शुंगा था जापान का 'कामसूत्र'

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ब्रिटिश म्यूज़ियम में जापान की काम कला से जुड़ी कला के डेढ़ सौ से ज़्यादा नमूनों की प्रदर्शनी हो रही है. शुंगा नाम की इस प्रदर्शनी में रखी तस्वीरें उसी युग में यूरोपीय कला के उलट सेक्स को लेकर अलग परिप्रेक्ष्य पेश करती है.

प्रदर्शनी में दर्शकों को जापान के उस दौर के कुछ बेहद अंतरंग क्षणों को देखने-समझने का मौक़ा मिलेगा जब वह बाक़ी दुनिया की नज़रों से ओझल था.

ज़्यादातर तस्वीरें लकड़ी के ब्लॉक प्रिंटों पर हैं जिन्हें टोक्यो में 16वीं, 17वीं और 18वीं सदी में तैयार किया गया था. इनमें अक्सर विभिन्न सेक्स क्रियाकलापों को बेहद खुले ढंग से बारीक़ी के साथ रखा गया है.

‘‘शुंगा’’ का साहित्यिक मतलब है ‘‘वसंत की तस्वीरें’’; काम कला के लिए इस शब्द को उक्ति की तरह इस्तेमाल किया जाता था.

जब शहर की आबादी तेज़ी से बढ़ रही थी और पश्चिमी जगत के साथ उसका संपर्क नहीं था तब यह कला तेज़ी से विकसित हुई.

बारीक वर्णन

इन्हें ‘‘तकिया तस्वीरें’’ या ‘‘हंसती हुई तस्वीरें’’ कहा जाता था और इनमें दिखाए गए चरित्रों को सेक्स का आनंद लेते दिखाया गया था.

ज़्यादातर तस्वीरें पुरुष और महिलाओं की हिस्सेदारी दिखाती हैं लेकिन इनमें से कुछ में गे और लेस्बियन सीन मिलेंगे जबकि कुछ में सामूहिक व्यभिचार भी दिखाया गया है.

इन तस्वीरों को कभी-कभी 12 तस्वीरों की अल्बम में बेचा जाता था, जिनमें विभिन्न काम स्थितियों का वर्णन होता था. एक कलेक्शन खरीदने पर खरीदारों को यह बताना ज़रूरी नहीं था कि वे किन्हें देखना चाहते हैं.

अपने खुलेपन के कारण ब्रिटिश म्यूज़ियम में लगी इस प्रदर्शनी को केवल 16 साल की उम्र से ज़्यादा के लोग ही देख सकते हैं.

अतीत में कई गैलरी शुंगा को अश्लीलता का दर्जा देती रही हैं और इन तस्वीरों को प्रदर्शन के लिए नहीं रखती थीं. मगर, हाल ही में इसे एक परिष्कृत कला रूप के रूप में स्वीकार कर लिया गया है जो आधुनिक जापान के शुरुआती दिनों की सेक्सुएलिटी और लैंगिक राजनीति पर अंतर्दृष्टि प्रदान करती है.

'अश्लीलता नहीं'

क्योटो की रित्सुमीकान यूनिवर्सिटी की अकी इशीगामी कहती हैं, ‘‘शुंगा एक गूढ़ कला है. यह आम पोर्नोग्राफ़ी या अश्लील कला से अलग है.’’ इशीगामी प्रदर्शनी के दौरान लंदन में एक अकादमिक सम्मेलन में हिस्सा ले रही हैं.

वे कहती हैं कि इन तस्वीरों का आनंद अक्सर महिलाएं लेती थीं और ‘‘तैरती हुई दुनिया की कला’’ का एक रूप थी और टोक्यो के तथाकथित ‘प्लेज़र डिस्ट्रिक्ट’ से प्रेरित थी, जहां संगीतकार, कलाकार और वैश्याएं ग्राहकों से क़ीमत लेने के बाद उनका मनोरंजन करते थे.

कभी-कभी शुंगा अल्बम की तस्वीरें नौजवान महिलाओं को उनकी शादी से पहले दी जाती थीं ताकि उन्हें अपनी सुहागरात से पहले जागरूक किया जा सके.

मगर कला इतिहासकार डॉक्टर मैजेला मुनरो कहते हैं कि हालांकि शुंगा की काम शिक्षा में भूमिका थी, पर यह उसका मुख्य उद्देश्य नहीं था.

डॉक्टर मुनरो के मुताबिक़, ‘शुंगा प्रिंट महंगे नहीं थे और इन्हें शहरी मध्यम वर्ग के संग्रहकर्ता खरीदते थे; ये अपने समय की जन संस्कृति के कलात्मक नमूने हैं.’

