अल-क़ायदा में भर्ती का बदलता क़ायदा

चरमपंथी संगठन अल-क़ायदा अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए नए सदस्यों की भर्ती कर रहा है साथ ही संगठन की सदस्यता के लिए तय पुराने मानकों में भी बदलाव कर रहा है.

ओसामा बिन लादेन कभी भी अल-क़ायदा के नेटवर्क में सोमाली इस्लामी समूह को शामिल करना नहीं करना चाहते थे. लादेन ने एक पत्र में सोमाली संगठन के नेताओं की आलोचना भी की थी.

यह पत्र 2011 में लादेन के साल मारे जाने के बाद उसके अबोटाबाद आवास में मिला था.

इस पत्र के अनुसार यह संगठन उन लोगों पर भी जल्दबाजी में बेमतलब जुर्म करते थे जिनके अपराध अस्पष्ट होते थे.

लादेन की मौत को अभी साल भर भी नहीं हुए थे कि अल-क़ायदा के नए नेता आयमन अल-जवाहिरी ने अल-शबाब की खामियों को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया.

अंततः जवाहिरी ने अल-शबाब को अल-क़ायदा संगठन में शामिल कर लिया.

संयुक्त राष्ट्र में अल-क़ायदा और तालिबान निगरानी दल के पूर्व संयोजक रिचर्ड बारनेट के अनुसार, जवाहिरी को लगता है कि ऐसा करने से उनकी पहुंच बढ़ेगी.

अल-शबाब को अल-क़ायदा में शामिल करना अल-कायदा के नेतृत्व के दृष्टिकोण में आए बड़े बदलाव को दर्शाता है.

जवाहिरी और उनके साथी अपने नए साथियों का स्वागत करते हैं. अल-कायदा का नया नेतृत्व अपने पूर्व नेताओं की अपेक्षा ज्यादा महत्वाकांक्षी भी हैं.

बढ़ता आकार

ऑस्ट्रेलियाई संघीय खुफिया पुलिस की पूर्व विशेषज्ञ लेह फारेल का कहना है कि यदि अल-क़ायदा के साथियों और उसकी शाखाओं की संख्या में इजाफा होगा तो अल-क़ायदा का आकार पहले की तुलना में काफी बड़ा हो जाएगा.

अल-क़ायदा में नए सदस्यों की भर्ती का कारण साफ है-एक श्रेष्ठ अल-क़ायदा.

जवाहिरी और उनके साथियों ने पिछले कई वर्षों से पश्चिमी देशों में कोई बड़ा हमला भी नहीं किया है.

यही वजह है कि अल-क़ायदा अब दुनिया भर में अपनी मौजूदगी का अहसास कराने के लिए नए तरीके अपना रहा है.

ये नए मानक संगठन में भर्ती के लिए जरूरी पुराने मानकों की अपेक्षाकृत कम कठोर हैं.

दूसरी ओर अगर देखें तो अल-कायदा के इस फैसले का असर भी देखने को मिला.

21 सितंबर तो अल-शबाब ने नैरोबी के वेस्टगेट मॉल पर हमला किया. इस हमले में 60 से अधिक लोग मारे गए थे.

जिस तरह यह बर्बर हमला किया गया उससे यह बात साफ है कि अगले कुछ समय तक अल-क़ायदा लोगों के बीच चर्चा का विषय जरूर बना रहेगा.

इस बीच अल-क़ायदा से जुड़े एक और संगठन ने सीरिया में एक सीमाई कस्बे को अपने नियंत्रण में कर लिया.

अल-क़ायदा से जुड़ने का अर्थ

फारेल के अनुसार केवल अल-शबाब ही की तरह इंडोनेशिया और अन्य कई देशों के चरमपंथी भी अल-कायदा का बैनर चाहते हैं.

ये संगठन जवाहिरी का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते हैं.

यह संगठन अपनी मौजूदगी के बारे में एहसास कराते हैं और पूछते हैं कि क्या हम अल-कायदा में शामिल हो सकते हैं ?

दूसरे संगठनों के चरमपंथी अल-क़ायदा में इसलिए शामिल होना चाहते हैं क्योंकि वो अच्छी तरह से जानते हैं कि अल-क़ायदा के साथ जुड़ने से उनके संगठन का कायापलट हो जाएगा.

बारनेट कहते हैं, नाम में क्या रखा है ! फिर भी इसमें बहुत कुछ है.

बारनेट के अनुसार बहुत से चरमपंथियों को अल-क़ायदा के नाम से खुद के निर्दोष होने का एहसास होता है, जिसका मतलब है कि आप भ्रष्ट नहीं हो, निर्दयी नहीं हो.

नकारात्मक पक्ष

अल-क़ायदा की सदस्यता का एक नकारात्मक पक्ष भी है.

वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक 'न्यू अमेरीका फाउंडेशन' की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले नौ वर्षों में पाकिस्तान में ड्रोन हमलों में 1600 से अधिक चरमपंथी मारे गए हैं.

इन हमलों में अल-क़ायदा के कई बड़े नेता भी मारे गए.

जबकि व्हाइट हाउस रिपोर्ट 2011 के अनुसार संगठन में सदस्यता के कमजोर मानकों और अल-क़ायदा की अपेक्षाकृत व्यापक परिभाषा की वजह से यह पहले की तुलना में काफी बड़ा संगठन हो गया है.

'अमेरीकन इंटरप्राइज इंस्टीट्यूट' की कैथरीन जेम्मरमान ने सितंबर में लिखे अपने एक शोधपत्र में लिखा है कि मुख्य अल-क़ायदा के अलावा जवाहिरी और उसके सहयोगियों के साथ अन्य कई समर्थक संगठन शामिल हैं.

इनमें ईराक में अल-क़ायदा, माघरेब में अल-क़ायदा और अल-शबाब के साथ-साथ ही अरब में अल-क़ायदा शामिल हैं.

इसके अतिरिक्त अल-क़ायदा के कई ऐसे समर्थक भी हैं जो संगठन के साथ औपचारिक रूप से नहीं जुड़े हुए हैं.

फारेल के अनुसार जवाहिरी ने चरमपंथी संगठनों के लिए अल-क़ायदा में शामिल होना काफी आसान कर दिया है.

हालांकि इसमें अभी भी एक साल का समय लग जाता है. और चमरपंथी नेता इस संबंध में होने वाले पत्राचार को गुप्त ही रखते हैं.

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