बांग्लादेश: 1971 युद्ध अपराधों के लिए दो और को मौत की सज़ा

  • 3 नवंबर 2013
Image caption बांग्लादेश में 1971 में आज़ादी की लड़ाई से जुड़ी पिछले फ़ैसलों के बाद देश में हिंसा भड़की थी.

बांग्लादेश में एक विशेष अपराध प्राधिकरण ने साल 1971 में देश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान युद्ध अपराधों के दोषी पाए गए एक ब्रितानी मुस्लिम नेता और एक अमरीकी नागरिक को मौत की सज़ा सुनाई है.

बांग्लादेशी मूल के ब्रिटेन में रहने वाले चौधरी मोइनुद्दीन और अमरीकी नागरिक अशरफ़ुज़मां ख़ान को आज़ादी का समर्थन कर रहे 18 लोगों की हत्या में शामिल होने का दोषी पाया गया था.

ये दोंनो उस मिलिशिया के सदस्य थे जो पाकिस्तानी सेना का समर्थन करता था और फ़ैसला सुनाने वाले जज का कहना था कि इन दोनों ने इस गुट को नैतिक समर्थन दिया और वे हत्याओं में भी शामिल थे.

दो आरोपियों पर उनकी ग़ैर-मौजूदगी में मुक़दमा चला था. मोइनुद्दीन और अशरफ़ुज़मां ने इन आरोपों से इंकार किया था. इनके वकीलों का कहना था कि इनके मामले का राजनीतिकरण हुआ है.

हिंसक विरोध प्रदर्शन

बांग्लादेश की आज़ादी से जुड़े कई और मामलों में इस तरह के फ़ैसलों के बाद वहां हिंसक प्रतिक्रियाएं हुई हैं.

अभियोजन पक्ष का कहना था कि चौधरी मोइनुद्दीन अल-बद्र मिलिशिया गुट के सदस्य थे जो पाकिस्तानी सेना के साथ था. ये गुट बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के आखिरी दिनों में शिक्षाविदों और पत्रकारों समेत स्वतंत्रता की मांग कर रहे कार्यकर्ताओं की हत्या में शामिल था.

एएफ़पी समाचार एजेंसी के मुताबिक ढाका में एक भरी हुई अदालत में फ़ैसला सुनाते हुए जज मुजीबुर रहमान मिया ने कहा, "इन लोगों ने 18 बुद्धिजीवियों की हत्या को नैतिक समर्थन दिया, उसके लिए उकसाया और उसमें शामिल हुए."

विशेष अपराध अदालत ने इससे पहले बांग्लादेश की मुख्य इस्लामिक पार्टी, जमात-ए-इस्लामी और विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कुछ पूर्व और मौजूदा वरिष्ठ नेताओं को मौत की सज़ा दी है.

इस साल जनवरी से इन फ़ैसलों के आने के बाद हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों में 100 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं.

बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी सेना का कथित तौर पर साथ देने वाले स्थानीय लोगों पर मुक़दमा करने के लिए साल 2010 में मौजूदा अवामी लीग सरकार ने अंतरराष्ट्रीय अपराध प्राधिकरण का गठन किया था.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक आज़ादी की लड़ाई में तीस लाख लोग मारे गए थे.

लेकिन इस अदालत की कार्यवाई की कई मानवाधिकार संगठनों ने निंदा की है. इनमें न्यू यॉर्क स्थित ह्यूमन राइट्स वॉच भी शामिल है.

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