क्यों चरमपंथियों के निशाने पर हैं पाकिस्तान के ईसाई?

पाकिस्तान, ईसाई

अब तक पाकिस्तान में तालिबान चरमपंथी मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदायों जैसे शिया मुसलमानों और अहमदी समुदाय को ही निशाना बनाते रहे हैं लेकिन ईसाइयों के ख़िलाफ़ भी हमले होते रहे हैं.

इनमें से कुछ हमलों का संबंध पाकिस्तान के विवादास्पद ईश निंदा क़ानून से है और कुछ के पीछे राजनीतिक मकसद नज़र आता है.

बीते कुछ सालों में दो बड़े ईसाई नेताओं की हत्या से भी इन अल्पसंख्यकों की गंभीर हालत पर नज़र जाती है.

हिंदुओं के बाद ईसाई पाकिस्तान में दूसरे सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह हैं. उनकी जनसंख्या करीब 1.6% है.

ईसाइयों की ज़्यादातर जनसंख्या कराची में है और इसके अलावा पंजाब में कई ईसाई गांव हैं. उत्तर पश्चिमी प्रांत ख़ैबर पख्तूनख्वाह में, एक नेता के अनुसार, दो लाख ईसाई हैं जिनमें से 70 हज़ार पेशावर में रहते हैं.

पाकिस्तान के ईसाइयों में से ज़्यादातर ब्रितानी राज के दौरान हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई बने थे. इनमें से ज़्यादातर निचली जाति के हिंदू थे.

कमज़ोर हालत

Image caption पाकिस्तान में ईसाइयों पर हमले होते रहे हैं.

ब्रितानी राज में इनमें से कई ईसाई छावनी वाले शहरों में मज़दूरी करते थे और अब भी हर छावनी वाले शहर में लाल कुर्ती नाम का इलाका है जहां ईसाई रहते हैं.

लेकिन अब भी ईसाई समुदाय पाकिस्तान के ग़रीब समुदायों में से है, जिन्हें छोटे-मोटे काम ही मिलते हैं. पंजाब में गांव के गांव ईसाइयों के हैं जहां के लोग मज़दूरी करते हैं या खेतों में काम करते हैं.

पाकिस्तान के ईसाई समुदाय के कुछ वर्ग हैं जो तुलनात्मक रूप से धनी हैं और ब्रितानी राज के दौरान गोवा से आए थे, ये ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं और कराची में बसे हैं.

इन सभी लोगों में असुरक्षा का भाव है, पाकिस्तान का माहौल रहने लायक न रहने के बाद रईस ईसाई कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जा बसे हैं.

अगर कुछ मुसलमान देश छोड़ने के बारे में सोचेंगे तो ईसाई और दूसरे अल्पसंख्यक ये दबाव ज़्यादा महसूस करेंगे ही.

बंटवारे से पहले का पाकिस्तान ज़्यादा विविधतापूर्ण था और पाकिस्तानी समाज के इस्लामीकरण के बाद सहनशीलता घटी है.

बंटवारे से पहले के ईसाई खुद को उस अल्पसंख्यक समुदाय में मान सकते थे जो तब कुल जनसंख्या के 15% थे. अब अल्पसंख्यक 4% से भी कम रह गए हैं. इस्लामी चरमपंथ के आने के बाद हालात और बदल गए हैं.

ईशनिंदा

1990 के दशक से कई ईसाइयों को कुरान को अपवित्र करने या पैगंबर मोहम्मद की ईशनिंदा करने का दोषी पाया गया है, हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ज़्यादातर आरोप निजी विवादों से उपजे हैं.

हालांकि ज़्यादातर को निचली अदालत ने मौत की सज़ा दी थी, ऊंची अदालतों ने ज़्यादातर मामलों में या तो सबूत के अभाव में उलट दिया या ये पाया गया कि शिकायतकर्ता आर्थिक लाभ के लिए आरोप लगा रहे थे.

ईशनिंदा के आरोपों की वजह से ईसाइयों के ख़िलाफ़ अक्सर हिंसा होती रही है.

साल 2005 में फ़ैसलाबाद से सैकड़ों ईसाइयों को भागना पड़ा था क्योंकि इलाके के एक नागरिक पर कुरान के पन्ने जलाने के आरोप लगे थे और पूरे मोहल्ले पर कुल्हाड़ी और लाठियों के साथ भीड़ ने हमला बोल दिया था.

इसके बाद शहर के कई चर्च और ईसाई स्कूलों में आग लगा दी गई थी.

साल 2009 में पंजाब के गोजरा कस्बे में भीड़ ने करीब 40 घरों और एक चर्च में आग लगा दी थी और कम से कम आठ ईसाइयों को ज़िंदा जला दिया गया था.

हालांकि मुसलमान और ईसाई बार-बार के झगड़ों के बगैर साथ-साथ रहते हैं, एक दूसरे के त्योहारों में जाते हैं.

हमलों के पीछे वजह

ईसाइयों के ख़िलाफ़ होने वाली कुछ हिंसा संगठित है और इसका सीधा रिश्ता अफगानिस्तान में अमरीका की अगुवाई वाले युद्ध से है, इसलिए इसके पीछे राजनीतिक वजह है.

साल 2001 में अमरीका के अफगानिस्तान पर हमले के कई महीने बाद टक्सिला में ईसाई मिशन अस्पताल के चर्च में ग्रेनेड हमले में चार लोग मारे गए थे.

इसके कुछ महीने बाद कराची में हथियारबंद लोगों ने ईसाई चैरिटी के छह सदस्यों को बांधने के बाद उनकी हत्या कर दी थी. हालांकि ये घटनाएं बीते कुछ सालों में छिटपुट रही हैं लेकिन लगातार होती रही हैं.

Image caption हिंसा की वजह से बड़ी तादाद में हिंदू पाकिस्तान छोड़ने पर मजबूर हुए हैं.

हालांकि ये कहना जल्दबाज़ी होगी कि पेशावर में रविवार को चर्च पर हुआ हमला किस श्रेणी में आता है लेकिन इसका वक्त बड़ा महत्व रखता है.

ये हमला ऐसे समय हुआ है जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ न्यूयॉर्क पहुंचने वाले हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि पेशावर में हुए हमले का साया उनके दौरे पर पड़ेगा और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान के चरमपंथ से लड़ने की प्रतिबद्धता पर सवाल उठेंगे.

ये पाकिस्तान में ईसाइयों पर पहला बड़ा हमला है जो अल्पसंख्यक शिया समुदाय पर हाल में हुए हमलों की तरह लगता है. लेकिन उस दुश्मनी के पीछे की वजह कुछ और लगती है.

पाकिस्तान में शियाओं को असरदार और सेना और देश के सांस्कृतिक जीवन में अहम किरदार निभाने वाले समुदाय के तौर पर देखा जाता है.

जैसा कि कुछ विश्लेषक कहते हैं, वे शिया ईरान और सुन्नी सऊदी अरब के बीच के छद्मयुद्ध में फंसे हुए हैं.

पाकिस्तान के ईसाई और हिंदू अल्पसंख्यक सहानुभूति जगाते हैं और वे समुदायों और विचारधाराओं के बीच की बड़ी लड़ाई के औज़ार नहीं हैं. वे पश्चिम को संदेश देने या नवाज़ शरीफ़ को शर्मिदा करने की एक चरमपंथी योजना का हिस्सा लगते हैं.

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