पढ़ाई में फिसड्डी ब्रिटेन

  • 9 अक्तूबर 2013
ऑक्सफ़र्ड
Image caption औद्योगिक देशों में गणित के मामले में इंग्लैंड 21वें स्थान पर है

विलायत की पढ़ाई को लेकर आपके मन में पता नहीं क्या तस्वीर है, ऑक्सफ़र्ड और कैम्ब्रिज का ख़याल आपके ज़हन में ज़रूर आया होगा लेकिन चिराग़ तले अंधेरा होता है, काबुल में भी गधे होते हैं.

इसी तरह प्राइमरी स्कूल की पढ़ाई के मामले में इंग्लैंड का हाल बुरा है.

एक ताज़ा सर्वेक्षण बताता है कि दुनिया के 24 औद्योगिक देशों में गणित के मामले में 21वें और भाषा के मामले में 22वें नंबर पर है इंग्लैंड.

ब्रितानी मंत्री मैथ्यू हैनकॉक को मानना पड़ा है कि आँकड़े शर्मसार करने वाले हैं लेकिन उनके मुताबिक़ इसके लिए सत्ताधारी कंज़रवेटिव पार्टी नहीं, बल्कि पिछली लेबर सरकार ज़िम्मेदार है.

जापान और दक्षिण कोरिया दो ऐसे एशियाई देश हैं जो इस सर्वेक्षण में इंग्लैंड, जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों से काफ़ी ऊपर हैं.

पढ़ाई

ब्रिटेन में स्कूली पढ़ाई बिल्कुल मुफ़्त है और आबादी का काफ़ी बड़ा हिस्सा सेकेंडरी स्कूल तक पढ़ाई करता है, यूरोपीय संस्था ओईसीडी का सर्वे बताता है कि स्कूली शिक्षा हासिल कर लेने के बाद भी ऐसे लोगों की तादाद इंग्लैंड में काफ़ी अधिक है जो ठीक से लिख-पढ़ नहीं सकते या गुणा-भाग नहीं कर सकते.

ओईसीडी का कहना है कि पढ़े-लिखे होने के बावजूद ऐसे लोग रोज़गार में आगे नहीं बढ़ सकते या रोज़गार हासिल नहीं कर सकते, यही बात भारत के उच्च शिक्षित लोगों पर लागू होती है जिन्हें अंगरेज़ी में 'क्वालिफाइड बट अनएम्पलायेबल' यानी शिक्षित मगर रोज़गार के लिए अनुपयुक्त माना जाता है.

इन आँकड़ों के आने के बाद जो बहस चल रही है वो काफ़ी दिलचस्प है, सबसे ख़ास बात यही है कि आठवीं या दसवीं पास करने वाले व्यक्ति से क्या करने की उम्मीद की जा सकती है? क्या दसवीं पास व्यक्ति को साफ़-सुथरी भाषा में एक औपचारिक पत्र लिखना आना चाहिए या किसी ग्राफ़ या चार्ट का मतलब समझ में आना चाहिए.

Image caption ब्रिटेन में स्कूली पढ़ाई मुफ्त है.

अगर दसवीं पास व्यक्ति ये काम नहीं कर पाता तो क्या इसमें उस व्यक्ति का दोष है या फिर उस शिक्षा व्यवस्था का जिसमें वह पढ़कर निकला है.

आँकड़ों के सामने आने के बाद शिक्षा मंत्री का कहना है कि छात्रों से अधिक मेहनत की माँग करनी चाहिए और उन्हें महत्वाकांक्षी बनाया जाना चाहिए यानी एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाना एक चुनौती भरा काम होना चाहिए.

ब्रिटेन में प्राइमरी स्कूल की पढ़ाई की तुलना भारत से क़तई नहीं की जा सकती लेकिन भारत की उच्च शिक्षा की हालत काफ़ी हद तक ब्रितानी प्राथमिक शिक्षा जैसी है जहाँ से अधिकतर लोग डिग्रियाँ तो पा रहे हैं लेकिन व्यावहारिक हुनर नहीं.

वैसी सारी बदहाली भारत और ब्रिटेन दोनों देशों में, सरकारी शिक्षा की है, जिनके पास अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए पैसा है उनके लिए ऑक्सफ़र्ड, कैम्ब्रिज के बाद नौकरी के लिए गोल्डमैन सैक्स और मैरिल लिंच के दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं, चाहे वे दिल्ली में रहते हों या लंदन में.

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