'ईरान-अमरीका संबंधों के रास्ते में कई रोड़े'

  • 16 सितंबर 2013
ईरान, अमरीका, हसन रूहानी, बराक ओबामा

जब ईरान के मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी का चुनाव अभियान शुरू हुआ था, तो वह पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद की परमाणु नीति के ख़िलाफ थे और उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान दो बातों का वादा किया था.

एक तो यह कि वह अमरीका के साथ रिश्ते ठीक करेंगे और दूसरी बात अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ऐसे रिश्ते रखेंगे ताकि आर्थिक पाबंदियां खत्म हों. हालांकि वह भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम के हक़ में थे क्योंकि ईरान में लोग इसे राष्ट्रीय गौरव की तरह देखते हैं.

पिछले दो-तीन हफ़्तों में कुछ चीजें हुईं. एक तो ओबामा के साथ ख़तों की अदला-बदली हुई है. दूसरे, सीरिया मुद्दे पर पहली बार ईरान और सीरिया के बीच सीधे बातचीत हुई है, जो पहले कई महीनों से नहीं हुई थी. आपको याद होगा कि जब अफ़ग़ानिस्तान में सरकार बनी थी तो अमरीका और ईरान में सीधी बातचीत हुई थी.

इन वजहों को देखते हुए राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि शायद ईरान और अमरीका की यह बातचीत आगे बढ़ेगी और अब तक ईरान की परमाणु नीति पर जो गतिरोध है उसमें भी बदलाव होगा.

यूरेनियम क्यों?

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की शिकायत रही है कि ईरान परमाणु अप्रसार संधि का हस्ताक्षरकर्ता है. इसके बावजूद परमाणु नीति को लेकर उसका रवैया साफ़ नहीं है. उनका सवाल है कि ईरान यूरेनियम क्यों चाहता है और क्या कर रहा है. तो यह पारदर्शिता का मसला है.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय का कहना है कि ईरान को यूरेनियम एनरिचमेंट की क्षमता की ज़रूरत नहीं है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसे शांतिपूर्ण प्रोजेक्ट्स के लिए यूरेनियम दे सकता है. जैसे चिकित्सा या ऊर्जा पैदा करने के लिए 25-30 फ़ीसदी तक शुद्ध यूरेनियम से भी काम चल जाता है.

रूस, अमरीका और यूरोप के देश ऐसा यूरेनियम ईरान को देने को तैयार हैं, लेकिन बातचीत आगे बढ़ाने के लिए इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी या पश्चिमी देशों को जिस पारदर्शिता की दरकार है, उसके लिए ईरान तैयार नहीं है. ईरान की परमाणु सुविधाओं की रणनीतिक स्थिति पहाड़ों के नीचे, सुरंगों और जमीन के भीतर हैं.

बराक ओबामा को ईरान के राष्ट्रपति का ख़त मिला है. इससे अमरीका-ईरान के संबंधों में सुधार की संभावना पैदा हुई है.

ज़ाहिर है कि उसके मकसद उतने शांतिपूर्ण नहीं हैं, जितना वो दावे करता है. पश्चिमी देश चाहते हैं कि ईरान अपने परमाणु ठिकानों को अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के लिए खोले. अगर वह तैयार होता है, तो उस पर लगी आर्थिक पाबंदियां भी कम हो सकती हैं.

ओमान बनेगा पुल?

पिछले महीने ओमान के शासक सुल्तान ख़बूस अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा का खत लेकर हसन रोहानी से मिले थे. ओमान ने ख़ुद इसकी पहल की थी और ओमान अमरीका और ईरान के बीच बातचीत के लिए पुल का काम कर सकता है.

आगामी 24 सितंबर को न्यूयॉर्क में होने वाली संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक के दौरान अमरीका और ईरान के कूटनीतिज्ञों की मुलाकात भी मुमकिन है जिसमें सीरिया और परमाणु नीति को लेकर बातचीत हो सकती है.

हालांकि हमें याद रखना चाहिए कि ईरान के राजनीतिक ढांचे के तहत उसकी विदेश, सुरक्षा और परमाणु नीति राष्ट्रपति के हाथ नहीं बल्कि वहां के सुप्रीम लीडर अली खोमैनी के हाथ में है, जो अमरीका के ख़िलाफ़ रहे हैं और आज भी हैं.

हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस हफ़्ते एक दिलचस्प बात कही है. उनका कहना था कि जब इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान का इस्तेमाल किया तो ईरान ख़ुद रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का निशाना बन गया था. सीरिया के रासायनिक हथियारों को लेकर ईरान के लोगों की राय ख़िलाफ़ रही है.

