क्या चीन अपना वादा निभाएगा ?

मनमोहन सिंह

चीन के दौरे पर तीन देशों के नेता पहुंचे हैं. रूस और मंगोलिया के प्रधानमंत्रियों के अलावा भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह भी बीजिंग में हैं. लेकिन चीनी मीडिया ने भारतीय प्रधानमंत्री का सबसे ज़्यादा गर्मजोशी से स्वागत किया है.

चीनी मामलों पर नज़र रखने वाले हर्ष पंत कहते हैं ये कोई नयी बात नहीं, चीन में भारत के नेताओं का स्वागत होता आया है.

मनमोहन सिंह के इस स्वागत पर टिपण्णी करते हुए चीन के मामलों की विशेषज्ञ और जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की डॉक्टर अलका आचार्य कहती हैं "इसके दो कारण हैं, एक ये कि चीन की नयी लीडरशिप ने भारत के साथ रिश्तों को सुधारने को प्राथमिकता दी है और दूसरे ये कि मनमोहन सिंह चीनी नेताओं को अब दस सालों से जानते हैं जिसके कारण रिश्तों में गहराई आई है"

हर्ष के अनुसार इस बार प्रधानमंत्री का दौर महत्वपूर्ण ज़रूर है: "कई मायनों में ये अहम दौरा है. ये मनमोहन सिंह का आखिरी दौरा हो सकता है और चीनी नेता चाहेंगे की जिनके साथ उनके रिश्ते दस साल से अच्छे हैं उनके साथ कोई समझौता हो जाए"

चीन और भारत, जो 1962 में एक सरहदी जंग भी लड़ चुके हैं, सालों से चले आरहे सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं.

आर्थिक गलियारा

चीनी मीडिया के अनुसार चीन-भारत सीमा प्रबंधन समझौता तैयार है जिसका विवरण पूरी तरह से सामने नहीं आया है लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इस समझौते के अंतर्गत सीमा पर होने वाली घटनाओं को दोनों देशों के सीमा सुरक्षा कमांडर आपस में बैठ कर सुलझा सकते हैं.

इस समझौते में प्रगति हुई तो इसके अंतर्गत चीन और भारत के बीच एक आर्थिक कॉरिडोर खोला जाएगा जहाँ आर्थिक गतिविधियां होंगी और इस गलियारे में बर्मा और बांग्लादेश भी शामिल होंगे.

हर्ष पंत के अनुसार सीमा विवाद पर समझौता प्रधानमंत्री के दौरे का सब से अहम उद्देश्य है. लेकिन डॉक्टर अलका आचार्य कहती हैं व्यापार असंतुलन सब से बड़ा मामला है.

अलका के अनुसार, "सीमा विवाद कई सालों से चला आ रहा है. इस समय भारत के खिलाफ व्यापर असंतुलन सब से अहम मसला है"

सीमा विवाद के बावजूद दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार में लगातार तेज़ी आ रही है.

वादा

पिछले साल दोनों देशों के बीच 67 अरब डॉलर का व्यापर हुआ और 2015 तक 100 अरब डॉलर तक के व्यापार का लक्ष्य है.

लेकिन समस्या ये है कि व्यापर का संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है.

पिछले साल भारत के ख़िलाफ़ व्यापारिक घाटा 41 अरब डॉलर का था जिससे भारत को काफी चिंता है.

चीनी प्रधानमंत्री जब हाल में दिल्ली आये थे तो उन्होंने इस असंतुलन को दूर करने का वादा किया था.

अब विशेषज्ञ कहते हैं कि मनमोहन सिंह चीन से कहेंगे कि अपना वादा पूरा करो.

चीन ने भारत को आश्वासन दिया था कि भारतीय कंपनियों को चीनी बाज़ारों में अपना माल बेचने के लिए सहूलियतें दी जाएंगी लेकिन फिलहाल इस वादे पर अमल नहीं हुआ है.

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