पेशावर में क्यों होते हैं बार-बार हमले?

पाकिस्तान और खास कर पेशावर में सुरक्षा की स्थिति काफी समय से चिंताजनक है

पाकिस्तान के जिस शहर पर चरमपंथ के ज़ख्म सबसे गहरे हैं वो है ख़ैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानी पेशावर.

ये शहर 34 साल पहले अफ़ग़ानिस्तान पर हुए रूसी हमले के बाद से किसी न किसी तरह के हमले का निशाना ज़रूर बनता रहा है.

पिछले महीने पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में हुए हमले में कम से कम 137 लोगों की मौत हुई.

इसके अलावा पिछले दिनों ही कोहट इलाके में ऑल सेंट्स चर्च पर हुए हमले में 85 लोग मारे गए जबकि तक़रीबन 145 घायल हुए.

इससे पहले भी हाल के सालों में ये शहर आए दिन होने वाले धमाकों के चलते सुर्खियों में रहा है.

'कोई ट्रेनिंग नहीं'

पेशावर में पिछले दिनों हुए हमलों के बाद ख़बरें आई थीं कि वहां सुरक्षा के लिए विशेष इंतज़ाम किए जा रहे हैं.

लेकिन सवाल सिर्फ तैनात किए जाने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या का नहीं है, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों को शायद हालात की गंभीरता का अंदाज़ा भी नहीं.

जब चंद दिनों पहले पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार को निशाना बनाया गया तो पुलिस ने एक सुरक्षाकर्मी को बिना किसी खास ट्रेनिंग के चरमपंथियों के निशाने पर मौजूद काबुली चौक पर मेटल डिटेक्टर के साथ खड़ा कर दिया.

इस पुलिसकर्मी का कहना है, “जब कोई संदिग्ध वस्तु इसके क़रीब आती है तो इससे एक आवाज़ निकलने लगती है. मैंने इसके ज़रिए गाड़ियों और इंसानों को चेक करने की कोई ट्रेनिंग तो नहीं ली है लेकिन थाने वालों ने पहले भी ये मुझे दिया था जिससे मैं लोगों को चेक करता रहा था.”

हमलों में इंसानी जानों के नुक़सान के बाद सबसे ज़्यादा नुक़सान व्यापारियों को हुआ है जिनमें से ज्यादातर का कहना है कि उनके पास अब बर्बाद हो गई दुकानों के सामने खड़े होकर दुआ मांगने के सिवा और कोई काम नहीं.

एक व्यापारी हलीम जान कहते हैं, “सुरक्षा बलों की समस्या ये है कि वो कहते हैं कि हमारे पास पर्याप्त संख्या में सुरक्षाकर्मी नहीं हैं. वो कहते हैं कि हमारे पास इतना बजट नहीं है. कहां से लाएं. थाने खाली पड़े हैं. जिस चौकी पर 90 लोग होने चाहिए वहां 9 लोग मौजूद हैं.”

कौन करेगा सुरक्षा?

पेशावर के आसपास क़बायली आबादी मौजूद है जो कुछ साल पहले तक अपराध से अछूते जाने जाते थे.

लेकिन पड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान पर हुए हर हमले का असर इन क्षेत्रों पर कुछ इस तरह पड़ा है कि जैसे क़ानून व्यवस्था का नामो निशान मिट गया हो.

तालिबान के अलावा यहां 'इस्लाम की रक्षा' के नाम पर बहुत सारे दूसरे हथियार बंद दस्ते भी काम कर रहे हैं.

शहर और क़बायली इलाकों के बीच कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी फ्रंटियर कांस्टैबलेरी की थी लेकिन आज वो अपनी इस जिम्मेदारी के लिए मौजूद नहीं है.

सुरक्षा विशेषक्ष ब्रिगेडियर महमूद शाह कहते हैं, “फ्रंटियर कांस्टैबलेरी एक्ट को देखें तो उसमे साफ लिखा है कि ये प्रांतों के लिए है. और इसका अपना एक काम है. तो जब आप उन्हें इस्लामाबाद, कराची, क्वेटा और गिलगिट बाल्टिस्तान में लगा देते हैं तो बाकी जो इधर रह जाते हैं, उनसे स्थिति नहीं संभलती है.”

सरहदी शहर

पेशावर को एक तरफ मोमंद एजेंसी, दूसरी तरफ ख़ैबर एजेंसी तीसरी तरफ दर्रा आदम ख़ेल और चौथी तरफ एफ़आर कोहाट से ख़तरा है लेकिन आज तक ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं आया है कि इन क्षेत्रों से आने वाले हमलावरों को नाकाम बनाने का कोई मुनासिब इंतज़ाम किया गया हो.

कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सुपरपावर्स ने इस शहर को महज़ सामान लाने ले जाने का रास्ता बनाकर रख दिया है.

पेशावर विश्वविद्यालय के हुसैन सुहरावर्दी कहते हैं, “दुर्भाग्य से हम एकदम अफगानिस्तान में कूद पड़ते हैं. 1980 के दशक में भी हमने ऐसा किया. 1990 के दशक में भी हमने यही किया और अब भी कर रहे हैं. लेकिन हमने कोई रक्षात्मक प्रणाली तैयार नहीं की है जिससे हम सरहदी शहरों को सुरक्षा प्रदान कर सकें.”

चरमपंथी निशाने पर मौजूद शहरों में हमलों को रोकने के लिए नीति-निर्माता और प्रशासन योजना बनाकर जनता को सुरक्षा प्रदान करते हैं. लेकिन पेशावर अकेला शहर है जहां पुलिस बस हुक्मरानों, अफसरशाही और अहम माने जाने वाले लोगों की हिफाज़त में लगी है.

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