इसलिए ईरान ने भी सीरिया पर दबाव डाला था कि वो रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल न करे. यह बात अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को पता नहीं थी कि वह खुद सीरिया पर दबाव बना रहा था. ईरान की इस सकारात्मक भूमिका को दुनिया भर के सामने अमरीका ने मान्यता दी. यह ईरान के लिए बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है.

ओबामा दृढ़ नहीं

वहीं अगर आप ओबामा की सीरिया नीति को देखें तो जब से ब्रिटिश संसद ने न कहा, तभी से ओबामा अपने वादे से दूर हटते हुए दिखाई देने लगे और जब रूस ने उन्हें लाइफलाइन दी तो उन्होंने उसे कुबूल कर लिया. अगर आप बारीक़ी से देखें तो अगली गर्मियों तक भी सीरिया अपने हथियार नहीं सौंपेगा और अभी तक कोई सकारात्मक अंतरराष्ट्रीय फ्रेमवर्क मौजूद नहीं है, कि सीरिया को इस मामले में मनाया जा सके.

साफ़ ज़ाहिर है कि अमरीका सीरिया को लेकर अपनी प्रतिबद्धता पर इतना मज़बूत नहीं है. अमरीका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी एक रेखा खींची थी. अब इसराइल और इसराइली समर्थक भी पूछने लगे हैं कि जब सीरिया और असद अमरीका से बच सकते हैं तो क्या ईरान भी अमरीका की खींची हुई रेखा पार कर जाएगा.

मुझे लगता है कि सीरिया कूटनीति के साथ ओबामा ने ईरान पर भी कूटनीतिक दबाव इसलिए शुरू किया है. वो बताना चाहते हैं कि ईरान ने जो लाल रेखा पार की थी, वह असल में सीरिया की तरह ही है.

राष्ट्रपति पद कमज़ोर

जब उदारवादी मोहम्मद ख़ातमी 1997 में ईरान के राष्ट्रपति बने थे तो उन्होंने तब अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को ख़त लिखा था और संयुक्त राष्ट्र में ‘संस्कृतियों के बीच संवाद’ की पहल की थी. उनका मक़सद अमरीका के साथ न सिर्फ़ परमाणु और सुरक्षा मुद्दों को लेकर बल्कि इस्लाम और पश्चिमी जगत के बीच बातचीत शुरू करना भी था.

तब अमरीका में ईरान विरोधियों और इसरायल समर्थकों ने कहा था कि ईरान के राजनीतिक ढांचे में राष्ट्रपति का कोई रोल नहीं है. अमरीकी राष्ट्रपति को विदेश नीति में काफी अधिकार हासिल हैं और घरेलू मामले कांग्रेस देखती है, जबकि ईरान में राष्ट्रपति का घरेलू मामलों पर ज़्यादा नियंत्रण होता है.

उनकी विदेश, सुरक्षा और परमाणु नीति को सुप्रीम नेता देखते हैं. तब अमरीका में ख़ातमी को गंभीरता से नहीं लिया गया और कहा गया कि उनके पास इन मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाने के लिए अधिकार ही नहीं हैं.

इसराइल का हमेशा से कहना रहा है कि फ़लस्तीन से बड़ा मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है.

मगर जब अहमदीनेजाद राष्ट्रपति बने और उन्होंने इसराइल को दुनिया के नक़्शे से मिटाने की बात कही तब किसी ने नहीं कहा कि ईरानी राष्ट्रपति के पास अपनी विदेश नीति को इस हद तक बदलने का हक़ नहीं है.

इसराइल का पेंच

असल में अमरीका में ईरान विरोधी नज़रिया और ईरान में अमरीका विरोधी लॉबी संबंध सुधरने से रोकती है. उधर, पिछले चार-पांच साल से इसराइली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू भी ईरान का मसला उठाकर फ़लस्तीन पर बातचीत को आगे बढ़ने से रोकते रहे हैं.

उन्होंने हमेशा कहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए फ़लस्तीन बड़ा मसला नहीं बल्कि ईरान का परमाणु प्रोग्राम बड़ा मसला है. उनका कहना रहा है कि इसराइल को आश्वस्त किया जाए कि ईरान ने परमाणु हथियार बनाना बंद कर दिया है.

ऐसे में ईरान फ़लस्तीन मुद्दे के लिए बड़ा रोड़ा बन गया था. इस बीच इसराइल ने वेस्ट बैंक और गाज़ा पट्टी पर कई बस्तियां बसा दी थीं.

हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2008 में राष्ट्रपति बनने के बाद कहा था कि हम ईरान की तरफ़ बंद मुट्ठी नहीं, बल्कि खुला दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं. हो सकता है कि ओबामा अपनी विदेश नीति की विरासत बढ़ाने के लिए ऐसा कर रहे हैं पर अमरीका में ईरान विरोधी खेमा इसे रोकने की पूरी कोशिश करेगा.

(बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली से बातचीत पर आधारित)

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