कौन जीतेगा-लोकतंत्र या इस्लामी क़ानून?

  • 29 अगस्त 2013
इस्लामिक क़ानून, लोकतंत्र, धर्म

मध्यपूर्व में जो हो रहा है उसे समझने के लिए हमें प्रथम विश्वयुद्ध के अंत को समझना होगा. ऑस्ट्रो-हंगेरियाई साम्राज्य नष्ट हो चुका था और उसके अवशेषों से कई राष्ट्रों का जन्म हुआ.

इन देशों में ऑस्ट्रिया, हंगरी, रोमानिया और चेकोस्लोवाकिया अचानक पैदा नहीं हुए थे. इनकी सीमाओं का निर्धारण लंबे समय से चले आ रहे भाषा, धर्म, संस्कृति और जातीयता के आधार पर हुआ था. हालांकि यह निर्धारण अगले दो दशकों में ढह भी गया पर इसकी वजह थी नाज़ीवाद और साम्यवाद. दोनों ही विचारधाराएं दूसरों पर विजय पाने के लिए थीं.

आज यूरोप के राष्ट्र राज्यों को यूं ही देखते हैं. मगर उनका अस्तित्व राजनीतिक तौर पर स्थायी है और हरेक में उस देश के बाशिंदों की तरफ़ से चुनी गई सरकारें काम कर रही हैं.

जब ऑस्ट्रो-हंगेरियाई साम्राज्य का अंत हुआ उसी समय ऑटोमन साम्राज्य भी ख़त्म हुआ, जिसकी सीमाएं पूरे मध्यपूर्व से लेकर उत्तरी अफ़्रीका तक फैली थीं.

मित्र राष्ट्रों ने ऑटोमन साम्राज्य को छोटे-छोटे राज्यों में बांट दिया. मगर इनमें से बहुत कम ही लोकतंत्र के सहारे स्थायी रह सके. ज़्यादातर में कबीलाई, सांप्रदायिक, पारिवारिक या सैन्य शासन कायम हो गया. जैसे सीरिया में सत्ता को चुनौती देने वाले हर संगठन को हिंसात्मक ढंग से दबा दिया गया.

तुर्की ने चुना यूरोपीय मॉडल

लोग अक्सर मध्यपूर्व में लोकतंत्र न होने की व्याख्या इस तर्क के साथ देते हैं कि किसी इलाक़े की सीमाओं का निर्धारण वहां पूर्व में मौजूद लोगों के झुकाव से कोई ताल्लुक नहीं रखता.

Image caption रॉजर स्क्रूटन लेखक और दार्शनिक हैं

कुछ मामलों में यह तर्क सही रहा. तुर्की की सेना के जनरल कमाल अतातुर्क तुर्की भाषा बोलने वालों को यूरोपियन मॉडल पर बने आधुनिक राज्य में बदलने में कामयाब रहे. दूसरी जगहों पर बहुत से देशों ने ख़ुद को राष्ट्रीय के बजाय धार्मिक आधार पर पहचान से जोड़ा.

1928 में मुस्लिम ब्रदरहुड की स्थापना करने वाले हसन अल बन्ना ने अपने अनुयायियों से कहा था कि दुनियाभर के मुसलमानों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ख़लीफ़ा के अंतर्गत लाना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए.

धर्म से अपनी पहचान जोड़ने वाले देशों को राष्ट्रीय सीमाओं में बांधने का नतीजा एक अराजकता में हुआ जिसे हमने इराक़ में देखा, जहां सुन्नी और शिया प्रभुत्व के लिए लड़ रहे हैं या इससे बड़ी अराजकता सीरिया में देखने में आ रही है जहां एक अल्पसंख्यक इस्लामी समुदाय अलावाइट ने असद परिवार के उदय से लेकर आज तक सामाजिक ताक़त बरक़रार रखी है.

इसके उलट यूरोपियन देश ज़्यादातर राष्ट्रीय आधार की तरफ़ झुकाव रखते हैं. उनके लिए किसी भी संघर्ष की स्थिति में राष्ट्र को बचाना ज़रूरी होता है. और अगर भगवान ने इसके ख़िलाफ़ आदेश दिया है तो भी उसे दोबारा इस पर विचार करना पड़ता है. इस्लाम में ऐसा विचार भी अभिशाप है जो इस पर आधारित है कि अल्लाह ने एक क़ानून तय किया है और हमें उसका पालन करना है. और यही इस्लाम शब्द का मतलब है- समर्पण.

