पाकिस्तानः जब नवाज़ ने 'सलाहकार से पूछा' किसे बनाएं आर्मी चीफ़

  • 9 अक्तूबर 2013

(पाकिस्तान में सेना प्रमुख जनरल अशफ़ाक़ परवेज़ कयानी पद छोड़ने की घोषणा कर चुके हैं. ऐसे में वहां नए सेना प्रमुख की खोज पर बीबीसी संवाददाता वुसतुल्लाह खान ने अपने अंदाज में व्यंग्य किया है.)

प्रधानमंत्री: क्या करें?

सलाहकार: फैसला तो आपको करना है सर जी.

प्रधानमंत्री: सुबह से तीन तस्वीरें उलट पुलट कर देख चुका हूं. समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं.

सलाहकार: क्या समझ में नहीं आ रहा है सर जी?

प्रधानमंत्री: ये देखो तस्वीर नंबर एक. नाक नक्शा तो ठीक है मगर आंखें छोटी हैं. अब्बा जी ने कहा था कि छोटी आंख वाले पर हमेशा आंख रखना और ये तस्वीर नंबर दो. इसका चेहरा बिल्कुल सपाट है बिल्कुल चीनियों की तरह. कुछ पता नहीं चलता है कि ये मेरे बारे में क्या, कैसे और क्यों सोचता है? और ये रही तस्वीर नंबर तीन, मुस्कराता चेहरा है लेकिन चेहरा तो जिया साहब का भी हमेशा मुस्कराता रहता था और फिर उन्होंने मुस्कराते मुस्कराते हुए भुट्टो साहब की...

सलाहकार: फिर जैसा आपका हुक्म.

प्रधानमंत्री: तीसरे के बाद चौथा, पांचवां, छठा और सातवां भी होगा. जरा उनकी तस्वीरें मंगवाओ.

सलाहकार: सर जी तस्वीरें रिकॉर्ड से निकलवाने में तो देर लगेगी. मैं वैसे ही आपको नाक नक्शा समझा देता हूं. चौथा दूर का चश्मा लगाता है.

प्रधानमंत्री: एक मिनट. दूर का चश्मा तो मुशर्रफ भी लगाता था?

Image caption 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी की सरकार ने कयानी को तीन साल का सेवा विस्तार दिया था

सलाहकार: जी सर.

प्रधानमंत्री: तो फिर दफा करो. पांचवें के बारे में बताओ.

सलाहकार: सर पांचवा क्लीन शेव है, मगर पढ़ते समय नजदीक का चश्मा लगाता है.

प्रधानमंत्री: जहांगीर करामत की तरह?????

सलाहकार: जी सर.

प्रधानमंत्री: चलो आगे बढ़ो.

सलाहाकार: सर छठे की दूर और पास की नजर ठीक है मगर मूंछें हैं.

प्रधानमंत्री: मूंछें? कैसी मूंछें? जिया उल हक जैसी, काकड़ जैसी या जियाउद्दीन जैसी?

सलाहकार: सर काकड़ साहब से मिलती हैं.

प्रधानमंत्री: आर यू श्योर कि जियाउद्दीन जैसी नहीं हैं?

सलाहकार: नो सर, आप चाहें तो हम उसे जियाउद्दीन जैसी करने का मशविरा दे सकते हैं.

प्रधानमंत्री: नहीं कोई फायदा नहीं. अंदर से तो वो फिर भी छोटी मूंछों वाला ही रहेगा ना.. और सातवां?

Image caption मुशर्रफ ने 1999 में नवाज शरीफ सरकार का तख्तापलट कर पाकिस्तान की बागडोर संभाली और 2008 तक सत्ता में रहे

सलाहकार: सर जी सातवें वाले का कुछ समझ नहीं आता है. उसे कभी किसी ने गुस्से में नहीं देखा है. हर वक्त चेहरे पर फिलोस्फरों जैसी मुस्कराहट रहती है. आपका ज़िक्र आ जाए तो मुस्कराहट और गहरी हो जाती है.

प्रधानमंत्री: क्या मतलब इस बात का? क्या वो मुझे पसंद करता है या मुझे बेवकूफ समझता है.

सलाहकार: सर यही तो पता नहीं चलता है.

प्रधानमंत्री: हम्म.. तो फिर बताओ क्या करें?

सलाहकार: सर मेरी मानें तो सब के नाम बरतन में डाल कर किसी बच्चे से एक पर्ची निकलवा लें.

प्रधानमंत्री: लेकिन अगर पर्ची पर इन सातों में से किसी एक का नाम आ गया तो क्या करेंगे?

सहालकार: सॉरी सर.. ये तो मैंने सोचा ही नहीं था.

प्रधानमंत्री: मेरे जेहन में एक आइडिया आया है. ज़रा उसे एक्सप्लोर करो. तुम्हें याद है कि दो साल पहले तीन रिटायर्ड अफ़सरों पर जब भ्रष्टाचार का आरोप लगा तो उनकी रिटायरमेंट खत्म करके उन्हें हाज़िर सर्विस कर लिया गया था ताकि अंदर ही अंदर उनका कोर्ट मार्शल किया जा सके?

सलाहकार: जी सर ऐसा हुआ तो था.

Image caption पाकिस्तान सेना के सामने सीमाओं की रक्षा के अलावा अंदरूनी चरमपंथ से निपटना भी एक बड़ी चुनौती है

प्रधानमंत्री: तो फिर क्यों हम किसी रिटायर्ड अफ़सर को दोबारा हाज़िर सर्विस कर के उसका नाम राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेज दें. मेरे ज़ेहन में एक नाम है. माशा अल्लाह 91 साल की उम्र में भी किसी मौजूदा अफ़सर की तरह चाक चौबंद हैं. तुम्हें पता है कि इस वक्त उत्तर कोरिया के चीफ़ ऑफ स्टाफ भी एक 85 साल के जनरल साहब हैं. चिली के जनरल पिनोशे भी इतनी ही उम्र में रिटायर हुए और वियतनाम के जनरल ग्याप का अभी एक सौ दो साल की उम्र में निधन हुआ है. ये सब मैंने विकीपीडिया पर पढ़ा था. कैसे आइडिया है?

सलाहकार: सर आपका आइडिया सुन कर मेरे ज़ेहन में भी एक आइडिया आया है.

प्रधानमंत्री: वाक़ई? जल्दी से बताओ. तुम मेरे पहले सलाहकार हो जिसके ज़ेहन में कोई आइडिया आया है.

सलाहकार: सर हम आर्मी का नाम नेवी और नेवी का नाम आर्मी रख दें तो समस्या ही हल हो जाएगी.

प्रधानमंत्री: लेकिन इससे आर्मी वाले नाराज़ हो सकते हैं. मैं दूसरी बार उनकी नाराज़गी मोल नहीं ले सकता हूं.

सलाहाकर: तो फिर सर इन तस्वीरों में से ही एक चुन लें.

प्रधानमंत्री: धररर. फिटे मुंह. तुम फिर कैसे सलाहकार हो.

सलाहकार: सर ....

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