आज के डिजिटल दौर में रक्षा बंधन

Image caption बदलते दौर में त्योहारों के परंपरागत रूप भी बदल रहे हैं

अब से कुछ साल पहले तक हर राखी डाक से आती थी जिसमें किसी बच्चे के नोटबुक से फाड़े गए पन्ने का इस्तेमाल करके बनाई गई रोली की पुड़िया और एक चिट्ठी भी होती थी. लेकिन डिजिटल दौर में राखी ख़रीदने और भेजने का तरीक़ा भी बदल रहा है.

राखी ख़रीदने के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं होती. कई ऐसी वेबसाइट्स हैं जिन पर राखी, चॉकलेट, मिठाई, हैप्पी रक्षाबंधन के कार्ड और ढेरों दूसरे तोहफ़े मिलते हैं. पिछले तीन साल से दिल्ली में रहने वाली मेरी एक बहन ऐसी ही एक वेबसाइट के ज़रिए मुझे राखी भेजती है. परंपरागत डाक से भी कई राखियाँ आती हैं.

कुछ साल पहले तक मेरी बीवी अपने भाइयों के लिए राखी ख़रीदने मीलों दूर पश्चिमी लंदन के देसी इलाक़े में जाती थी, रक्षाबंधन से तीन हफ़्ते पहले ही डाक भेज दी जाती थी, इस बार दो दिन पहले सारी राखियाँ ऑनलाइन ऑर्डर की गईं, दो दिन के भीतर राखी पहुँचाने का वादा करने वाली वेबसाइट के ज़रिए.

बाज़ार हर त्यौहार को बदलता है, राखी को भी बदल रहा है, 'हैप्पी रक्षाबंधन' के कार्ड तो दस साल पहले ही दिखने लगे थे. एक और बदलाव आया है, मेरी बीवी के लिए भी एक राखी मेरी बहन ने भेजी है. राखी की बिक्री दोगुना करने का इससे अच्छा तरीक़ा क्या होगा?

मिठाई की जगह चॉकलेट

Image caption बाज़ार में राखी की खरीदारी करती युवतियां.

राखी के साथ मिठाई की जगह चॉकलेट भेजा जाना, बहनों को साड़ी या पैसे की जगह स्मार्टफ़ोन या टैबलेट दिया जाना भी बदलते वक़्त की ओर इशारा करते हैं.

एक अनुमान के मुताबिक़ वेबसाइटों के ज़रिए भारत से विदेश और विदेश से भारत में भेजी जाने वाली राखियों की संख्या में पिछले तीन सालों में 15 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. एक भारतीय अख़बार ने तो ख़बर छापी है कि चंडीगढ़ की लड़कियाँ इंग्लैंड और अमरीका में बसे भाइयों को ही नहीं बल्कि भारत में रहने वाले भाइयों को भी ऑनलाइन राखी भेज रही हैं.

डाक से आई राखी बाँधकर उदास हो जाने वाली हमारी पीढ़ी थी, अब राखी के दिन मेरा बेटा और मेरी बेटी स्काइप के ज़रिए भारत के अपने भाई-बहनों से ज़रूर बात करते हैं, जो फ़ोन पर बात करने से एक क़दम आगे है क्योंकि वे कलाइयों पर सजी राखियाँ भी देख सकते हैं.

वेबसाइट के ज़रिए राखी भेजने में वैसे तो कोई बुराई नहीं, लेकिन चिट्ठी की जगह छपा हुआ मैसेज और रोली की पुड़िया की जगह प्लास्टिक का पाउच होता है, जिनमें 'निजी एहसास' नहीं होते.

मैं कल ही सोच रहा था कि वक़्त सचमुच बदल गया है और परंपरा ख़त्म होती जा रही है. इससे पहले कि मैं कोई पक्की राय बनाता, अमरीका से एक राखी आई, सिल्क के कपड़े को सितारे के आकार में काटकर उसमें गोटे का फीता लगाकर हाथ से बनाई गई राखी. साथ में हाथ से अँगरेज़ी में लिखी मौसेरी बहन की चिट्ठी, जिसे हिंदी नहीं आती.

मैंने डिजिटल एज में रक्षाबंधन में आने वाले बदलावों पर कोई पक्की राय बनाने का इरादा फ़िलहाल छोड़ दिया है.

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