सुन्नी इस्लाम ऑटोमन साम्राज्य का आधिकारिक धर्म था और किसी भी अन्य तरह के इस्लाम की मान्यता नहीं थी. कई ईसाई, पारसी और यहूदी संप्रदायों के लिए सहिष्णुता अपनाई गई लेकिन कई सदियों तक साम्राज्य में एक नागरिक क़ानून के लिए इस्लामी पवित्र क़ानून यानी शरिया का पालन किया जाता रहा.

अतातुर्क ने सल्तनत को ख़त्म कर एक नया नागरिक क़ानून लागू किया जिसका आधार यूरोपियन था. उन्होंने एक ऐसे संविधान की नींव रखी जिसने खुले तौर पर इस्लामी क़ानून से अपने सभी संबंध तोड़ लिए. जिसके तहत इस्लामी पोशाक, बहुविवाह पर पाबंदी लगा दी गई. शिक्षा का धर्मनिरपेक्ष ढांचा लागू किया गया और तुर्की मातृभूमि की सेवा हर तुर्क का प्राथमिक कर्तव्य बताया गया. उन्होंने अल्कोहल की बिक्री की इजाज़त दी.

Image caption ऑटोमन साम्राज्य के अंत के बाद तुर्की ने ख़ुद को आधुनिकता के रास्ते पर डाल दिया और इस्लामी क़ानून से अपने संबंध तोड़ लिए.

अतातुर्क ने तुर्की को एक खुलेपन और समृद्ध देश के बतौर खड़ा किया ताकि वो आधुनिक विश्व के सामने अपना चेहरा गर्व से ऊंचा कर सके. पुरुषों और महिलाओं के लिए 1933 में वयस्क मताधिकार लागू किया गया और देश को ऐसे संविधान के तहत लाया गया जिसे दैवीय क़ानून की जगह इंसानी क़ानून निर्माता चलाते हैं.

राज्य और धर्म में तनाव

ग़ौर करने की बात यह है कि तुर्की की आबादी पूरी तरह मुस्लिम है और वहां के लोग क़ुरआन मजीद में वर्णित जीवन को लेकर झुकाव रखते हैं. इसीलिए वहां के धर्मनिरपेक्ष राज्य और लोगों की धार्मिक भावनाओं में हमेशा तनाव बना रहा है.

अतातुर्क इस बात से वाकिफ़ थे और उन्होंने धर्मनिरपेक्ष संविधान का संरक्षक सेना को बनाया था. सैन्य अधिकारियों के लिए ऐसी शिक्षा की व्यवस्था की गई कि वो उलेमाओं के रूढ़िवाद का सामना कर सकें. सेना राष्ट्रभक्ति को ऊपर रखती थी और प्रगति और आधुनिकता की वकालत करती थी. इसी के चलते कई बार सेना को सामने आना पड़ा.

1980 में जब सोवियत यूनियन ने तुर्की में लोकतंत्र में सेंध लगाने की कोशिश की तो उसने ज़रूरी कदम उठाए. हाल के वर्षों में जब प्रधानमंत्री रेसेप एर्डोगान ने पुराने इस्लामिक मूल्यों की तरह क़दम बढ़ाए तो सेना ने अपनी मौजूदगी दर्शाई. एर्डोगान की जस्टिस एंड डेवेलपमेंट पार्टी पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष नहीं है और वो मस्जिद के बजाय सेना को संविधान का संरक्षक बनाने के भी विरोधी हैं. कई सैन्य अधिकारी और पत्रकार विरोध के कारण जेल में हैं.

Image caption तुर्की के जनरल कमाल अतातुर्क ने तुर्की को यूरोपियन मॉडल पर आधारित राज्य बनाया.

तुर्की में अब विरोध करना ख़तरनाक हो चुका है. तुर्की का केस बताता है कि लोकतंत्र, आज़ादी और मानवाधिकार एक ही चीज़ नहीं बल्कि तीन हैं.

