वह 'नाज़ी कार' जिससे हम प्यार कर बैठे

जर्मनी

हिटलर की छवि भले ही एक तानाशाह की रही हो, मगर उनकी शख्सियत का दूसरा पहलू जो रचनात्मक कार्यों से जुड़ा है, उस पर शायद ही कभी चर्चा हुई.

हिटलर ने 70 साल पहले एक ऐसी कार की कल्पना की थी जो बाद में काफ़ी मशहूर हुई. वह कार थी, फ़ॉक्सवैगन बीटल. जोनाथन ग्लेंसी बताते हैं उस सदाबहार वोक्सवैगन बीटल की दास्तां.

साल 1945 में एक दुर्लभ और आधी बनी कार बमबारी में नष्ट हो चुके जर्मनी के अपने कारख़ाने से इंग्लैंड भेजी गई.

वहां जानी-मानी ब्रितानी कार निर्माता कंपनियों ने कहा कि यह कार दिखने में 'एकदम बेकार और शोर करने वाली' है. यह भी कहा गया कि इसे बनाना पूरी तरह से घाटे का सौदा साबित होगा.

वह कार बीटल थी. इसी बीटल के बारे में साल 1962 में डेक्का मुखिया ने कहा कि शो बिज़नेस में बीटल का कोई भविष्य नहीं है.

सबसे अधिक बिकने वाली कार

मगर इतिहास गवाह है कि बीटल ने अपने बारे में की गई सारी नकारात्मक भविष्यवाणी को झूठा साबित कर दिया.

ऑस्ट्रेलिया के डिज़ाइनर इरविन की ख़ूबसूरत शैली और फ़र्डिनेंड पोर्श के इंजीनियरिंग के नए अंदाज़ में ढली फ़ॉक्सवैगन बीटल अब तक की सबसे अधिक बिकने वाली कार बन गई है.

बीटल ने हेनरी फ़ोर्ड के मॉडल-टी को उत्पादन के मामले में तब पीछे छोड़ दिया जब साल 1972 में वूल्फ्सबर्ग की सड़कों पर 15,007,034वीं बीटल उतारी गई.

साल 2003 में मेक्सिको में आख़िरी बीटल बनी. इस समय तक दुनिया भर में दो करोड़ 15 लाख बीटल गाड़ियां थीं.

जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, फ़ॉक्सवैगन 'आम आदमी की कार' साबित हुई.

हालांकि, साल 1945 और 2003 के बीच बीटल कार में कई परिवर्तन किए गए, मगर पहली और अंतिम बीटल सबसे ख़ास रही.

बेहतरीन और किफ़ायती सवारी

बीटल न केवल बिक्री के लिहाज़ से लाजवाब सवारी रही बल्कि हिटलर के ख्वाबों की यह सवारी कैलिफ़ोर्निया के युवा वर्ग के बीच भी उतनी ही हिट हुई जितनी नाज़ियों ने कल्पना की थी.

बताया जाता है कि हिटलर को एक ऐसे कार की ज़रूरत थी जो पांच लोगों के परिवार को सौ किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ले जाए.

उन्होंने साल 1935 में इंजीनियर फर्डिनैंड पोर्श को ऐसी कार बनाने का हुक्म दिया. इस कार को एक जर्मन परिवार के बजट के हिसाब से बनाया जाना था.

मगर इससे पहले कि यह कार एक नाज़ी परिवार का हिस्सा बनती, विश्व युद्ध छिड़ गया.

'आम आदमी की कार'

हिटलर के बीटल कार के आइडिया को चुनौती दी विरोधी इंजीनियर कैंप ने. यह चेक की कार कंपनी, टेट्रा थी.

टेट्रा ने दावा किया कि पोर्श ने एक यहूदी इंजीनियर की डिज़ाइन चुराई है. टेट्रा ने इसके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई भी की, मगर कहा जाता है कि हिटलर ने आस्ट्रिया पर आक्रमण कर उसके कारख़ाने पर क़ब्ज़ा कर लिया.

फिर 1961 में फ़ॉक्सवैगन ने टेट्रा के साथ अदालत के बाहर कुछ पैसे का लेन-देन कर मामला सुलझा लिया. उसके बाद फ़ॉक्सवैगन ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी.

1945 में कारख़ाना और कार को ब्रितानी सेना के अफ़सर और इंजीनियर इवान हर्स्ट ने बचाया.

जर्मन कलाकारी का अनूठा नमूना

1959 में शुरु हुए 'छोटा अच्छा है' अभियान के तहत बीटल अमरीका को बेच दी गई. न्यूयार्क की एजेंसी डोयले डेन बर्नबक की कोशिशों से बीटल अमरीका में साठ के दशक की विदेश में बनी सबसे ज्यादा बिकने वाली कार बन गई.

इसके कई रुप सामने आए. स्पोर्ट्स कार स्वेल्ट, फ़ॉक्सवैगन करमन घिया, फ़ैशनेबल कैमपर वैन और न्यू बीटल वग़ैरह.

सस्ती, किफ़ायती, उपयोगी, आसान देखभाल और ख़ास अंदाज़ जैसी ख़ूबियों ने बीटल को दुनिया भर में शोहरत दिलाई. इसका निर्माण ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया और मेक्सिको में भी हो रहा है.

आज दुनिया भर में भले मंदी का माहौल है, मगर फिर भी लोगों के पास बहुत पैसे हैं. वे फ़ॉक्सवैगन की बेंटले कारों को भी ख़रीद सकते हैं.

बेंटले भव्य है, आकर्षक है. मगर यह बीटल जिसे 'आम आदमी की कार' कहते हैं, की बराबरी नहीं कर सकती.

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