लोगों की ज़िंदगी बदल रहा है स्टोव कारोबारी

डेकेस्न फडनार्ड

लातिन अमरीकी देश हैती में साल 2010 में आए भूकंप में 2 लाख 20 हज़ार लोगों की जान चली गई थी और 15 लाख लोग बेघर हो गए.

डेकेस्न फडनार्ड की नई कंपनी भी इस भूकंप में बर्बाद हो चुकी थी और उनके पास दो उपकरणों के अलावा कुछ नहीं बचा था.

लेकिन आज उनकी कंपनी 33 हज़ार स्टोव बेच चुकी है और उसमें 35 लोग काम करते हैं.

डी एंड ई ग्रीन एंटरप्राइज़ेज़ नाम की इस कंपनी ने पिछले साल 65 लाख रुपये का कारोबार किया था.

ये रकम देखने में भले छोटी लगे लेकिन हैती की इस छोटी कंपनी के लिए ये बहुत बड़ी रकम है जो पर्यावरण बचाने के लिए स्टोव बनाती है.

जिस वक्त हैती में भूकंप आया तब फडनार्ड न्यूयॉर्क में थे. वो छह हफ्ते बाद हैती लौटे और अपने 15 कर्मचारियों को ये बताने के लिए बैठक बुलाई कि सब कुछ ख़त्म हो चुका है.

Image caption इको रेशो नाम का ये स्टोव कम चारकोल इस्तेमाल करता है.

लेकिन उनके कर्मचारियों ने ये साफ कर दिया कि वो उन्हें इस तरह जाने नहीं देंगे.

फडनार्ड कहते हैं, "एक आदमी ने मुझसे कहा, 'अभी हमारे पास सिर्फ यही चीज़ बची है. भूकंप ने हमारे परिवार और घर छीन लिए. आप हम से वो आखिरी चीज़ भी छीन रहे हैं जिस पर हमें भरोसा था.'"

फडनार्ड कहते हैं, "इस तरह के बयान के बाद मुझे लगा कि ये सिर्फ मेरे लिए नहीं है. ये इन लोगों को उम्मीद देने के बारे में ज़्यादा है."

इसके बाद कंपनी का स्टोव बनाने का काम एक कारोबारी के दिए दो तंबुओं में शुरू किया गया.

हैती में ज़्यादातर लोग ख़ाना पकाने के लिए धातु के बने स्टोव का इस्तेमाल करते हैं.

लेकिन फडनार्ड का 'इको रेशो' नाम का स्टोव सामान्य स्टोव से आधा ही ईँधन इस्तेमाल करता है. और धातु का बना होने के बावजूद अंदर एक सिरेमिक की परत होती है जो गर्मी को बर्बाद नहीं होने देती.

उनका स्टोव सिर्फ 10.50 डॉलर यानी करीब 650 रुपये में बिकता है.

फडनार्ड अपनी बचत और परिवार की मदद से सिर्फ 18 साल की उम्र में अमरीका चले गए थे, जहां उन्होंने एक दशक से ज़्यादा समय काम किया.

Image caption फडनार्ड का इरादा अपने कर्मचारियों को स्वास्थ्य बीमा देने का भी है.

हालांकि उनका मकसद हमेशा हैती लौटकर अपने लोगों की मदद करना था.

एक बार घाना की सैर पर 36 साल के फडनार्ड ने एक स्टोव देखा जिसमें कम चारकोल का इस्तेमाल होता था.

हैती में ज़्यादातर परिवार अपनी आय का एक तिहाई लकड़ी के कोयले पर खर्च कर देते हैं, ऐसे में फडनार्ड को लगा कि इस स्टोव की हैती में काफी मांग होगी और इससे लकड़ियों की कटाई में भी कमी आएगी.

हैती में अब सिर्फ 1.5 फीसदी ही जंगल बचे हैं जबकि 1920 के दशक में तीन चौथाई इलाके में जंगल थे.

फडनार्ड ने अपनी बचत से एक फैक्ट्री बनवाई और थोड़ी से बदलाव के बाद उसी तरह के स्टोव का उत्पादन शुरू कर दिया जैसा उन्होंने घाना में देखा था.

अभी ये स्टोव हाथ से बन रहे हैं और फडनार्ड ने इनका उत्पादन मशीनों से करने के लिए लोगों से चंदा मांगना शुरू किया है.

फडनार्ड कहते हैं, "अब लक्ष्य चारकोल की जगह कोई और ईँधन इस्तेमाल करने का है."

उनकी कंपनी खेती से निकलने वाले कचरे का इस्तेमाल कर गांवों में बिजली भी देना चाहती है.

हैती में दो तिहाई लोग बेरोज़गार हैं और फडनार्ड का मानना है कि लोगों को नौकरी मिलने से उनकी ज़िंदगी बेहतर होगी.

उनकी कंपनी कर्मचारियों को एक वक्त का खाना देती है और उनकी पढ़ाई और सेहत के बीमा के लिए भी पैसा देने की योजना है.

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