मिस्र:शरिया क़ानून पर जंग

मिस्र का उदाहरण ज़्यादा सही है. मुस्लिम ब्रदरहुड हमेशा से एक जनांदोलन और जनसमर्थन के ज़रिए ख़ुद को स्थापित करने की कोशिश करती रही है. मगर इसके सबसे प्रभावशाली नेता सैयद क़ुतुब ने धर्मनिरपेक्ष राज्य का विचार ईशनिंदा की तरह नकार दिया और माना कि यह अल्लाह की इच्छा के ख़िलाफ़ है. सैन्य तख्तापलट के बाद सत्ता में आए क़ुतुब को राष्ट्रपति नासिर ने सज़ा दी थी.

इसके बाद से मुस्लिम ब्रदरहुड और सेना आमने-सामने रहे हैं. मुस्लिम ब्रदरहुड ने एक चुनाव जीतकर मिस्र को इस्लामी गणराज्य बनाने की कोशिश की. मोर्सी के समर्थकों के लगाए पोस्टरों में लोकतंत्र या मानवाधिकारों की वकालत नहीं की गई है. वो कहते हैं – हम सभी शरिया के साथ हैं. सेना ने इसका जवाब दिया कि –नहीं, हममें से कुछ ही हैं.

इस्लामी क़ानून की ज़रूरत?

तो कोई आधुनिक राज्य इस्लामी क़ानून से क्यों नहीं चलाया जा सकता? यह एक काफ़ी विवादित मामला है और इस बारे में कई विद्वानों ने विचार व्यक्त किए हैं.

Image caption मध्यपूर्व में इस्लाम और लोकतंत्र के बीच द्वंद्व की स्थिति लगातार बनी हुई है.

इस्लामी न्याय का मूल विचार पैग़ंबर के मदीना में प्रशासन के साथ शुरू हुआ जिसने न्यायकर्ताओं को समाज की ज़रूरतों के मुताबिक़ बदलाव की इजाज़त दी थी और इस प्रक्रिया को इज्तिहाद यानी प्रयास कहा जाता था. मगर लगता है कि आठवीं सदी में ही इसका अंत हो गया जब उस वक़्त प्रभावी धार्मिक मान्यता के तहत कहा गया कि सभी ज़रूरी मामलों को सुलझा लिया गया है और अब ‘इज्तिहाद के दरवाज़े बंद हो गए हैं.’

ऐसे में आज शरिया लागू करने की कोशिश लोगों पर ऐसे क़ानून को थोपने का ख़तरा खड़ा करती है जो उस सरकार के लिए बनाया गया था जो अब मौजूद ही नहीं है और इंसानी ज़िंदगी की बदलती परिस्थितियों के मुताबिक़ बदलने को तैयार नहीं है. इस बात को संक्षेप में यूं कहा जा सकता है- धर्मनिरपेक्ष क़ानून वक़्त के साथ बदलता है, धार्मिक क़ानून महज़ दृढ़ बना रहता है.

इसके अलावा चूंकि शरिया ने वक़्त के साथ बदलाव नहीं किया है तो कोई नहीं जानता कि असल में वह क्या कहता है. क्या इसमें व्याभिचारियों को पत्थर मारकर मौत कीसज़ा देने का प्रावधान है? कुछ लोग कहते हैं हां, तो कुछ कहते हैं नहीं. क्या यह बताता है कि सूद पर पैसा लेना हर क़ीमत पर निषिद्ध है? कुछ लोग कहते हैं हां, तो कुछ कहते हैं नहीं.

जब भगवान क़ानून बनाता है तो वो क़ानून उतने ही रहस्यमयी हो जाते हैं जितना ख़ुद भगवान है. जब हम क़ानून बनाते हैं तो वो हम अपने मक़सद के लिए बनाते हैं. हम उनका मतलब अच्छी तरह समझते हैं. ऐसे में केवल एक ही सवाल बचता है- ‘हम कौन हैं?’. किस तरीक़े से लोकतांत्रिक चुनावों में वास्तविक विपक्ष और व्यक्ति के अधिकारों में सामंजस्य बैठाया जा सकता है? मेरे ख़्याल से यह वह अहम सवाल है जिसका पश्चिम जगत सामना कर रहा है.

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