क्या था 'एलिफेंट मैन' का राज़?

  • 3 सितंबर 2013
एलिफेंट मैन

वो शख़्स जिनका मज़ाक भी उड़ाया गया और जिनका अध्ययन भी किया गया, उनकी मौत के 123 साल बाद वैज्ञानिकों का मानना है कि उनकी हड्डियों में एक बीमारी का राज़ छिपा है.

'एलिफैंट मैन' के नाम से मशहूर जोसेफ मेरिक के सिर का आकार बिगड़ा हुआ था. मेरिक के शरीर में ये असामान्य परिवर्तन काफी कम उम्र से आ गया था.

उस ज़माने में कई डॉक्टरों ने उनका परीक्षण किया. लेकिन उनके बिगड़े हुए सिर, मुड़ी हुई रीढ़ की हड्डी, ‘ढेलेदार’ त्वचा और काफी बढ़े हुए दाएं हाथ की असल वजह का पता नहीं चल सका.

वैज्ञानिकों का मानना है कि मेरिक की हड्डियों की डीएनए जांच कर ये पता किया जा सकता है कि उन्हें क्या बीमारी थी और क्यों थी.

Image caption मेरिक के कंकाल को रॉयल लंदन हॉस्पिटल के एक छोटे से म्यूज़ियम में रखा गया है.

लेकिन समस्या ये है कि जिस तरीके से मेरिक की हड्डियों को रखा गया था उससे उनकी हड्डियों से डीएनए का नमूना लेने में दिक्कत आ रही है.

लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी के स्वास्थ्य विभाग के वाइस प्रिंसिपल रिचर्ड ट्रेमबाथ कहते हैं, “परीक्षण की प्रक्रिया के दौरान कई बार उनकी हड्डियों के ढांचे को ब्लीच किया गया. ब्लीच डीएनए के लिए अच्छा रसायन नहीं है. इससे डीएनए की पर्याप्त मात्रा का नमूना लेने में दिक्कत हो रही है.”

'कौन सी बीमारी थी?'

हालांकि उम्मीद यही है कि डीएनए का नमूना लिया जा सकेगा जिससे पता चल सकेगा कि मेरिक किस बीमारी से पीड़ित थे.

क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी और नैचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम के वैज्ञानिकों की एक टीम मेरिक की हड्डियों जितनी पुरानी हड्डियों से ही डीएनए नमूने लेने की कोशिश कर रही है.

उनकी कोशिश है कि मेरिक की हड्डियों पर काम करने से पहले वे पुरानी हड्डियों से डीएनए नमूने लें ताकि मेरिक की हड्डियों को कोई संभावित नुकसान न हो.

प्रयोगशालाओं में कई बार ब्लीच का इस्तेमाल डीएनए को हटाने में किया जाता है इसलिए ये मेरिक की हड्डियों के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुआ है.

हालांकि इस बारे में कई सिद्धांत दिए गए हैं कि मेरिक को क्या बीमारी थी.

Image caption माइकल सिंपसन अब मेरिक की हड्डियों जितनी पुरानी हड्डी पर परीक्षण कर रहे हैं.

कई वर्षों तक माना गया कि उन्हें न्यूरोफाइब्रोमैटोसिस टाइप वन है लेकिन हाल के सालों में डॉक्टरों ने माना है कि उन्हें या तो प्रोटियस सिंड्रोम था या प्रोटियस सिंड्रोम और न्यूरोफाइब्रोमैटोसिस टाइप वन, दोनों ही बीमारियां थीं.

न्यूरोफाइब्रोमैटोसिस टाइप वन में तंत्रिका तंत्र के आसपास ट्यूमर बढ़ जाता है.

वहीं प्रोटियस सिंड्रोम में ट्यूमर के साथ-साथ हड्डियां बढ़ जाती हैं. इसका नाम ग्रीक देवता प्रोटियस के नाम पर रखा गया जो आकार बदल सकते थे.

ट्रेमबाथ कहते हैं, “जब मां के गर्भ में मेरिक का शरीर बन रहा था, संभावना है कि तब कोई आनुवांशिक परिवर्तन हुआ, संभव है कि ऐसे समय कई कोशिकाएं बन चुकी थीं और उनमें से कुछ कोशिकाओं ने ये समस्या पैदा की.”

मेरिक के कंकाल को रॉयल लंदन हॉस्पिटल के एक छोटे से म्यूज़ियम में रखा गया है. सामान्य तौर पर इसे जनता के सामने नहीं लाया जाता.

इसी अस्पताल में मेरिक ने अपने आखिरी दिन अपने मित्र और डॉक्टर फ्रेडरिक ट्रेवेस की देखरेख में बिताए थे. यहीं 27 साल की उम्र में उनकी साल 1890 में मौत हो गई थी.

डीएनए में गड़बड़ी

ट्रेवेस का मानना था कि मेरिक की मौत सोते हुए गर्दन की हड्डी खिसकने से हुई क्योंकि उनके सिर का वज़न काफी ज़्यादा था.

मेरिक की हड्डियों से डीएनए निकालने की कोशिश कर रही आनुवांशिक वैज्ञानिकों की टीम लंदन के किंग्स कॉलेज के डॉक्टर माइकल सिंपसन की अगुवाई में काम कर रही है.

इस टीम को मेरिकी की हड्डी जितनी पुरानी हड्डी से कुछ डीएनए हासिल करने में कामयाबी मिली है लेकिन पूरा आनुवांशिक क्रम हासिल करने की कोशिश अब भी जारी है.

पूरा आनुवांशिक क्रम मिलने पर ही पता चल सकता है कि मेरिक के डीएनए में कहां गड़बड़ी हुई.

सिंपसन का मानना है कि मेरिक की हड्डियों पर मोम भी लगाया गया था जिससे भी डीएनए पर असर पड़ा.

जब मेरिक की हड्डियों पर काम शुरू होगा तब सिंपसन की टीम की कोशिश होगी क्षतिग्रस्त हड्डी के डीएनए और सामान्य हड्डी के डीएनए की तुलना करने की.

सिंपसन की टीम मेरिक की खोपड़ी और उनके दांत से डीएनए सैंपल लेने की कोशिश करेगी.

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