डॉक्टर मुनरो कहते हैं, ‘हालांकि वे सस्ते थे पर महिलाओं के पास उन्हें खरीदने की वजह या पैसा नहीं था. इन्हें कभी कभी कुछ संरक्षक खरीदते थे, जो आनंद की दुनिया में अपने दौरे की यादगार चाहते थे और जो केवल पुरुषों के आनंद के लिए खुला था.’’

‘बेहतरीन कपड़े’

आधुनिक दुनिया के लिए शुंगा तस्वीरें मौजूदा जापानी मांगा कार्टून या कैरीकेचर की तरह लगती हैं जो बेहद कामुक हो सकता है.

हालांकि उनमें कभी-कभार ही नग्न शरीर को दिखाया गया है.

लंदन यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ़ ओरियंटल एंड अफ़्रीकन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर टिमन स्क्रीच कहते हैं कि उन्हें संदर्भ के साथ देखा जाना चाहिए.

वो कहते हैं, ‘अरसे से चला आ रहा विचार कि मानव शरीर की संपूर्णता का ख़्याल ग्रीक आदर्श से लिया गया है, सभी पूर्वी एशियाई देशों में पूरी तरह ग़ायब था.’

‘यह कुछ इस तरह है कि लोग सोचते थे कि ख़ूबसूरत और सुंदर कपड़े त्वचा के मुक़ाबले ज़्यादा कामुकता पैदा करते थे. गलियों में कामगारों की त्वचा दिखती है और आपने स्नानागारों में भी ऐसा ही पाया होगा.’

‘अगर आप किसी बेहद अद्भुत कपड़े के टुकड़े पर उंगलियां फिराएं- तो यह उत्तेजक होता था. इसीलिए (इन तस्वीरों में) शरीर पर आपको अद्भुत कपड़े मिलेंगे.’

पहली शुंगा तस्वीरें ब्रिटेन में एक कार्गो जहाज़ द क्लोव के ज़रिए पहुंची थीं, जो ईस्ट इंडिया कंपनी का जहाज़ था और 1614 में जापान की यात्रा से लौटा था.

यह जहाज़ अपने साथ जापानी कमांडरों यानी शोगन की तरफ़ से मिले कवच और सोने की नक्काशी वाले सिल्क के कपड़े लाया था.

कुछ सामान को नीलामी में बेच दिया गया लेकिन कंपनी ने जहाज़ के कमांडर जॉन सैरिस से शुंगा को अपने कब्ज़े में ले लिया. उसका मानना था कि इसे लेकर विवाद हो सकता है. बाद में इन्हें नष्ट कर दिया गया.

इतिहास की गवाह

प्रोफ़ेसर स्क्रीच ने शुंगा के बारे में एक किताब लिखी है. वो कहते हैं कि इन तस्वीरों में मुश्किल से ही आपको बलात्कार या ज़बर्दस्ती दिखेगी.

वह कहते हैं, ‘सबसे ज़्यादा कामुकता शायद तब होती है जब आप जो कर रहे हैं वही वह आपके साथ करना चाहता है.’

असल में आधुनिक टोक्यो के शुरुआती दिनों में वैश्यावृत्ति चारों तरफ़ फैली थी और शहर को एडो के नाम से जाना जाता था.

ग़रीब परिवारों की नौजवान लड़कियां अक्सर उनके परिवारों द्वारा देह व्यापार में धकेल दी जाती थीं. अक्सर सेक्स संबंधी बीमारियां और अनचाहे गर्भ हुआ करते थे.

प्रोफ़ेसर स्क्रीच के मुताबिक़ उस वक़्त की कला - कामुक तस्वीरें और महिलाओं का सीधा-साधा चित्रण- एक अलग तस्वीर पेश करती है.

वह कहते हैं, ‘हरेक सुंदर है. कुछ ऐसी कहानियां भी हैं जब किसी अहंकारी मनुष्य ने किसी दूसरे पर ख़ुद को थोपने की कोशिश की हो, मगर ज़्यादातर शुंगा मुक्त प्रेम की किस्म का नमूना है- जो कि हम जानते हैं कि तकरीबन उस वक़्त की चीज़ नहीं था.’

शुंगा प्रदर्शनी के खत्म होने के बाद यह जापान समेत दूसरे देशों में दिखाई जाएगी.

शुंगा – सेक्स एंड प्लेज़र इन जैपेनीज़ आर्ट प्रदर्शनी ब्रिटिश म्यूज़ियम में 3 अक्टूबर 2013 से 5 जनवरी 2014 तक चलेगी.

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