हाथ में 'मौत' लेकर सोने की तलाश

  • 1 अक्तूबर 2013
इंडोनेशिया, पारा, ज़हरीलापन

फ़हरुल रजी की तबीयत खराब है. इंडोनेशिया के मध्य कालिमंतन के केरेंग पंगी में एक अस्पताल में वो बताते हैं कि उन्हें क्या समस्या है.

"मेरे सिर में दर्द होता है, मैं कमज़ोर हूं. और मेरे मुंह का स्वाद कड़वा रहता है."

फ़हरुल रजी का इलाज कर रहे डॉक्टर स्टेफ़न बोस-ओरिली का कहना है कि फ़हरुल पर पारे का असर हो रहा है.

जर्मनी के डॉक्टर स्टेफन बोस-ओरिली इंडोनेशिया में पारे के असर पर एक दशक से काम कर रहे हैं. वो कहते हैं, "फ़हरुल कई सालों से काम कर रहे हैं और उनमें पारे की विषाक्तता के लक्षण दिख रहे हैं. उनको कंपकंपी होती है और तालमेल की समस्या भी दिख रही है."

हालांकि इंडोनेशिया में छोटी खानों में पारे के इस्तेमाल पर पाबंदी है लेकिन फिर भी यह दस्तूर जारी है.

हालांकि फ़हरुल खदान में काम नहीं करते लेकिन उनकी केरेंग पंगी में सोने की दुकान है.

हर रोज़ खनिक उन्हें मटर के दाने के बराबर का मिश्रण लाकर देते हैं जिसमें सोने के साथ पारा होता है.

'दिमाग़ पर असर'

फ़हरुल इसे जलाते हैं और पारा उड़ जाता है जबकि सोना बाकी रह जाता है. लेकिन इसका धुआं बहुत ज़हरीला होता है.

यही वजह है कि फ़हरुल जैसे धातु पिघलाने वालों को पारे की विषाक्तता की समस्या खदानों में काम करने वालों से ज़्यादा होती है.

बोस-ओरिली कहते हैं, "पारा दिमाग़ के उस हिस्से पर असर डालता है जो आपको सही ढंग से चलने में मदद करता है. पारे का असर गुर्दों पर भी पड़ता है लेकिन दिमाग़ पर ये जो असर डालता है उसे ठीक नहीं किया जा सकता."

फ़हरुल इन लक्षणों के बावजूद संतुष्ट हैं कि उन्हें बड़ा जोखिम नहीं है. और पारे के साथ यही समस्या है, इसका असर एकदम से नहीं होता.

माना जाता है कि 70 देशों में एक से डेढ़ करोड़ लोग सोना निकालने के काम में जुटे हैं, जीवाश्म ईँधन को जलाने के बाद छोटे स्तर पर सोने के खनन का काम पारे के प्रदूषण के पीछे सबसे बड़ी वजह है.

मध्य कालिमंतन में इस अनियमित उद्योग का पर्यावरण पर बहुत बुरा असर पड़ा है. केरेंग पंगी के आसपास खनिकों ने कभी ओरांगउटान और हॉर्नबिल का घर रहा जंगल काट दिया है.

Image caption कई एशियाई देशों में सोने के खनन में पारे का इस्तेमाल होता है.

अब जो जगह दिखती है वो पारे से ज़हरीली हो चुकी है.

वाईटीएस नाम के एक गैरसरकारी संगठन के तकनीकी निदेशक सुमाली अग्रवाल कहते हैं, "करीब 60 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन से जंगल कट गए हैं. आप गूगल अर्थ पर देखेंगे तो आपको हरे इलाके में एक सफ़ेद धब्बा दिखेगा.

50 साल ऐसी ही रहे तब इस ज़मीन पर पौधे उग सकते हैं लेकिन पहले जैसे जंगल कभी नहीं होंगे."

सोने की खोज दुष्कर

केरेंग पंगी के आसपास सोने के बड़े टुकड़े नहीं मिलते, टनों मिट्टी की खुदाई करने पर सिर्फ़ छोटे-छोटे कण मिलते हैं.

खनिक पानी की नालियों का इस्तेमाल कर ऐसी मिट्टी ढूंढते हैं जिसमें सोना ज़्यादा हो. वो इसे बाल्टियों में लेकर नंगे हाथों से पारा मिलाते हैं.

पारा प्रदूषक है और वातावरण में ख़त्म नहीं होता.

इंडोनेशिया के लोमबोक द्वीप पर ये और ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि वहां इसे साइनाइड के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है.

लोमबोक की मातरम यूनिवर्सिटी की डॉक्टर देवी कृष्णयंती कहती हैं, "पारा और साइनाइड मिलकर पर्यावरण के लिए दोगुना समस्या खड़ी कर रहे हैं."

साइनाइड पारे के विघटन में मदद करता है और जब कचरे को धान के खेतों में बिखेरा जाता है तो ये वातावरण में मौजूद कार्बन के कणों से मिलकर मेथिल मर्करी बनाता है. ये और ख़तरनाक है.

इन्हीं विधियों का इस्तेमाल दूसरे एशियाई देशों में भी सोना पाने में किया जाता है. और इन देशों में चावल भी खाया जाता है. अगर धान के खेतों का प्रदूषण और बढ़ा हुआ पाया गया तो इसके विनाशकारी परिणाम होंगे.

धीमा ज़हर

इंडोनेशिया की सहायक उप पर्यावरण मंत्री हलिमा सैयाफ़रुल का कहना है कि पारे के गैरकानूनी आयात पर सख्ती बरती जा रही है. और उम्मीद है कि संयुक्त राष्ट्र में पारे पर संधि - जिसे मिनामाता कन्वेंशन के तौर पर जाना जाता है - से इंडोनेशिया के खनिकों को पारे का विकल्प ढूंढने में अंतरराष्ट्रीय मदद मिलेगी.

हलिमा कहती हैं, "वातावरण में प्रदूषण है, नदियों में प्रदूषण है, पहाड़ों और जंगलों को नष्ट किया जा रहा है. इंडोनेशिया के सभी 34 प्रांतों में यही समस्या है."

इंडोनेशिया विश्वविद्यालय में लोक स्वास्थ्य के प्रोफेसर डॉक्टर रचमादी पुर्वाना चिंतित हैं.

"खतरा है और हर रोज़ बढ़ रहा है. हमें याद रखना होगा कि जापान में मिनामाता नाम की छोटी सी जगह ने मिनामाता बीमारी सामने लाकर पूरी दुनिया को हिला दिया था. इंडोनेशिया में ये सिर्फ़ एक गांव में नहीं है पूरे देश में है. हर प्रांत में सोने का खनन हो रहा है."

और अगर कोई कार्रवाई न हुई तो रचमादी को किस चीज़ का डर है?

वो जवाब देते हैं, "एक राष्ट्रीय आपदा."

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