भारत के बाद अब ब्राज़ील में आरक्षण विवाद

  • 2 सितंबर 2013
ब्राज़ील
एंटोनियो का मानना है कि यूनिवर्सिटी में पढ़ना उनके लिए ज़िंदगी बदलने वाला मौका है

एंटोनियो ओलिवीरा ब्राज़ील के मरान्हाओ में एक ग़रीब परिवार में पैदा हुए थे. स्कूल में पढ़ाई करते हुए उन्हें सब्ज़ियां बेचने भी जाना पड़ता था. साथ ही छोटे-मोटे काम भी करने होते थे.

एंटोनियो का कहना है कि हाल तक उनके शहर में लोगों के सामने सिर्फ सब्ज़ियां उगाने या सिटी हॉल में काम करने के ही विकल्प होते थे.

एंटोनियो अब रियो दि जनेरो की मशहूर फ़ेडरल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रहे हैं. उनके कोर्स का पहला टर्म ख़त्म हो चुका है.

उनका कहना है कि यह गांव के अपने स्कूल में पढ़ते वक्त देखे गए सपने के पूरा होने जैसा है.

एंटोनियो की किस्मत बदली है ब्राज़ील में एक साल पहले अमल में लाए गए एक क़ानून से.

'सुधार की शुरुआत'

इस कानून के तहत ब्राज़ील के संघीय विश्वविद्यालयों में 50 फीसदी सीटें उन छात्रों के लिए आरक्षित कर दी गई हैं, जो अफ्रीकी या मूल निवासी ग़रीब परिवारों से हैं.

एंटोनियो फ्रिता का मानना है कि आरक्षण लागू करने से ब्राज़ील पिछड़ रहा है.

हर राज्य में काले, मिश्रित नस्लीय और मूल निवासी छात्रों के लिए आरक्षित होने वाली सीटें उस राज्य की नस्ली जनसंख्या के आधार पर होंगी.

ब्राज़ील के संघीय और राज्यों के विश्वविद्यालयों में 10 साल पहले सामाजिक सुधारों की शुरुआत हुई.

कोशिश थी ब्राज़ील के पिछड़े तबकों को मुफ़्त उच्च शिक्षा देना और बेहतर नौकरियां उपलब्ध कराना.

ब्राज़ील की आधी जनसंख्या अफ्रीकी मूल की है, लेकिन सरकारी विश्वविद्यालय में ऊंचे वर्ग के छात्र दिखते हैं, जो ज़्यादातर गोरे हैं.

हालांकि इन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई मुफ़्त है, लेकिन पारंपरिक रूप से यहां पढ़ने वाले छात्र महंगे निजी स्कूलों में पढ़कर यहां पहुंचे हैं.

अब ब्राज़ील के सभी 59 विश्वविद्यालयों में ‘कोटा’ ज़रूरी हो गया है. इन विश्वविद्यालयों को 2016 तक आधी सीटें आरक्षण के ज़रिए भरनी हैं.

विवादास्पद मुद्दा

एंटोनियो कहते हैं, “मुझे उम्मीद है कि मुझे अच्छी नौकरी मिल जाएगी.” लेकिन नस्लीय आरक्षण से ब्राज़ील में बड़ा विवाद छिड़ गया है.

नस्लीय आरक्षण का विरोध करने वाले कहते हैं कि उच्च शिक्षा को आसान बनाने से योग्यता को नकारा जाएगा और योग्यता से ही विश्वविद्यालय श्रेष्ठ बनते हैं.

आईबीएम का कहना है कि वो ब्राज़ील में काले और नस्लीय उम्मीदवारों को बढ़ावा दे रही है.

निजी विश्वविद्यालय गेतुलियो वर्गा फाउंडेशन के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एंटोनिया फ्रिता कहते हैं, “ये ब्राज़ील के भविष्य के लिए बुरा है क्योंकि विश्वविद्यालयों का मुख्य उद्देश्य शोध है, गुणवत्ता हासिल करना है.”

एंटोनिया फ्रिता का मानना है, “ब्राज़ील कृत्रिम रूप से समस्या सुलझा रहा है. अच्छी बुनियादी शिक्षा देने के बजाय सरकार छात्रों को बगैर किसी तैयारी के यूनिवर्सिटी में धकेल रही है.”

आरक्षण का विरोध करने वाले यह भी कहते हैं कि इससे समाज में विभाजन पैदा हो रहा है.

दासता की विरासत

भारत में शैक्षणिक संस्थानों में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिशन ने आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए मदद देने की घोषणा की थी. इसके अलावा छात्रों और टीचिंग और नॉन टीचिंग स्टाफ़ को आरक्षण देने की योजना बनाई गई थी.

इसी तरह ब्राज़ील में आरक्षण की शुरुआत सबसे पहले रियो दि जनेरो स्टेट यूनिवर्सिटी में हुई थी.

आरक्षण के 10 साल बीतने के बाद यूनिवर्सिटी के रेक्टर रिकार्डो विराल्वेज़ कहते हैं कि कोटा कार्यक्रम काफ़ी सफल रहा है.

विराल्वेज़ कहते हैं, “जो छात्र आरक्षण के तहत आते हैं, शुरुआत में उनका ग्रेड कम होता है, लेकिन कुछ समय बाद वो सब के बराबर आ जाते हैं और अंत तक कुछ छात्र आगे निकल जाते हैं.”

विराल्वेज़ का कहना है, “ब्राज़ील दासता के ख़ात्मे के लिए तैयार नहीं था, लेकिन इसने ब्राज़ील के अफ्रीकी मूल के लोगों की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया और समाज में गहरी नस्लीय असमानता छोड़ी.”

ब्राज़ील में चमड़ी के गहरे रंग और ग़रीबी के बीच अक्सर संयोग दिखता है. काले और मिश्रित नस्ल के लोगों की आमदनी गोरे ब्राज़ीली लोगों से औसतन आधे से ज़्यादा ही होती है.

कम पढ़ाई की वजह से अफ्रीकी मूल के ब्राज़ीली बुनियादी नौकरी ही जुटा पाते हैं.

उम्मीद से आगे

रियो दि जनेरो स्टेट यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञानी जोआओ फेरेस जूनियर कहते हैं, “इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ब्राज़ील में अब भी नस्लीय भेदभाव है.”

उनका कहना है, “आप ऐसे समाज में पलते-बढ़ते हैं जहां कोई भी काला व्यक्ति ऊंचे पद पर नहीं होता इसलिए आप काले लोगों को छोटे, कम वेतन वाले पदों से जोड़कर देखते हैं.”

ब्राज़ील के विश्वविद्यालयों में अब अंतर को पाटने की कोशिश हो रही है, लेकिन ब्राज़ील में 30 फीसदी से भी कम नियोक्ता काले या मिश्रित नस्ल के हैं. हालांकि कुछ कंपनियां इसे बदलने की कोशिश कर रही हैं. आईबीएम इनमें से ही एक है.

आईबीएम के मानव संसाधन प्रबंधन अधिकारी वार्ले कोस्टा कहते हैं कि जब कंपनी नौकरियों का ऐलान करती है तो बहुत कम तादाद में अफ्रीकी मूल के लोग आवेदन देते हैं.

आईबीएम ब्राज़ील में काले लोगों से जुड़े विश्वविद्यालयों और संस्थानों से संपर्क साधकर अच्छे उम्मीदवारों को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है.

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