पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों में भी सचिन की धूम

  • 13 अक्तूबर 2013
राहुल गांधी
Image caption राहुल गांधी ने हाल ही में मायावती पर निशाना साधा था

बीते हफ़्ते भारतीय उर्दू अख़बारों ने राजनीतिक गतिविधियों के अलावा जहां क्रिकेट से सचिन तेंदुलकर के संन्यास की चर्चा की तो पाकिस्तान के अखबारों में देश के सामने मौजूद चुनौतियों का ध्यान दिया गया है.

दिल्ली से छपने वाले ‘हिंदुस्तान एक्सप्रेस’ ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के इस बयान पर संपादकीय लिखा है कि मायावती दलित नेताओं को आगे नहीं आने देतीं.

अख़बार लिखता है कि ये सही है कि अपनी पार्टी में दूसरे दलित नेताओं को उभारने में मायावती की कोई दिलचस्पी नहीं है लेकिन सिर्फ ये बयान देकर राहुल गांधी कांग्रेस का पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं.

अख़बार के अऩुसार गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे कांग्रेस का सबसे बड़ा दलित चेहरा हैं लेकिन उन्हें महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक न जाने कितनी बार दौड़ाया गया है. कभी महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना देते है तो कभी केंद्र में मंत्री, इसलिए कांग्रेस को अपने अंदर भी झांकना चाहिए.

राष्ट्रीय स्तर पर मायावती और रामविलास पासवान के अलावा दलितों का कोई नेता नज़र नहीं आता.

सचिन का ज़ज्बा

‘हमारा समाज’ का संपादकीय है- आंध्र का अंधेरा. अख़बार ने अपने संपादकीय में लिखा है- आंध्र प्रदेश में इस वक्त अलग तेलंगाना के मुद्दे पर राजनीतिक तूफ़ान आया हुआ है. राजनीतिक नेता ही नहीं बल्कि सरकारी कर्मचारी भी हड़ताल पर हैं. बिजली कर्मचारियों की हड़ताल के कारण प्रदेश के अंधेरे में रहने की नौबत पैदा हो गई.

क्रिकेट से मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के संन्यास पर ‘इंकलाब’ ने लिखा है इस फ़ैसले से भारतीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ऐसी जगह खाली हो रही है जिसका भरना जल्द संभव नहीं लगता है.

अख़बार के मुताबिक़ सचिन के 24 साल के करियर में मौसम बदलते रहे, खिलाड़ी टीम में आते जाते रहे, मैचों में हार जीत का सिलसिला जारी रहा, धूमें मचती रही और सन्नाटा छाता रहा, लेकिन इस दौरान एक चीज़ ज्यों की त्यों रही वो थी क्रिकेट के प्रति सचिन का जज़्बा.

कहां गए मुल्ला बिरादर

उधर पाकिस्तानी दैनिक ‘एक्सप्रेस’ ने बीबीसी उर्दू के साथ तहरीके तालिबान के प्रमुख हकीमुल्लाह महसूद के इंटरव्यू पर संपादकीय लिखता है.इस इंटरव्यू में सरकार पर बातचीत के लिए गंभीर न होने के आरोपों पर अखबार लिखता है कि सरकार ने तो चरमपंथियों से बातचीत के लिए कोई कमेटी नहीं बनाई. लेकिन तस्वीर का दूसरा रुख़ ये भी है कि सर्वदलीय बैठक में बातचीत पर सहमति के बाद भी तालिबान ने अपनी हिंसक गतिविधियां जारी रखीं. उसने किसी तरह की लचक नहीं दिखाई.

Image caption हकीमुल्लाह ने बीबीसी को दिया इंटरव्यू

‘जंग’ ने लिखा है कि अब जबकि इस इंटरव्यू में तहरीके तालिबान के प्रमुख ने कह दिया है कि बातचीत के लिए तैयार हैं तो सरकार को भी इसमें देर नहीं करनी चाहिए. लेकिन अख़बार का कहना है कि अच्छा होता अगर निर्दोष नागरिकों को खून में नहलाने का सिलसिला बंद होता और वाक़ई उन्हें इस मोर्चे पर होने वाली प्रगति का अहसास होता. अगर धमाके भी होते रहे और फ़ौजी ऑपरेशन भी चलता रहा तो आम लोगों के लिए इस बातचीत का कोई मतलब नहीं होगा.

दैनिक ‘औसाफ़’ ने अफ़ग़ान तालिबान के एक बड़े नेता मुल्ला बिरादर की रिहाई को लेकर पैदा हुए भ्रम पर लिखा है कि मुल्ला बिरादर अफ़ग़ान तालिबान के पास भी नहीं पहुंचे और पाकिस्तान की तरफ से भी ये कहा जा रहा है कि उन्हें रिहा कर दिया गया है, तो फिर वो हैं कहां? अख़बार कहता है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय को ये गफ़लत दूर करनी होगी.

मुश्किल में मुशर्रफ

दैनिक ‘आजकल’ ने अपने एक कार्टून में पाकिस्तान में बढ़ती महंगाई का उजागर किया है. कार्टून में ईद से पहले एक आदमी एक बकरे को लिए जा रहा है जिसे देख कर बाकी लोग कह रहे हैं- भई अमीर आदमी है.

दैनिक ‘वक्त’ में भी ऐसा ही एक कार्टून है जिसमें आटे के दाम बढ़ने के मुद्दे को उठाया गया है और इसमें भारी भरकम बोरी के नीचे सब परिवार वाले दबे दिखाए गए हैं.

पिछले दिनों पाकिस्तान के पू्र्व शासक परवेज मुशर्रफ़ को बलोच नेता अकबर बुगती की हत्या के मामले में जमानत मिलने के बाद उनके विदेश जाने की अटकलें लगी ही रही थीं कि उन्हें 2007 के लाल मस्जिद मामले में ग़िरफ़्तार कर लिया गया. इस पर दैनिक ‘दुनिया’ ने लिखा है कि अंधेरे में साया भी साथ छोड़ देता है.

अख़बार कहता है कि मुशर्रफ़ अपनी दूरदर्शिता का बड़ा बखान करते हैं. लेकिन वो ये भी नहीं समझ पाए कि वो दिन हवा हो गए जब चारों ओर उनके नाम का डंका बजता था. जब वो पिछले साल पाकिस्तान लौटे तो उन्हें एयरपोर्ट पर ही उन्हें अंदाजा हो जाना चाहिए था कि अब वो दिन नहीं रहे. उनके स्वागत के लिए सिर्फ चंद सौ लोग थे.

Image caption मलाला को मिला सखारोव पुरस्कार

पता नहीं उन्हें क्यों गलतफ़हमी थी कि देश उनका इंतजार कर रहा है. चुनाव में भी हिस्सा नहीं ले पाए, और मुकदमे अलग से शुरू हो गए.

‘नवाए वक्त’ ने लिखा है कि लड़कियों की शिक्षा के लिए मुहिम चलाने वाली मलाला यूसुफ़जई को नोबेल शांति पुरस्कार तो नहीं मिला, लेकिन उन्हें पिछले दिनों यूरोपीय संघ के सखारोव मानवाधिकार पुरस्कार से ज़रूर नवाज़ा गया. अख़बार कहता है कि नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित होना भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है.

अख़बार के अनुसार जहां तक उनके सियासत करने और प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश का सवाल है तो अभी वो वोट डालने की उम्र तक नहीं पहुंची है और प्रधानमंत्री बनने के लिए तो उन्हें दस साल और इंतजार करना होगा. तब तक वो अपनी उच्च शिक्षा ग्रहण करें, देश की दुआएं उनके साथ हैं.

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