चीनी मीडिया ने 'इंस्ताबुल को' दे दी थी ओलंपिक की मेजबानी

टोक्यो का याशुकूनी स्मारक

टोकियो को 2020 के ओलंपिक खेलों की मेज़बानी मिलने पर चीन और हांगकांग के मीडिया को द्वितीय विश्व युद्ध की छाया नज़र आ रही है.

उधर सोशल मीडिया पर लोगों ने चीन के सरकारी मीडिया की इसलिए हंसी उड़ाई क्योंकि उसने ग़लती से ख़बर दे दी थी कि ओलंपिक की मेज़बानी इस्तांबुल को मिल गई है.

द्वितीय विश्व युद्ध में चीन पर जापान के आक्रमण और अब तक अनसुलझे सीमा विवाद की वजह से कुछ मीडिया संस्थानों ने जापान को पश्चाताप करने की याद दिलाई है.

जापान की ज़िद

सरकार नियंत्रित ग्लोबल टाइम्स का कहना है, "द्वितीय विश्व युद्ध पर जापान की समझ और इतिहास पर उसकी झलक अंतरराष्ट्रीय मानकों पर बहुत ख़राब है. अगर जापान याशुकूनी नाम के स्मारक के मामले को अगले कुछ साल तक बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार करता रहता है तो द्वितीय विश्वयुद्ध के इतिहास को लेकर जापान की जिद और दर्प पर दुनिया के लोगों का ध्यान खींचने में चीन और दक्षिण कोरिया कामयाब हो सकते हैं."

द्वितीय विश्वयुद्ध और अन्य संघर्षों में मारे गए 25 लाख लोगों की याद में टोकियो में याशुकूनी स्मारक बनाया गया था. इन लोगों में वे 14 सैन्य अधिकारी भी शामिल थे जो द्वितीय विश्वयुद्ध के क्लास-ए के अपराधी थे.

हांगकांक के अख़बार 'सिंग ताओ डेली' ने लिखा है, ''अभी तो इस बात को लेकर ही आशंका है कि टोकियो ओलंपिक के सुरक्षित है या नहीं. फिर सैन्यवाद के फिर से उभरने का भी ख़तरा है. कुछ लोगों ने 2020 के टोकियो ओलंपिक की नाज़ी सरकार के दौर में हुए 1936 के बर्लिन ओलंपिक जैसा होने की भी आशंका जताई है. जापान को सावधानी से यह चुनना चाहिए कि वह किस रास्ते पर जाना चाहता है.''

चीन के प्रमुख सरकारी मीडिया चाइना सेंट्रल टेलीविजन (सीसीटीवी) और शिन्हुआ न्यूज एजेंसी ने रविवार सुबह ख़बर दी कि टोकियो ओलंपिक मेज़बानी की दौड़ से बाहर हो गया है. इसकी काफी आलोचना हुई. चीन के सरकारी टीवी सीसीटीवी के स्पोर्ट्स चैनल ने अंतिम फैसला आने से पहले ही ख़बर दे दी थी कि 'टोकियो को बाहर कर दिया गया है.' हालांकि तुरंत ही इसे सुधार लिया गया था.

सीसीटीवी ने बाद में विस्तार में इसे समझाते हुए कहा,''हो सकता है कि मतदान के नियमों में बदलाव हुआ हो. हालांकि ग़लती हुई है. उसके लिए माफ़ी दरकार है.''

शिन्हुआ ने भी फैसला होने से पहले एक फ्लैश चलाया. लेकिन बाद में जारी की गई सुधरी हुई कॉपी में टोकियो की जीत की जानकारी दी गई. हालांकि इस समाचार एजेंसी ने इसको लेकर कोई सफाई नहीं दी.

एजेंसियों की ग़लती

हुन्नान प्रांत में 'हुन्नान डेली' समेत दो प्रमुख अख़बारों को शिन्हुआ की इस ग़लती की वजह से अपनी हज़ारों कॉपियां वापस लेनी पड़ीं.

शिन्हुआ की इस ग़लती की वजह से अख़बारों को देशभर में नुक़सान उठाना पड़ा. 'दि चांग्शा इवनिंग न्यूज' को अपने अख़बार की हज़ारों कॉपियों को वापस लेकर उन्हें दोबारा छपवाना पड़ा. इससे उसे भारी घाटा हुआ.

माइक्रोब्लॉग सर्विस सिना द्वारा अख़बार के उप मुख्य संपादक के रूप में पहचाने गए एक व्यक्ति ने शिकायत की, "समाचार प्रदाता होने के चलते शिन्हुआ को अपने ग्राहकों को इस पर सफाई देनी चाहिए.''

हांगकांग के 'साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट' ने कहा है कि यह शिकायत बाद में ब्लॉग से हटा ली गई और जब अखबार के प्रधान संपादक को टेलीफ़ोन किया गया, तो वहाँ से कोई जवाब नहीं मिला.

हालांकि इस ग़लती को तत्काल सुधार दिया गया. लेकिन इसने चीन में इंटरनेट का प्रयोग करने वालों को परेशान कर दिया, क्योंकि इसी तरह की ग़लती करने या ग़लत सूचना देने पर हाल के दिनों में लोगों को हिरासत में ले लिया गया या जेल में डाल दिया गया.

इंटरनेट पर अभियान

इसको लेकर चलाए गए ऑनलाइन अभियानों में प्रभावशाली माइक्रोब्लॉगरों ने इस बात पर चिंता जताई कि अधिकारी ऑनलाइन अफवाहों का प्रयोग छल-कपट करने और असहमति और

उदारवादियों को निशाना बनाने के लिए कर रहे हैं.

हांगकांग के अख़बार 'ऐपल डेली' से एक इंटरनेट उपयोगकर्ता ने कहा, ''इंटरनेट के इन अभियानों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होनी चाहिए? जन सुरक्षा मंत्रालय अभी तक कार्रवाई करने के लिए आगे क्यों नहीं आया है?

एक अन्य इंटरनेट उपयोगकर्ता ने कहा, ''यह अफवाहों से सौ गुना अधिक नुक़सानदायक है.''

अन्य ख़बरों में, हिरासत में लिए गए व्यवसायी डिंग सुमिओ और उनके परिवार पर हाई स्पीड रेलवे के ठेकेदारों से अवैध रूप से जेल में बंद पूर्व रेल मंत्री लियु यों के ज़रिये 178.8 अरब युआन का फ़ायदा लेने का आरोप लगाया गया है.

'दि बीजिंग टाइम्स' और 'दि बीजिंग न्यूज' दोनों ने ख़बर दी है कि किस तरह 58 साल के डिंग उत्तरी शिनाई प्रांत में एक अंडा विक्रेता के रूप में उभरे और हाई स्पीड रेल परियोजना में ठेके हासिल करने के लिए किस तरह से लियु को कथित तौर पर अरबों युआन की घूस दी.

वहीं अंत में 'चाइना डेली' ने खबर दी है, ''दक्षिणी गुआंगडोंग प्रांत की राजधानी गुआंगझू के विवादास्पद लेबर सुधार गृहों को इस साल के अंत तक बंद कर इसके बंदियों को रिहा कर दिया जाएगा.''

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