पाकिस्तान में भूकंप के बाद उग आया नया टापू

पाकिस्तान के लोगों के लिए मंगलवार का दिन दहशत पैदा करने वाला था. इस दिन आए तेज भूकंप ने लोगों को झकझोर कर रख दिया वहीं इस भूकंप के बाद तटीय शहर ग्वादर से मात्र एक किमी की दूरी पर समुद्र में एक टापू बन जाने से वे अचंभित हो गए.

इसके बाद सूचना पाकर इस टापू पर पहुंचे एक स्थानीय पत्रकार बहराम बलोच और उनके कुछ साथी बुधवार की सुबह इस टापू पर उतरे.

उन्होंने कहा, ''अंडे के आकार का यह टापू करीब 250 से 300 फीट लंबा और पानी की सतह से करीब 60-70 फीट ऊपर है.''

इसकी सतह खुरदुरी है और अधिकतर क्षेत्र में कीचड़ है. कुछ क्षेत्रों में रेत में है. इसके एक क्षेत्र में ठोस चट्टान है और वहीं पर बलोच और उनके दोस्त उतरे थे.

बलोच ने बताया कि सतह पर मरी हुई मछलियां हैं जबकि दूसरे इलाके में गैस के उड़ने की आवाज सुनी जा सकती है. हालांकि इस गैस से मीथेन जैसी महक नहीं आ रही है. लेकिन माचिस की जलती तिल्ली को इस गैस के संपर्क में लाया गया तो उसमें आग लग गई. बड़ी मुश्किल से आग को बुझाया जा सका.

इस घटना के बाद ग्वादर में एक घटना की चर्चा जोरों पर है. बुजुर्गों के मुताबिक करीब 60 से 70 साल पहले एक ऐसी ही घटना हुई थी जिसमें एक टापू का निर्माण हुआ था जिसे ज़लाला कोह नाम दिया गया था. इस कहानी को पूरी तरह से गलत नहीं करार दिया जा सकता है, क्योंकि 1945 में एक ग्वादर से 100 किमी पूरब में इसी तटीय क्षेत्र में भूकंप आया था, जिसे मक्रान कहा जाता है.

पूरब से पश्चिम तक करीब 700 किमी लंबे मक्रान तट को भूकंप की दृष्टि से ख़तरनाक ज़ोन माना जाता है.

कराची स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओसिनोग्राफी के महानिदेशक राशिद तब्रेजा ने कहा कि इस क्षेत्र में भूकंपीय गतिविधियों के कारण ऊर्जा के उत्सर्जन को देखते हुए समुद्र के तल में ज्वलनशील गैस होने की बात को बल मिलता है. उन्होंने कहा, ''मक्रान तट के पास समुद्र के तल में भारी मात्रा में गैस दबा हुआ है.''

ग्वादर के पास 1945 के बाद से यह चौथा द्वीप है. पिछले 15 साल में इस तरह से बना यह तीसरा टापू है. साल 1999 और फिर 2010 में ओरमाना के तट पर हिंगोल नदी के डेल्टा के बिल्कुल नीचे एक किमी के दायरे में ये टापू बने थे.

इस क्षेत्र के एक सबसे चर्चित ज्वालामुखी चंद्रगुप हिंगोल नदी के करीब यहीं पर स्थित है. यह हिंदुओं का एक पवित्र स्थल है. यहां पर हिंग्लाज के गुफा में स्थित मंदिर में वे हर साल अप्रैल में पूजा करते हैं.

(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार