ऑस्ट्रेलियाः शराबियों से जबरदस्ती पर उठे सवाल

  • 20 अक्तूबर 2013
आस्ट्रेलिया
Image caption पियक्कड़ पति के हाथों पिटाई के दौरान घायल युवती का इलाज करता पेट्रोलिंग दल का सदस्य

ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी क्षेत्र में शराब के आदी लोग एक बड़ी समस्या हैं. इससे निपटने के लिए सरकार ने सख़्त क़दम उठाया है. उन्हें जबरन पुनर्वास केंद्रों में भर्ती कराया जा रहा है. जो इसके लिए तैयार नहीं होता, उसे जेल भी भेजा रहा है.

ऑस्ट्रेलिया के कई दूसरे मूल निवासियों की तरह अलीसन फरबर शराब को हाथ भी नहीं लगातीं. मगर उनके जीवन का कोई ऐसा पहलू नहीं है, जो शराब से अछूता हो.

उनके यहां एक टूटी फूटी कार आकर रुकती है. उसमें से एक युवती कई बच्चों को जल्दी जल्दी उतारती है. ये युवती फरबर की भतीजी है. वह इन बच्चों को घर छोड़ पब जाना चाहती है. आधी रात का वक्त है.

समाज में शराब की लत और इससे जुड़ी हिंसा पर फरबर कहती हैं, "स्थिति दिनों दिन बदतर हो रही है."

शराब के असर

फरबर बताती हैं, "मर्द शराब यानी ग्रॉग के लिए बीवियों की पगार छीन रहे हैं, मना करने पर बेल्ट से उनकी पिटाई भी करते हैं."

ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी हिस्से की स्थानीय बोली में शराब को 'ग्रॉग' कहा जाता है.

फरबर बताती हैं कि उनके एक चचेरे भाई ने नशे में एक आदमी की हत्या कर दी थी. उस व्यक्ति के रिश्तेदार अब बदला लेने की बात करते हैं.

उत्तरी प्रांत में शराब ने सबकी जिंदगियां को प्रभावित किया है. मगर इसका सबसे ज्यादा असर यहां के मूल निवासियों पर हुआ है.

Image caption बेस प्राइस का मानना है कि इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है.

एक अध्ययन के मुताबिक मध्य ऑस्ट्रेलिया, जो 'एलिस स्प्रिंग' क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, वहां दूसरे नागरिकों की तुलना में शराब के कारण मरने की संभावना 31 गुना ज़्यादा है.

यह बात शहर में भी साफ तौर पर नजर आती है. कहीं शराब के नशे में ड्राइवर सड़क किनारे खंभों से भिड़ रहे नजर आते हैं, तो कहीं अस्पताल के बाहर धूप में डायलिसिस पर पड़े मूल निवासी मरीज़ देखे जा सकते हैं.

एक डॉक्टर ने बताया कि उनका डायलिसिस सेंटर औसतन 250 मरीजों का इलाज करता है. इसमें से कई लोगों की उम्र तो 20 से 30 वर्ष के बीच हैं.

यही नहीं, उत्तरी क्षेत्र में शराब पुनर्वास के लिए एक मंत्रालय भी बनाया गया है.

अनिवार्य पुनर्वास नीति

मगर जहां एक तरफ शराब के दुष्परिणाम स्पष्ट हैं, वहीं साल भर से इस बात पर भी विवाद चल रहा है कि इस स्थिति से कैसे निपटा जाए.

कंट्री लिबरल पार्टी (सीएलपी) ने उत्तरी क्षेत्र में पिछले साल हुए प्रांतीय चुनाव में जीत दर्ज की. सीएलपी ने इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले तो 'बैन्ड ड्रिंकर रजिस्टर' यानी प्रतिबंधित शराबी रजिस्टर की नीति वापस ली.

इस नीति के तहत ग्राहकों को शराब खरीदने से पहले अपनी पहचान बतानी होती थी और समस्याएं खड़ी करने वाले लोगों को शराब नहीं दी जाती थी.

'बैन्ड ड्रिंकर रजिस्टर' के बारे में अब सीएलपी का कहना है कि यह कदम विफल रहा और इससे अन्य लोगों को शराब लेने में भी असुविधा होती थी.

Image caption अनिवार्य पुनर्वास नीति के तहत शराबी के पुनर्वास केंद्र से भागना दंडनीय अपराध माना गया.

फिर, जुलाई में सीएलपी सरकार 'अनिवार्य शराब पुनर्वास' की नीति लेकर आई.

इस नीति के अनुसार यदि उत्पाती शराबी को पुलिस दो महीने में तीन बार 'ऐहतियातन हिरासत' में लेती है तो उसे पुनर्वास केंद्र भेजा सकता है, भले ही उसने कोई अपराध न किया हो.

यदि कोई पुनर्वास केंद्र से तीन बार भाग जाता है, तो इसे एक दंडनीय अपराध माना जाएगा.

इस नीति को लागू होने करने में तीन वर्षों के दौरान 9.5 करोड़ अमरीकी डॉलर खर्च होंगे. सितंबर के आख़िर तक लगभग 65 लोगों को पुनर्वास केंद्र भेजा जा चुका है.

तुष्टीकरण

इस नीति पर अमल के बाद विभिन्न संस्थाओं और हस्तियों ने इसके पक्ष-विपक्ष में अपनी बात रखी.

एक मंत्री कहते हैं, "यह नीति इसलिए लाई गई कि शराबियों से रास्ता खाली हो सकें."

उत्तरी क्षेत्र के मुख्यमंत्री एडम जाइल्स ने इस नीति के आलोचकों को 'कल्याण केंद्रित वामपंथी' नाम दिया है.

इन बयानों को शराबियों और अपराधियों से तंग आ चुके गोरों के तुष्टीकरण के रूप में देखा जा रहा है.

एडम जाइल्स ऑस्ट्रेलिया में अब तक किसी सरकार के पहले ऐसे प्रमुख हैं, जो वहां की मूल आदिवासी आबादी से ताल्लुक रखते हैं.

आलोचना

Image caption उत्तरी प्रांत में शराब ने सबकी जिंदगियां मुहाल कर रखी हैं.

बेस ननगेरी प्राइस भी मूल निवासी आबादी से ताल्लुक रखती हैं. पिछले चुनाव में सीएलपी के सबसे ज्यादा पांच मूल निवासी उम्मीदवार चुनाव जीते थे. उन्हीं में से प्राइस एक हैं और हाल ही में उन्हें महिला नीति और सामुदायिक सेवा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है.

वे कहती हैं, "कम से कम हम उनके लिए कुछ कर तो रहे हैं. ज़रा सोचिए कि इससे पहले अनदेखा किए जाने से कितने लोगों की मौतें हो चुकी हैं." वे पुनर्वास से पीछा छुड़ाकर भागने वालों को जेल में डालने की नीति की समर्थक हैं.

वे कहती हैं, "इनके साथ कड़ाई से निपटने की जरूरत है. एक दिन यही लोग हमें शुक्रिया कहेंगे. वैसे जेल में इतनी भी सख़्ती नहीं होती."

दूसरी ओर इस नीति से कई मूल निवासी ख़फ़ा हैं. उनका मानना है कि जेल भेजने का विचार सही नहीं है क्योंकि वहां पहले से ही मूल निवासियों की संख्या बहुत ज़्यादा है.

इसके जवाब में प्राइस का कहना है, "समाज में उनकी देख-रेख करने वाला कौन है. अच्छा है वे ऐसी जगह रहें जहां उनकी देखभाल की जाए."

वे आगे कहती हैं, "आप देखना वे जब जेल से बाहर निकलेंगे तो ज़्यादा तंदुरुस्त होंगे."

आंकड़ों पर सवाल

लेकिन इस नीति के आलोचक और वकील रशेल गोल्डफ्लाम कहते हैं, "इस क़ानून की सबसे बुरी बात ये है कि इसमें एक स्वास्थ्य समस्या को अपराध बना दिया गया है."

उनका कहना है कि ये समस्या बहुत गंभीर है लेकिन सरकार गेंद को पीड़ित के पाले में ही डाल कर कह रही है कि ये तुम्हारी समस्या है और तुम ही इससे निपटो.

वहीं पेशे से डॉक्टर डॉ. जॉन बोफा का कहना है, "मुझे लगता है कि ये नीति बहुत महंगी साबित होगी और इसका ज़्यादा असर होने वाला नहीं है."

वो इससे पहले लागू बैन्ड ड्रिंकर रजिस्टर की नीति को कहीं बेहतर मानते थे.

एलिस स्प्रिंग अस्पताल की तरफ़ से जारी आंकड़े बताते हैं कि बैन्ड ड्रिंकर रजिस्टर नीति को खत्म करने के बाद उनके इमरजेंसी वॉर्ड में आने वाले शराब से जुड़े मामलों की संख्या दोगुनी हो गई है.

हालांकि सरकार इन आंकड़ों पर सवाल उठाती है.

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