकिन काम ठीक चल रहा है. हम 10 दिनार (क़रीब 850 रुपए) में पोशाक किराए पर देते हैं. कभी-कभी जब लोग किराया नहीं दे पाते तो हम पांच दिनार ही ले लेते हैं.”

आतिफ़ की ये दुकान इस बात की मिसाल है कि शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनएचसीआर कैसे कारोबार और सेवाओं को बढ़ावा देकर इस शरणार्थी शिविर में हालात सामान्य बनाने की कोशिश कर रही है.

ये शरणार्थी शिविर पिछले साल शुरू हुआ था, कुछ कालाबाज़ारी भी हुई है, विरोधी गैंग मदद के तौर पर मिलने वाले सामान की ग़ैरक़ानूनी बिक्री पर नियंत्रण की कोशिश करते हैं और शिविर को मिलने वाली बिजली का ग़लत इस्तेमाल होता है.

रात के वक़्त तस्कर यूएनएचसीआर के तंबू और खाने-पीने की चीज़ों को ले जाने के लिए शिविर के बाहर इंतज़ार करते हैं.

Image caption क्लेनश्मिट इस शरणार्थी शिविर का प्रबंधन देखते हैं

कालाबाज़ारी बड़ी चुनौती

इस कालाबाज़ारी से निपटने के लिए यूएनएचसीआर ने किलियन क्लेनश्मिट् को इस शिविर का ‘मेयर’ बनाया है.

क्लेनश्मिट् को मानवीय त्रासदियों में मदद का लंबा अनुभव है, उन्होंने दक्षिण सूडान, सोमालिया और कोसोवो में शरणार्थी शिविरों का प्रबंधन किया है.

ये बताने के लिए कि ये शिविर कितना बड़ा है, किलियन क्लेनश्मिट् मुझे इस शिविर के चारों ओर बनी आठ किलोमीटर की सड़क पर ले गए.

इस सड़क पर ही कालाबाज़ारी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी जा रही है.

वो मुझे खिड़की से बाहर दिखाते हैं. बुलडोज़र मिट्टी खोद रहे हैं. क्लेनश्मिट् कहते हैं कि “हम तस्करों के लिए आपूर्ति के रास्ते रोक रहे हैं.”

इसके बाद वो मेरा ध्यान धरती पर बने आयताकार निशानों की ओर खींचते हैं.

ये निशान इस शिविर में विरोधी गुटों ने अपना इलाक़ा साफ करने के लिए बनाया हैं. इस शिविर में अनौपचारिक संपत्ति बाज़ार भी फल-फूल रहा है.

Image caption चैम्प्स एलिसीस के नाम पर ही ज़ातारी शरणार्थी शिविर की मुख्य कारोबारी सड़क का नाम रखा गया है.

जब हम किलियन क्लेनश्मिट् के दफ्तर में पहुंचते हैं तो मेरा ध्यान एक नक्शे पर जाता है

जिस पर कई लेगो बैंडिट (एक तरह का खिलौना) और संत जैसे दिखने वाले स्मर्फ (बेल्जियम का मशहूर कार्टून) हैं.

ये नक्शा इस शिविर में स्थानीय परिषद बनाकर शांति और स्थिरता लाने की उनकी योजना दिखाता है.

मैं उनसे पूछता हूं कि क्या “मैं इस नक्शे का फोटो ले सकता हूं?”

किलियन क्लेनश्मिट् मुझे कहते हैं “बिल्कुल, जॉन कैरी (अमरीकी विदेश मंत्री) जब यहां आए थे तब इस नक्शे के साथ खेले थे.”

किलियन क्लेनश्मिट् बताते हैं कि सीरिया में युद्ध के लंबा खिंचने के साथ इस शिविर में एक तरह की स्थिरता आ रही है.

“लोगों में ये एहसास घर कर रहा है कि उन्हें यहीं रहना है. घर सीमेंट से बनाए जा रहे हैं और टॉयलेट, शॉवर और रसोई घर भी जोड़े जा रहे हैं. ये दिखाने के लिए कि ये घर है, कुछ लोगों ने तो फ़व्वारा भी लगवा लिया है.”

ऐसे में वो इस शिविर में काला बाज़ारी पर कैसे लगाम लगाएंगे?

किलियन क्लेनश्मिट् कहते हैं, “हम लोगों से कह रहे हैं कि बिजली का बिल चुकाया जाना चाहिए, क्योंकि मैंने अपने कुछ दोस्तों को देखा कि वो चिकन भून रहे हैं.”

“एक ने मुझे कहा कि वो रोज़ 100 चिकन बेच देता है. यानी वो एक चिकन पर क़रीब 2 डॉलर का मुनाफ़ा कमाता है और दिन में 200 डॉलर का मुनाफ़ा.”

“क्या मैं उसकी बिजली काट दूंगा? नहीं. लेकिन मैं उसे बताने वाला हूं कि मैं बिजली सप्लाई तो दूंगा लेकिन उसे बिल चुकाना होगा. वो लोग मुस्कुराहट के साथ हां कह रहे हैं.”

मेरा ज़ातारी दौर ख़त्म होने से पहले मैं चैम्प्स एलिसीस को देखने एक बार फिर जाता हूं.

एक पिता शाम के कारोबार के लिए अपने बच्चे के साथ कैंडी फ्लॉस (गुड़िया के बाल) बना रहा है.

अचानक कुछ लड़के भागने लगते हैं. एक तपते हुए दिन के बाद अचानक कुछ लोगों की जॉर्डन के सुरक्षाकर्मियों से झड़प हो गई है. शिविर की धातु की छतों पर आंसू गैस के गोले गिरने लगते हैं.

कोई ज़ख़्मी नहीं होता लेकिन ये घटना कुछ याद दिलाने के लिए काफ़ी है. यूएनएचसीआर की कोशिशों के बावजूद ज़ातारी का चैम्प्स एलिसीस अपने फ्रेंच हमनाम से बहुत दूर है जो कारोबार के लिए मशहूर है.

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