अमरीका: चिलम और क़ानून में जंग

  • 16 सितंबर 2013
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वाशिंगटन डीसी का डुपॉंट सर्किल इला़का मुझे हमेशा ज़िंदगी से लबालब भरा नज़र आता है- बिल्कुल हॉट और हैपनिंग. एक से एक रेस्तरां, चारों तरफ़ मयख़ाने, किताबों की दुकानें, चुलबुली हसीनाएं और इन सबके बीच एक गोलाकार पार्क. शाम के धुंधलके में इस पार्क से गुज़रें, तो एक अजीब सी ख़ुमारी का अहसास होता है और फिर आपके नथुनों से टकराती है एक तीखी गंध- गांजे के धुएं की.

पार्क में मंडरा रहे होते हैं गांजे की पुड़िया बेचनेवाले-ज़्यादातर काले. नज़रें बचाकर उनसे ये पुड़िया खरीद रहे होते हैं सूट-बूट पहने ऑफ़िस से लौटते लोग, कॉलेज के लड़के-लड़कियां-ज़्यादातर गोरे.

कहते हैं चिलम का धुआं काले-गोरे का फ़र्क नहीं करता. हालांकि अमरीका में इस धुएं ने काले-गोरे के बीच एक ऐसी लकीर खींच रखी है, जो नस्लवाद की गहरी जड़ों में लिपटी हुई है.

अमरीकी संघीय क़ानून के तहत गांजे का सेवन या उसे रखना ग़ैरक़ानूनी है, लेकिन चिलम ने क़ानून की कब सुनी है. गोरे और काले दोनों ही तबकों में इसका इस्तेमाल होता है-गोरों में कालों से कुछ ज़्यादा.

क़ानून हटाने की मांग

गांजे के साथ पकड़े जाने पर जो गिरफ़्तारियां होती हैं उनमें कालों की तादाद गोरों से लगभग पांच गुना ज़्यादा होती है. हर साल पूरे अमरीका में गांजे से जुड़ी लगभग आठ लाख गिरफ़्तारियां होती हैं और इनमें सत्तर प्रतिशत काले होते हैं. पुलिस और अदालत दोनों ही के चश्मे का रंग एक सा नज़र आता है.

एक बार दोषी करार दे दिए गए तो 48 राज्यों में उनका वोट देने का अधिकार छिन जाता है. पहले से ही नदारद नौकरियां और मुश्किल हो जाती हैं. परिवार टूट जाते हैं. ग़ैरक़ानूनी रास्ता एकमात्र रास्ता नज़र आता है.

अमरीका में एक बड़ा तबका अब यह मानता है गांजे पर लगी ग़ैरक़ानूनी मुहर को हटाकर ही इस समस्या का हल निकल सकता है.

कई साल तक चली मुहिम के बाद 20 राज्यों और राजधानी वाशिंगटन डीसी में मेडिकल इस्तेमाल के लिए इसे मंज़ूरी मिल चुकी है यानी डॉक्टर यदि लिख दे तो मरीज़ दवाखानों से गांजा खरीद सकते हैं. यह आमतौर पर एड्स, कैंसर और अन्य जानलेवा रोगों में दर्द से छुटकारे के लिए है.

दो राज्यों, कोलोराडो और वाशिंगटन, में 21 और उससे ऊपर की आयु के लोग इसे आनंद और मज़े के लिए भी खरीद सकते हैं. गांजा समर्थक अब पूरे देश में इस क़ानून को लाना चाहते हैं. उनका कहना है कि गांजा शराब से कम नुकसानदेह है.

नस्लवादी 'चिलम'

दलील है कि शराबबंदी क़ानून से शराब कभी नहीं बंद हुई और अपराध बढ़े. गांजे से प्रतिबंध हट जाए तो इससे जुड़े अपराध खत्म होंगे और इस्तेमाल पहले जैसा ही रहेगा.

जो दलील ज़ोर पकड़ रही है वो है नस्लवाद से जुड़ी. गांजा समर्थक मानते हैं कि ये दलील ज़्यादा सेक्सी है आज के माहौल में.

अटॉर्नी जनरल एरिक होल्डर कह चुके हैं कि चमड़ी का रंग देखकर जो तलाशियां पुलिस लेती है उसके फ़ायदे कम, नुकसान ज़्यादा हो रहे हैं.

पुलिसवाले भी कह रहे हैं कि ये क़ानून ख़त्म हो, तो फिर बड़े अपराधों पर ध्यान दें. सीएनएन के डॉक्टर संजय गुप्ता ने पूरी की पूरी डॉक्यूमेंट्री बना दी है गांजे के दर्दनिवारक गुणों पर.

बराक ओबामा और उनके ठीक पहले के दो राष्ट्रपति- जॉर्ज बुश और बिल क्लिंटन-अपनी जवानी के दिनों में चिलम के कश लगा चुके हैं. गांजे पर लगा स्टिगमा कम हो रहा है.

ऐसे में कहा जाए कि गांजा क़ानून नस्लवाद को बढ़ावा दे रहा है-जो बहुत हद तक ग़लत भी नहीं है-तो शायद उसे ख़त्म करना ज़्यादा आसान होगा. बात में दम है लेकिन अमरीका को यह भी देखना होगा कि कहीं ये आज़ादी उसके नौनिहालों को फिर से दम मारो दम के दिनों में न पहुंचा दे.

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