मूंछों का नवंबर से क्या रिश्ता?

मोवंबर
Image caption मोवंबर अब 21 देशों में फैल चुका है. इससे पुरुषों में बीमारियों के प्रति जागरुकता बढ़ी है.

ऊपर की ओर उठी हुई या बारीक? फ़्रीस्टाइल या नीचे की ओर झुकी हुई फ़ू मंचू मूंछें?

नवंबर आ चुका है और दुनिया के कई देशों में पुरुषों के सामने इस तरह के सवाल हैं.

इस असमंजस की वजह ये है कि नवंबर को 'मोवंबर चैरिटी' पुरुषों की सेहत से जुड़ी समस्याओं के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए इस्तेमाल करती है और मूंछों को पुरुषों की सेहत से जुड़ी समस्याओं के प्रतीक के तौर पर अपना लिया गया है.

मेलबर्न के एक पब में 10 साल पहले दो युवा बीयर की चुस्कियां लेते हुए फ़ैशन के ताज़ा रुझान के बारे में बात कर रहे थे.

इसी बातचीत के दौरान उन्होंने तय किया कि फ़ैशन के प्रतीक के तौर पर मूंछों की वापसी होनी चाहिए और उन्होंने अपने 30 दोस्तों से कहा कि वो चैरिटी के लिए मूंछें उगाएं और इसके लिए 10 डॉलर लें.

वे लोग नवंबर 2003 में कुछ भी रकम नहीं बटोर सके लेकिन कोशिशें जारी रहीं और अगले साल उन्होंने प्रोस्टेट कैंसर के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए उन्होंने 54,000 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जुटा लिए.

हिचकिचाहट ख़त्म

अब मोवंबर 21 देशों में फैल चुका है, बीते साल ब्रिटेन में मोवंबर ने 2.70 करोड़ पाउंड यानी करीब 270 करोड़ रुपए जुटा लिए. वहीं पूरी दुनिया में इस चैरिटी ने 9.20 करोड़ पाउंड यानी करीब 920 करोड़ रुपए बटोरे हैं.

10 साल पहले पब में हुई उस बातचीत के बाद से प्रोस्टेट और वृषण कैंसर के शोध के लिए 30 करोड़ पाउंड यानी करीब 3,000 हज़ार करोड़ रुपए जुटाए जा चुके हैं.

इस बीच हज़ारों-लाखों लोगों ने मूंछें उगाने की कोशिश की है और अपनी उन बीमारियों के बारे में बात करना शुरू किया है जिनके बारे में बात करने से वो पहले हिचकिचाते थे.

जस्टिन कोगलैन उन लोगों में से हैं जो मेलबर्न में सबसे पहले 'मो ब्रो' बने थे और अब यूरोप में मोवंबर के प्रमुख हैं.

जस्टिन कहते हैं, "अब हर व्यक्ति ये जानना चाहता है कि मूंछें उगाना कैसा होता है."

चंदा बटोरने के इस माहौल में करीब-करीब हर महीना किसी न किसी परोपकारी काम के लिए तय है ऐसे में उनके सामने बड़ी चुनौती ये थी कि अपने विचार को दूसरे विचारों से अलग कैसे पेश किया जाए.

कैंसर रिसर्च यूके में ब्रांड और रणनीतिक मार्केटिंग की डायरेक्टर नताशा हिल मानती हैं कि मोवंबर ने ये लक्ष्य हासिल कर लिया है.

नताशा हिल कहती हैं, "मैं मोवंबर की प्रशंसा करती हूं - ये बहुत अलग और ताज़ा है."

कैंसर शोध को बढ़ावा

Image caption मूंछों के ज़रिए जागरुकता बढ़ाने का ये तरीका कैंसर शोध को भी बढ़ावा दे रहा है.

ये कम बड़ी उपलब्धि नहीं है क्योंकि पुरुष अक्सर अपने डॉक्टर से इन बीमारियों के बारे में बात करने से झिझकते हैं. स्वतंत्र शोध से पता चला कि मोवंबर का ज़बरदस्त असर हुआ है. अब ज़्यादा पुरुष अपनी बीमारियों के बारे में बात कर रहे हैं.

लेकिन सबसे ज़्यादा असर महसूस हो रहा है कि प्रोस्टेट और वृषण कैंसर को लेकर शोध पर, इस तरह के शोध को बड़ा बढ़ावा मिला है. मोवंबर फ़ाउंडेशन में शोध के प्रमुख इयान फ़्रेम कहते हैं कि आर्थिक मदद से काफी अंतर आया है.

वो बताते हैं, "बीते 10 साल में प्रोस्टेट कैंसर के मामले दो गुना हो गए हैं और हम देख सकते हैं कि मोवंबर का असर कितना हुआ है क्योंकि बीते चार साल में शोध में निवेश बढ़ रहा है."

वहीं वृषण कैंसर के शोध में आर्थिक मदद पारंपरिक रूप से मुश्किल रही है क्योंकि ये आम बीमारी नहीं है.

'इंस्टीट्यूट ऑफ़ कैंसर रिसर्च' में वृषण कैंसर अध्ययन की प्रमुख डॉक्टर क्लैयर टर्नबुल कहती हैं कि चुनौती ये होती है कि कैंसर होने से पहले उन पुरुषों की पहचान कर ली जाए जिनमें आनुवांशिक रूप से कैंसर का ख़तरा होता है.

काफ़ी काम बाकी

हालांकि मोवंबर से आर्थिक मदद मिलने से ये शोध परियोजनाएं आसान हुई हैं लेकिन अब भी काफ़ी काम होना है.

डॉक्टर टर्नबुल कहती हैं, "हमें कुछ कारणों का पता चला है लेकिन उनसे कैंसर के जोखिम का अभी अच्छी तरह से पता नहीं चलता. हमने 20% काम किया है लेकिन इसके बाद रास्ता मुश्किल और बेहद मुश्किल है."

हालांकि पूरी दुनिया में उनके संस्थान में ही वृषण कैंसर पर प्रयोग हो रहे हैं, इसलिए इसकी पूरी संभावना है कि उनकी टीम अपना लक्ष्य हासिल कर लेगी.

बीते 20 साल में सिर्फ़ पिंक रिबन, ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरुकता का अंतरराष्ट्रीय प्रतीक, ही कैंसर के इलाज के लिए इस तरह आर्थिक मदद जुटा पाया है.

जल्दी पहचान, बेहतर इलाज और बढ़ती जागरुकता की वजह से अब बड़ी तादाद में ब्रेस्ट कैंसर पीड़ित महिलाओं की जान बचाई जा रही है.

हालांकि ये कहा जा सकता है कि लोग चंदा जुटाने के इन अभियानों से थोड़े थक गए हैं लेकिन इसके बहुत कम सबूत हैं.

जो भी हो परोपकारी संगठन इसके लिए तैयार हैं. नताशा हिल कहती हैं, "चंदा जुटाने की मुहिम तो बढ़ ही रही है इसलिए हमें चंदा जुटाने के अपने अभियानों को हर दम ताज़ा रखना होगा."

मोवंबर के लिए चुनौती है पूरे एक महीने तक मूंछों के लिए अभियान को बनाए रखना और कैंसर पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों को मदद जारी रखना.

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