राष्ट्रध्वज: सम्मान बनाम अपमान

  • 28 अगस्त 2013
यूनियन जैक वाला पैरपोश.
Image caption यूनियन जैक वाला पैरपोश

अगर आपको तिरंगा कच्छा बिकता दिखाई दे, अगर लोग पैरों में तिरंगी चप्पल पहने घूम रहे हों, या टॉयलेट की सीट पर तिरंगा बना हो तो आपको कैसे लगेगा?

ये सवाल सुनते ही आपको ग़ुस्सा आने लगा होगा, आप मुझसे कहेंगे कि ऐसा बेहूदा ख़याल भी कहाँ से आया?

राष्ट्रीय ध्वज सम्मान करने की चीज़ है, इस तरह तो उसका अपमान ही होगा. मगर पश्चिमी दुनिया के ज़्यादातर देशों के लोग ऐसा नहीं मानते.

यहाँ लंदन में यूनियन जैक वाली चड्डियाँ, ऐशट्रे, डोरमैट, टॉयलेट सीट और यहाँ तक कि कंडोम भी मिलते हैं, इन प्रोडक्टस को लेकर कहीं कोई शोर-हंगामा सुनाई नहीं देता.

यह बात सिर्फ़ ब्रिटेन तक सीमित नहीं है, आयरलैंड से लेकर कनाडा तक ऐसा ही है, जहाँ राष्ट्रीय चिन्ह के इस्तेमाल का मतलब है कि देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत लोग उन प्रोडक्ट्स को ख़रीदेंगे.

अमरीका के लोगों की देशभक्ति की मिसालें भारत में अक्सर दी जाती हैं, वहाँ भी राष्ट्रीय झंडे वाले जूते, चप्पल और टायलेट सीट बिना किसी रोक-टोक के बिकते हैं.

भारत से अक्सर ऐसी ख़बरें पढ़ने-सुनने को मिलती हैं कि फलाँ ने राष्ट्रीय झंडे का अपमान कर दिया. किसी ने तिरंगा केक काट डाला तो हंगामा, किसी के पैरों के पास झंडा पड़ा था लेकिन उसने ध्यान नहीं दी तो कोहराम, कहाँ झंडा ठीक से नहीं फ़हराया गया तो बवाल.

इसका ये मतलब नहीं है कि कोई कम देशभक्त है या भारत के लोग ज़्यादा देशभक्त हैं.

राष्ट्रीय झंडे के साथ पश्चिमी देशों के लोगों की भावनाएँ नहीं जुड़ी हैं, ऐसा सोचना ग़लत होगा, टॉयलेट सीट तक ज़्यादातर लोग बुरा नहीं मानते, लेकिन शायद टॉयलेट टिश्यू पर उन्हें एतराज़ होगा.

पूजा की परंपरा

Image caption आयरलैंड के राष्ट्रीय झंडे वाले जूते.

भारत में तिरंगा झंडा राष्ट्रीय पहचान से कहीं ज़्यादा, आदर की भावना से जुड़ा है. शायद इसकी जड़ें हमारी संस्कृति में हैं जहाँ सम्मान और पूजा करने में कोई विशेष अंतर नहीं है.

भारत में जानवर, नदी और पेड़ पूजे जाते हैं, भारत माता पूजी जाती हैं, फिर उनका झंडा कैसे पूजनीय नहीं होगा? हम में से ज़्यादातर लोग अपने पिताजी को चिट्ठी में 'पूजनीय' ही लिखते हैं.

जेनरलाइजेशन का ख़तरा उठाते हुए कहना ही होगा कि भारतीय स्वभाव से भावुक हैं, यह सिनेमा में, टीवी में, बातचीत में, व्यवहार में हर उस व्यक्ति को दिखेगा जिसने भारत से बाहर कुछ समय बिताया है.

भारतीय ये बात कभी नहीं पचा पाएँगे कि उनके कुत्ते का नाम टॉम, पॉल या पीटर हो सकता है और पड़ोसियों का भी, यहाँ लंदन में पड़ोसी मुस्कुराते रहते हैं और कुत्ता दुम हिलाता रहता है, किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

इसका ये मतलब नहीं है कि पश्चिमी देशों के लोग ज़्यादा समझदार हैं या कम सभ्य हैं. भारत में मान-सम्मान, आदर, श्रद्धा और शिष्टता को लेकर अलग तरह के आग्रह हैं जिन्हें अच्छा या बुरा कहने का कोई तुक नहीं.

जो कुछ ख़ासियतें भारत को भारत बनाती हैं उनमें से शायद ये भी है.

मगर भारत की सबसे बड़ी ख़ासियत तो उसकी विडंबनाएँ और विरोधाभास ही हैं जो क़दम-क़दम पर दिखते हैं--देवी की पूजा और कन्या भ्रूण हत्या, 'सत्यमेव जयते' का नारा और भारी भ्रष्टाचार.

यही बात क्या राष्ट्रीय प्रतीकों के मामले में लागू नहीं होती?

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